फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७. सातवाँ अध्याय : राजयोग । स्वराशि तथा उच्च राशिस्थित ग्रहों का फल-सुस्थान स्थित वक्रीग्रह-दिग्बली ग्रहों से राजयोग-वर्गोत्तम लग्न और चन्द्र-लग्नेश से राजयोग-उच्च चन्द्रमा-अश्विनी में शुक्र-मंगल के सुस्थान से योग-धनु के पूर्वार्द्ध में सूर्य, चन्द्र-सूर्य नवांश में चन्द्र-स्वनवांश स्थिति से राजयोग- वर्गोत्तम चन्द्र-नवम स्थान स्थित ग्रहों से राजयोग-उच्चराशि स्थित शुक्र, शनि-नीच तथा शत्रु राशिस्थ ग्रह—तृतीय, षष्ठ एकादश में-पूर्ण चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में—गुरुचन्द्र केन्द्र में-जल चर राशि नवांश में चन्द्र-शुक्र पर गुरु की दृष्टि-बृहस्पति दृष्ट बुध-मित्र दृष्ट उच्च ग्रह- निज नवांश में सूर्य-मीन राशि में चन्द्र-वृष में चन्द्र-चन्द्र पर गुरु, शुक्र की दृष्टि-लाभेश, धर्मेश, धनेश से राजयोग-नीचभंग राजयोग । पृ० १६३-१७९ ८. अठवाँ अध्याय : भावश्रय फल । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, तथा केतु का लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम, एकादश तथा द्वादश भाव में स्थित होने का पृथक्-पृथक् फल । पृ० १८०-२०५ ९. नवाँ अध्याय : राशिफल । मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक धनु, मकर, कुंभ या मीन लग्न में हो या जिस राशि में चन्द्रमा हो उसका फल । उच्चराशि स्थित, स्वगृही, मित्रक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री, नीच राशि स्थित- अस्त-समराशि स्थित ग्रहों का फल-वक्री तथा वर्गोत्तम नवांश स्थित ग्रह का फल । पृ० २०६-२१६