भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण ११०-१११ ] पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । [ ८३ करने लगा। किसी अवसर पर, वह किसी गाँवको जा रहा था, तो उसने रास्तेमें बकरियोंका एक झुंड जाते देखा। उसमें एक बकरेके गलेमें पाषाणका एक खण्ड बन्धा देखा, जिसको रत्नपरीक्षक होनेके कारण, परीक्षा करके देखा तो वह सच्चा रत्न मालूम दिया। फिर उस रत्नके लोभसे, मूल्य दे कर उस बकरीको उसने खरीद लिया। मणिकार (मणियारे) के पाससे उस रत्नको सान पर चढ़वा कर उसे देदीप्यमान बनवाया और फिर श्रीसिद्धराजके मुकुट बनानेके अवसर पर, एक लाख मूल्य पर राजा-जीको दे दिया। उसी मूल धनसे उसने एक वार बिकनेको आये हुए मञ्जिष्ठाके कई बोरे खरीदे और जब बेचनेके समय उन्हें खोलकर देखा तो समुद्रके चोरोंसे छिपानेके लिए, व्यापारियोंने उनमें सोनेकी पट्टियाँ छिपा रखी हुई मालूम दीं। फिर उसने सब बोरे खोल कर उनमेंसे वे पट्टियाँ निकाल लीं। इस तरह फिर वह सारे नगरमें मुख्य ऐसा सिद्धराजका मान्य (नगर सेठ) और जिन-धर्मकी प्रभावना करने वाला [ प्रसिद्ध ] श्रावक हुआ। प्रति दिन, प्रति वर्ष, स्वेच्छा- नुसार जैन मुनियोंको अन्न वस्त्र आदि दिया करता और गुप्तरूपसे स्वदेश और विदेशमें नये नये धर्मस्थान बन- वाता तथा पुराने धर्मस्थानोंका जीर्णोद्धार करवाता रहा। पर किसी पर उसने अपनी प्रशस्ति नहीं लिखवाई। [ कहा भी है कि ]- १६७. लतासे आच्छन्न वृक्षकी नाईं और मृत्तिकासे आच्छादित बीजकी नाईं प्रच्छन्न (गुप्तरूपसे) किया हुआ सुकृत कर्म प्रायः सैंकडों शाखाओंवाला विस्तृत हो जाता है। इस प्रकार यह वसाहू आभडका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समानदृष्टि। १११) एक दूसरी बार, श्री सिद्धराज संसार सागरको पार करनेकी इच्छासे, सर्व देशके सर्व दर्शनोंमेंसे, प्रत्येकसे देवतत्त्व, धर्मतत्त्व, और पात्रतत्त्वकी जिज्ञासासे पूछने लगा, तो मालूम हुआ कि, ये प्रत्येक अपनी स्तुति और दूसरेकी निंदा कर रहे हैं। इससे उसका मन [खूब] संदेह-दोलाढूढ हो गया। श्रीहेमाचार्यको बुला कर उनसे विचारणीय कार्यको पूँछा। आचार्यने चतुर्दश विद्याओंके रहस्यका विचार करके, इस प्रकार एक पौराणिक निर्णय कह सुनाया कि-'पहिले ज़मानेमें किसी व्यवहारी [गृहस्थ] ने अपनी पहली परिणीत पत्नीको छोड़ कर किसी रखेलिनको अपना सर्वस्व दे दिया। इससे उसकी पूर्व पत्नी, सर्वदा ही, उसको अपने वशमें करनेके लिये अभिचार (मंत्र-तंत्र आदि) के उपाय पूछा करती। किसी गौड (बंगाल) देशीय [जादूगर] ने बताया कि-"तुम्हारे पतिको मैं ऐसा कर दूँ कि तुम उसे फिर रस्सीमें बाँधे रखो" ऐसा कह कर, उसने कोई एक ऐसी अचिन्त्यवीर्य ओषधि ला दी और कहा कि-"इसे भोजनमें खिला देना"। ऐसा कह कर वह चला गया। कुछ दिनोंके बाद जब क्षयाह (श्राद्धका दिन) आया तो उस स्त्रीने वैसा ही किया-पतिको वह ओषधि खिला दी। फलस्वरूप वह (पति) साक्षात् बैल हो गया। उसका फिर कोई प्रतीकार न जान कर वह, सारी दुनियाकी झिड़कियाँ सहती हुई, अपने दुश्चरितके ऊपर शोक करने लगी। एक बार [ग्रीष्म कालके] दोपहरके समय, सूर्यके कठोर किरणोंसे खूब संतप्त हो कर भी, किसी शाद्वल भूमिमें वह अपने उस पशुरूप पतिको चरा रही थी और किसी वृक्षके नीचे बैठ कर खूब निर्भर भारसे विलाप कर रही थी। अकस्मात् उसने आकाशमें कुछ आलाप सुना। पशुपति (शिव) भवानीके साथ विमानमें बैठे हुए उस समय यहाँसे निकले। भवानीने उसके दुःखका कारण पूछा। इस पर शिवने वह वृत्तांत ज्यों का त्यों कह सुनाया। फिर भवानीके आग्रह करने पर शिवने यह भी बताया कि, उसी वृक्षकी छाया में, पुरुष बननेकी ओषधि है;