पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- स-शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥ ७ ॥ वन में स्थित चौराहे के बीच बैठकर शिखा सहित मुण्डन और दो प्राजापत्य करने से ब्राह्मण की शुद्धि होती है ॥ ७ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । मुच्यते तेन पापेन ब्राह्मणत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ इसके अतिरिक्त दक्षिणा में दो गायों का दान करना चाहिए । ऐसा महर्षि पाराशर का आदेश है । फिर उक्त पाप से रहित होकर ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व को पा लेता है ॥ ८ ॥ स्नानादि पञ्च पुण्यानि कीर्तितानि मनीषिभिः । आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं वायव्यं दिव्यमेव च ॥ ९ ॥ आग्नेय, वारुण, ब्राह्म, वायव्य और दिव्य—इन पाँच प्रकार के स्नानों को पण्डितों ने पुनीत (पवित्र) कहा है ॥ ९ ॥ आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य तु वारुणम् । 'आपो हिष्ठे'ति च ब्राह्मं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥१०॥ सम्पूर्ण शरीर में भस्म लेपन 'आग्नेय' स्नान, जल में नहाना 'वारुण' स्नान, 'आपो हिष्ठा-' मन्त्र द्वारा मार्जन करने से 'ब्राह्म' स्नान, गाय के रज से 'वायव्य' स्नान होता है ॥ १० ॥ यत्तु सातपवर्षेण ३तत्स्नानं दिव्यमुच्यते । तत्र स्नात्वा तु गङ्गायां स्नातो भवति मानवः ॥११॥ जब धूप निकलने के साथ ही साथ कुछ बारिश भी हो रही हो तो उसमें नहाने से 'दिव्य' स्नान होता है । उसमें नहाने से मनुष्य को गंगा-स्नान करने का फल मिलता है ॥ ११ ॥ स्नातुं यान्तं द्विजं सर्वे देवाः पितृगणैः सह । १. 'स्वायम्भुवोऽब्रवीत्' इति । २. 'आपो हिष्ठा०'-ऋ० १०,९,१ । ३. स्नानं तद्दिव्यमुच्यते' इत्यपि पाठः ।