पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२५ अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं १सुरासंसृष्टमेव च । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ २ ॥ अज्ञान के कारण मल-मूत्र या मद्य-मिश्रित पदार्थ आदि खा-पी लेने पर, तीनों वर्णों को पुनः अपना संस्कार करना चाहिए ॥ २ ॥ अजिनं मेखला दण्डो भैक्ष्यचर्या व्रतानि च । निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ॥ ३ ॥ जब विप्रों का पुनः संस्कार किया जाता है तब मृगचर्म, मेखला, दण्ड आदि धारण नहीं करना पड़ता । इसके अतिरिक्त भैक्ष्यचर्या ( भिक्षाचरण ) और व्रतादि कर्म भी नहीं करने पड़ते ॥ ३ ॥ विण्मूत्रभोजो शुद्धयर्थं प्राजापत्यं समाचरेत् । पञ्चगव्यं च कुर्वीत स्नात्वा पीत्वा शुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ मल-मूत्रभक्षी के लिए प्राजापत्य व्रत का विधान है । स्नान के पश्चात् पंचगव्य का पान करने से शुद्धि मिलती है ॥ ४ ॥ जलाऽग्निपतने चैव प्रव्रज्याऽनाशकेषु च । वृथावासितवर्णानां कथं शुद्धिविधीयते ? ॥ ५ ॥ मनुष्य के जल में डूबने, आग में जलने, संन्यास ग्रहण करने, पहाड़ से गिरने, अनशन व्रत करने या आत्महत्या का प्रयास करके बचे रहने पर चारों वर्णों के लोगों की शुद्धि किस प्रकार हो सकती है ? ॥ ५ ॥ प्राजापत्यद्वयेनैव तीर्थाभिगमनेन च । वृषैकादशदानेन वर्णाः शुद्ध्यन्ति ते त्रयः ॥ ६ ॥ दो प्राजापत्य व्रत करके किसी तीर्थस्थान में स्नान करके दस गौ और एक बैल का दान करने से तीनों वर्णों की शुद्धि हो जाती है ॥ ६॥ ब्राह्मणस्य प्रवक्ष्यामि वनं गत्वा चतुष्पथे । १. 'सुरां वा पिवते यदि' इति । २. 'विण्मूत्रस्य च' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal