भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण ८९-९० ] उदयन मंत्रीका प्रबन्ध : [ ६७ करते थे-अपने महलमें बुलाया। शरीरमें बनावटी रोग बतला कर नाडी दिखाई। वैद्यने उपयुक्त पथ्यका सेवन करना बतलाया तो [उस मदनपालने कहा] 'वही तो नहीं है।' और इसीलिये मैंने तुम्हें बुलाया है। [किसी और प्रकारका] पथ्य दे कर भूख शान्त करनेके लिये तुम्हें नहीं [बुलाया है]। इसलिये पचीस हजार [रुपये] हाजर करो, यह कह कर उसे बंदी कर लिया। उसने वह सब वैसा करके (अर्थात् उसका मांगा हुआ द्रव्य दे-दिला कर) फिर इस तरहका अभिग्रह (नियम) ग्रहण किया कि-'मैं इसके बाद प्रतीकारके लिये राजाका घर छोड़ कर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा'। इसके बाद परम आतुर रोगियोंका प्रत्ररण (पेशाब) मात्र देख कर ही वह उनका निदान और चिकित्सा करता रहा। [एक समय] किसी मायावीने, कल्पित रोगकी चिकित्सा कौशलको जाननेकी इच्छासे एक बैलका मूत्र दिखाया। उसने अच्छी तरह उसे देख कर सिर हिलाते हुए कहा-'यह बैल बहुत खानेके कारण फूल गया है। इसलिये शीघ्र ही इसे तेलकी नाली दो। नहीं तो मर जायगा।' ऐसा कह कर उसने उसके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न किया। एक बार राजाने अपनी गर्दनकी पीडाका प्रतीकार पूछा। उसके यह कहने पर कि, दो पल भर कस्तूरीको भिगो कर लेप करनेसे रोग शान्त होगा, वैसा ही किया गया। गर्दन ठीक हो गई। फिर राजाकी पालकी ढोनेवाले किसी गरीब मनुष्यने ग्रीवा (गर्दन) की पीड़ाकी दवा पूछी। उससे कहा कि 'करीरकी जड़ घिस कर उसके रसमें उसी जगहकी मिट्टी मिला कर उसका लेप करो।' तब राजाने पूछा कि यह क्या बात है ?। इस पर उसने बताया कि 'आयुर्वेदज्ञ लोग देश, काल, बल, शरीर और प्रकृति देख कर चिकित्सा किया करते हैं।' एक बार, कुछ धूर्त एक मत हो कर दो दोकी संख्यामें पृथक् पृथक् हो गये। पहले दोने बाजारके रास्तेमें पूछा कि 'क्या बात है कि आप शरीरसे खिन्न दिखाई देते हैं।' दूसरे दोने श्री मुञ्जालस्वामी प्रासादके सोपान पर [वही बात] पूछी। तीसरे दोने राजद्वार पर और चौथे दोने द्वारतोरण पर वही बात पूछी। इस प्रकार बार बार पूछनेसे उसे [अपने स्वास्थ्यके विषयमें बड़ी] शंका उत्पन्न हो गई और तत्काल ही उसे माहेन्द्र ज्वर हो गया। [और उससे] तेरहवें दिन वह वैद्य मर गया। इस प्रकार यह ठ० लींला वैद्यका प्रबंध समाप्त हुआ। * ८९) इसके बाद, सान्‍तू नामक मंत्री, कालकी नाँई अन्यायी उस मदनपालको मारनेकी इच्छासे किसी समय, कर्णके पुत्र-कुमार जयसिंह-को हाथी पर चढ़ा कर राजपाटिकाके बहाने उसके घर ले गया और वहाँ [कुछ तूफान मचा कर] वीरोंके हाथसे उसको मरवा डाला। * उदयन मंत्रीका प्रबन्ध । ९०) इधर, मरु देश का रहनेवाला कोई श्रीमालवंशीय वणिक् जिसका नाम 'उदा' था, अच्छा घी खरीदनेके लिये, वर्षाकालकी अँधेरी रातमें कहीं जा रहा था। वहाँ जंगलमें उसने देखा कि कुछ कर्मचारी किसी खेतमें एक क्यारीसे दूसरी क्यारीमें जल भर रहे हैं। उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो। उन्होंने जब कहा कि 'हम फलाँ आदमीके कामुक (हितचिन्तक) है' तो उसने पूछा कि मेरे भी कहीं हैं ?। इस पर उनके यह बताने पर कि 'कर्णावती में हैं' वह सकुटुंब [उस स्थानको छोड़ कर] वहाँ (कर्णावती) पहुँचा। वहाँ पर बायटीय जिन मन्दिरमें [देवदर्शन करते हुए उसको] किसी 'लछि' नामक एक डिम्पिका श्राविकाने, उसे साधर्मिक जान कर प्रणाम किया। उसके यह पूछने पर कि आप किसके अतिथि हैं ? [उदाने कहा कि] 'मैं विदेशी हूँ, आप ही को अतिथि समझिए !' यह सुन कर उसने उसको अपने साथ ले जा कर, किसी वणि-