भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

प्रकरण ८९-९० ] उदयन मंत्रीका प्रबन्ध : [ ६७ करते थे-अपने महलमें बुलाया। शरीरमें बनावटी रोग बतला कर नाडी दिखाई। वैद्यने उपयुक्त पथ्यका सेवन करना बतलाया तो [उस मदनपालने कहा] 'वही तो नहीं है।' और इसीलिये मैंने तुम्हें बुलाया है। [किसी और प्रकारका] पथ्य दे कर भूख शान्त करनेके लिये तुम्हें नहीं [बुलाया है]। इसलिये पचीस हजार [रुपये] हाजर करो, यह कह कर उसे बंदी कर लिया। उसने वह सब वैसा करके (अर्थात् उसका मांगा हुआ द्रव्य दे-दिला कर) फिर इस तरहका अभिग्रह (नियम) ग्रहण किया कि-'मैं इसके बाद प्रतीकारके लिये राजाका घर छोड़ कर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा'। इसके बाद परम आतुर रोगियोंका प्रत्ररण (पेशाब) मात्र देख कर ही वह उनका निदान और चिकित्सा करता रहा। [एक समय] किसी मायावीने, कल्पित रोगकी चिकित्सा कौशलको जाननेकी इच्छासे एक बैलका मूत्र दिखाया। उसने अच्छी तरह उसे देख कर सिर हिलाते हुए कहा-'यह बैल बहुत खानेके कारण फूल गया है। इसलिये शीघ्र ही इसे तेलकी नाली दो। नहीं तो मर जायगा।' ऐसा कह कर उसने उसके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न किया। एक बार राजाने अपनी गर्दनकी पीडाका प्रतीकार पूछा। उसके यह कहने पर कि, दो पल भर कस्तूरीको भिगो कर लेप करनेसे रोग शान्त होगा, वैसा ही किया गया। गर्दन ठीक हो गई। फिर राजाकी पालकी ढोनेवाले किसी गरीब मनुष्यने ग्रीवा (गर्दन) की पीड़ाकी दवा पूछी। उससे कहा कि 'करीरकी जड़ घिस कर उसके रसमें उसी जगहकी मिट्टी मिला कर उसका लेप करो।' तब राजाने पूछा कि यह क्या बात है ?। इस पर उसने बताया कि 'आयुर्वेदज्ञ लोग देश, काल, बल, शरीर और प्रकृति देख कर चिकित्सा किया करते हैं।' एक बार, कुछ धूर्त एक मत हो कर दो दोकी संख्यामें पृथक् पृथक् हो गये। पहले दोने बाजारके रास्तेमें पूछा कि 'क्या बात है कि आप शरीरसे खिन्न दिखाई देते हैं।' दूसरे दोने श्री मुञ्जालस्वामी प्रासादके सोपान पर [वही बात] पूछी। तीसरे दोने राजद्वार पर और चौथे दोने द्वारतोरण पर वही बात पूछी। इस प्रकार बार बार पूछनेसे उसे [अपने स्वास्थ्यके विषयमें बड़ी] शंका उत्पन्न हो गई और तत्काल ही उसे माहेन्द्र ज्वर हो गया। [और उससे] तेरहवें दिन वह वैद्य मर गया। इस प्रकार यह ठ० लींला वैद्यका प्रबंध समाप्त हुआ। * ८९) इसके बाद, सान्‍तू नामक मंत्री, कालकी नाँई अन्यायी उस मदनपालको मारनेकी इच्छासे किसी समय, कर्णके पुत्र-कुमार जयसिंह-को हाथी पर चढ़ा कर राजपाटिकाके बहाने उसके घर ले गया और वहाँ [कुछ तूफान मचा कर] वीरोंके हाथसे उसको मरवा डाला। * उदयन मंत्रीका प्रबन्ध । ९०) इधर, मरु देश का रहनेवाला कोई श्रीमालवंशीय वणिक् जिसका नाम 'उदा' था, अच्छा घी खरीदनेके लिये, वर्षाकालकी अँधेरी रातमें कहीं जा रहा था। वहाँ जंगलमें उसने देखा कि कुछ कर्मचारी किसी खेतमें एक क्यारीसे दूसरी क्यारीमें जल भर रहे हैं। उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो। उन्होंने जब कहा कि 'हम फलाँ आदमीके कामुक (हितचिन्तक) है' तो उसने पूछा कि मेरे भी कहीं हैं ?। इस पर उनके यह बताने पर कि 'कर्णावती में हैं' वह सकुटुंब [उस स्थानको छोड़ कर] वहाँ (कर्णावती) पहुँचा। वहाँ पर बायटीय जिन मन्दिरमें [देवदर्शन करते हुए उसको] किसी 'लछि' नामक एक डिम्पिका श्राविकाने, उसे साधर्मिक जान कर प्रणाम किया। उसके यह पूछने पर कि आप किसके अतिथि हैं ? [उदाने कहा कि] 'मैं विदेशी हूँ, आप ही को अतिथि समझिए !' यह सुन कर उसने उसको अपने साथ ले जा कर, किसी वणि-

६८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश कके घर भोजन बनवा कर उसे खिलाया और अपने घरके नीचेके तलमें खाट बिछवा कर रहनेकी जगह दी। कालक्रमसे उसके पास खूब सम्पत्ति हो गई। फिर उसने अपना निजका ईंटोका घर बनवानेकी इच्छा की। उसकी नींव खोदते समय [ जमीनमेंसे ] अपरिमित धन निकल आया। वह उस स्त्रीको बुला कर उस निधिको जब देने लगा तो उसने अस्वीकार किया। उसी प्रतिके प्रभावसे, यहाँ पर, वह उदयन मंत्रीके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ९१) [ फिर उस धनसे ] उसने कर्णावती में अतीत, भविष्य और वर्तमानके चौवीस चौवीस जिनोंसे सुशोभित श्री उदयन विहार [नामक मन्दिर] बनवाया। ९२) उसको भिन्न भिन्न मातासे उत्पन्न ऐसे चार पुत्र हुए, जिनके नाम चाहड, आंबड, वाहड और सोलाक इस प्रकार थे। * सान्तू मंत्रीका प्रबन्ध ९३) एक दूसरे अवसर पर, सान्तू नामक महामंत्री हाथी पर चढ कर राजवाटिका में जाकर लौटा और अपनी ही बनवाई हुई सान्तू वस हिकामें देवनन्दन करनेकी इच्छासे उसमें प्रवेश करते हुए, उसने, किसी चैत्यवासी श्वेताम्बर यतिको, बार-वेश्याके कंधे पर हाथ रखे हुए देखा। मंत्रीने हाथीसे उतर कर उत्तरासङ्ग करके, पञ्चाङ्ग प्रणामके द्वारा, गौतम मुनिकी भाँति, उसको प्रणाम किया। वहाँ पर क्षणभर ठहर कर, फिर उसे प्रणाम करके, वह चला गया। वह यति तो लाजके मारे मुँह नीचा किये पातालमें गड़ा-सा जाने लगा; और फिर तत्काल सब छोड़-छाड़ कर 'मलयधारी श्री हेम सूरिके पास उपसम्पदा ग्रहण करके, संवेग रससे पूर्ण हो शत्रुञ्जय पर्वत पर चला गया और बारह वर्षतक वहाँ तप किया। किसी समय वही मंत्री श्री शत्रुञ्जय पर देवचरणोंकी यात्राके लिये गया तब वहाँ उस मुनिको अपरिचितकी नाँई देख कर, उसके चरित्रसे मनमें चकित हो कर, उसका गुरुंकुल आदि पूछा। 'असलमें तो आप ही गुरु हैं'--उसके ऐसा कहने पर कान बंद करके मंत्रीने कहा- नहीं, नहीं, ऐसा मत 'कहिये।' असल बात न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए उस मंत्रीसे उसने कहा- १३१. चाहे गृही हो चाहे त्यागी, जो जिसको शुद्ध धर्ममें स्थापित करता है वही उसका धर्मगुरु होता है। इस प्रकार उसे मूल वृत्तान्त बता कर उसकी धर्ममे दृढ़ता निर्माण की। इस प्रकार यह मन्त्री सान्तूकी दृढ़धर्मताका प्रबंध समाप्त हुआ। * मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना। ९४) उसके बाद, श्री मयणल्लादेवीने, अपने पूर्व जन्मकी स्मृतिके ज्ञानसे जाना हुआ, पूर्वभवका वह वृत्तांत, जब सिद्धराज से कह बताया, तो वह श्री सोमनाथ के योग्य सत्रा करोड़ मूल्यकी सुवर्णमयी पूजा- सामग्री साथ ले कर यात्राके लिये माताके साथ चला। वह इस प्रकार, बाहुलोड नगर पहुँची, तो यहा पर, पञ्चकुल - कर वसूल करने वाले राजपुरुष - के द्वारा, कापडी आदिप्रवासी भिक्षुक गण, कर देनेके लिये पीड़ित किये जा कर, उनकी अवहेलना की गई। वे आँखों में, आसू भर कर पीछे लौटने लगे। मयणल्ला देवी ने जो यह बनाव देखा तो उसके दर्शनसे [ स्वच्छ ] हृदयमें उनकी पीड़ा संक्रान्त हो गई। वह भी [ उनके साथ यात्रा किये बिना ] पीछे लौटने लगी। तब सिद्धराज ने बीचमें पड कर कहा- 'स्वामिनि ! आपका यह कैसा संभ्रम है! आप क्यों पीछे लौट रही हैं!' राजाके ऐसा कहने पर [ उसने कहा-] जबी यह कर सर्वथा बन्द कर दिया जायगा तभी मै सोमेश्वर को प्रणाम करूंगी, अन्यथा नहीं। और तो क्या, इसके बाद भोजन और पानका भी मुझे नियम है।' यह सुन कर राजाने पञ्चकुलको बुलाया और उसका हिसाब पूछा, तो उसमें ७२

प्रकरण ९१-९६ ] मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना [ ६९ लाखकी आमदनी मालूम दी । राजाने उस करके पट्टेको फाड कर, माताके कल्याणार्थ उस करको उठा दिया और अंजलीमें जल ले कर उसकी प्रतिज्ञा की । इसके बाद उस ( मयणल्लादेवी ) ने सोमेश्वर के पास जा कर उस सुवर्णसे पूजा की; तथा तुलापुरुषदान, गजदान आदि अनेक महादान दिये । रातको वह ऐसे गर्वके साथ कि 'मेरे समान संसारमें न कोई हुई और न कोई होने वाली है' गाढ़ी नींदमें सो गई । तपस्वी वेष धारण करके उसी देव (सोमेश्वर) ने [ स्वप्नमें प्रत्यक्ष हो कर के ] कहा-' यहाँ मेरे देवालयमें एक कार्पटिक स्त्री यात्राके लिये आई है । तुम्हें उसका पुण्य माँगना चाहिये । ऐसा आदेश करके जब वह देवता अन्तर्धान हो गये तो [ फिर प्रातःकाल ] राजपुरुषोंसे खोज करा कर उस स्त्रीको उसने बुलवाया । उसके पुण्यको माँगने पर भी वह किसी तरह जब देनेको तत्पर न हुई तो उससे पूछा कि ' यात्रामें तुमने क्या [द्रव्य] व्यय किया है?' तो वह बोली कि मैं भीख माँग माँग कर १०० योजन दूरसे, कई देश पार करके, कलके दिन यहाँ देवालयमें आई हूँ । तीर्थोपवास करके, पारणामें किसी सुकृतिके यहाँसे, मैं निर्भागिनी थोडासा पिण्याक (खली) प्राप्त करके, उसके एक टुकड़ेसे मैने श्री सोमेश्वरकी पूजा की, एक टुकड़ा अतिथिको दिया और एक टुकड़ा स्वयं खा कर उपवासका पारणा किया । आप तो बड़ी पुण्यवती हैं-जिसके पिता, भाई, पति और पुत्र राजा हैं। आपने यह बाहुलोडकर, जो ७२ लाखका था, उठवा दिया है । सत्रा करोड़ मूल्यकी सामग्रीसे देवकी पूजा कर अगणित पुण्य अर्जन किया है । आप मेरे इस क्षुद्र पुण्य पर क्यों लोभ करती हैं ? और यदि क्रोध न करें तो कुछ कहूँ । असलमें तुम्हारे पुण्यसे मेरा पुण्य अधिक है । क्यों कि- १३२. संपत्ति होने पर नियम करना, शक्ति रहते सहन करना, यौवनावस्थामें व्रत लेना और दरिद्रा- वस्थामें दान देना,-यह सब बहुत थोडा होने पर भी अधिक पुण्यका कारण होता है । इस प्रकारके युक्ति-युक्त वाक्यसे उसने उसके गर्वका निराकरण किया । * ९५) इसके बाद, सिद्धराज जब समुद्रके किनारे खड़ा हो कर उसको देख रहा था तब एक चारणने आ कर इस प्रकार स्तुति की- १३३. हे चक्रवर्ती नाथ ! तुम्हारे चित्तको तो कौन जानता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि हे कर्णपुत्र आप शीघ्र ही लंका लेना चाहते हैं और उसीके लिये यहाँ खडे खड़े मार्ग देख रहे हैं। [ तब एक ] दूसरे चारणने कहा- १३४. हे जेसल ( जयसिंह ) ! यह समुद्र दौड कर तुम्हारे पैर धो रहा है; इसलिये कि तुमने और तो सब राजाओंको जीत लिया है और सिर्फ एक मेरा विभीषण राजा बाकी रह गया है; सो उसको छोड़ दीजिए । * सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्ष । ९६) राजा जब इस प्रकार यात्रामें व्यस्त था, उसी समय मालवाका छ्हानवेपो राजा यशोवर्मा गूर्जर देश में [ आ कर ] उपद्रव करने लगा । सान्तू मंत्री ने पूछा कि 'भलों, आप कैसे इस चढ़ाईसे निवृत्त हो सकते हैं?' उसने कहा कि 'यदि तुम अपने स्वामीकी सोमेश्वर देवकी यात्राका पुण्य मुझे दे दो तो।' ऐसा कहने पर उस मंत्रीने उसके चरण धो कर, उस पुण्यदानके निदानरूप जलको चुल्लमें ले कर उसके हाथ पर छोड़ दिया और ऐसा करके उसको [ गूर्जर देश से ] वापस लौटाया । [ यात्रासे लौट कर ] श्रीसिद्धराज जब नगरमें आया और मंत्री और मालव नरेशके उस वृत्तान्तको सुना तो वह बड़ा क्रुद्ध हुआ । मंत्रीने उससे

७० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [ शांत करते हुए ] यों कहा - 'स्वामिन् ! यदि मेरे देनेसे तुम्हारा पुण्य चला जाता है तो मैं उसका तथा अन्य पुण्यवानोंका पुण्य इसी तरह आपको भी दे देता हूँ । और असलमें तो बात यह थी कि जिस-किसी भी उपायसे शत्रुसेनाको स्वदेशमें प्रवेश करनेसे रोकनी जरूर थी।' ऐसा कह कर उसने नृपतिको अनुनय किया । इसके बाद इसी अमर्षवश उसने मालव मण्डल पर चढ़ाई करनेकी इच्छा की । सहस्रलिंग [ सरोवरादि ] धर्म- स्थानके कार्यका जो आरंभ किया गया था उसकी देखरेखका काम मंत्रियों और शिल्पियों (कारीगरों) को सौंपा। बड़ी शीघ्रताके साथ उसका काम चलने पर राजाने युद्धके लिये प्रयाण किया । वहाँ जय-जयकारके साथ बारह वर्ष तक युद्ध होता रहा । फिर भी जन किसी प्रकार धारा [ नगरी ] का किला नहीं टूटता दिखाई दिया तो [ एक दिन राजाने यह ] प्रतिज्ञा की कि धाराके किलेको तोड़े बिना आज अन्न ही न खाऊँगा । सायंकाल हो जाने पर भी ऐसा करनेमें असमर्थ होनेके कारण, सचिवोंने आटेकी बनावटी धारा बना कर और वहाँ पर परमार राजपूतको अपने सैनिकों द्वारा मरवा कर, उस प्रतिज्ञाका निर्वाह कराया । इस प्रकार प्रपञ्चसे राजाने प्रतिज्ञा तो पूरी की, लेकिन कार्यमें सफलता प्राप्त न होनेसे वापस लौटनेकी अपनी इच्छा सुआछ नामक मंत्रीको बताई । उसने अपने गुप्तचरोंको तीन रास्ते, चौराहे और चबूतरे इत्यादिक स्थानों पर भेज कर, धाराके किलेके भग होनेकी बातें जाननी चाहीं । लोगोंके परस्पर वार्तालाप करते हुए, धाराके रहने वाले किसी [ जानकार ] पुरुषने कहा कि ' दक्षिण दिशाके दरवाजेकी ओरसे शत्रुसेना हमला करे तब ही कहीं धारा के किलेका तोड़ना सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।' यह बात सुन कर [उन गुप्त चर लोगोंने] मन्त्रीको सूचित किया। उसने इस वृत्तान्तको गुप्तरूपसे राजाको विज्ञापित किया। राजाने भी यह वृत्तान्त जान कर उधर ही से सेनाके साथ आक्रमण किया । तो भी दुर्गको बड़ा दुर्गम समझ कर राजा स्वयं 'यशःपटल' नामक अपने प्रधान बलवान् पत्त हाथीपर चढ़ा । उसके पीछे सामछ नामक महावत खड़ा रहा । त्रिपोलिया दरवाजेके दोनों किवाड़ोंको, जिनके अंदर लोहेकी जबर्दस्त अर्गला लगी हुई थी, तोडनेके लिये उस हाथीने अपना सर्व सामर्थ्य खर्च कर दिया । किवाड़ तो टूट गये लेकिन हाथीकी हड्डी भी साथमें टूट गई। महावतने सिद्धराजको उस परसे उतारा और ज्यों ही यह स्वयं उस पर चढ़नेको उद्यत हुआ त्यों ही वह हाथी पृथ्वीपर गिर पड़ा। वह हाथी बड़ा वीर होनेके कारण मर कर अपने यशसे धवल हो कर घउसर ग्राममें यशोधवल नाम ग्रहण करके विनायक रूपसे अवतीर्ण हुआ । १३५. सिद्धिके स्तनमण्डलके तटदेशके आघातके कारण मानो जिसका दूसरा दांत टूट गया है, वह एक दाँत धारण करनेवाला गजवदन ( विनायक ) तुम्हारा श्रेय करे । इस तरह उसकी स्तुति [की जाती] है । इस प्रकार दुर्गका भग करने पर युद्धमें आरूढ़ यशोवर्मा को [ सन्धि-विग्रहादि ] ६ गुणोंसे बाँध कर, उस जगह पर अपनी जगन्मान्य आज्ञाकी उद्घोषणा करवाई और यशोवर्मा [ राजाको बन्दि बना कर अपने साथमें ले ] पत्तन में आया । [ पर क्षत्रियोंने ऐसी स्तुतिया पढ़ीं-] [८९] ओ क्षत्रियो, ऐसा न समझो कि इस सिद्धराज के कृपाणने अनेक राजाओंकी सेनाका नाश किया है इसलिये अब इसकी धार कुंठित हो गई है। नहीं नहीं; प्रज्वल प्रतापरूप अग्निके ऊपर आरूढ हो कर यह सप्ताणधार (=१ जिसने धारा नगरीको प्राप्त किया है, २ जिसने तेजदार धार पाई है) कृपाण चिरकाल तक मालव रमणियोंका अश्रुजल पी कर और अधिक तेज होगा [९०] हे महाराज ! आपने शत्रुओंके विजय करनेमें दुग्धकी धाराके समान जो उज्ज्वल यश प्राप्त किया है उसके कारण आपकी तलवार तो उज्ज्वल ही थी पर इन मालव-नारियोंके काजल [मिश्रित अश्रुजल] पी पी कर, इसने, तुम्हारी महिमा सूचक, यह कालिका धारण कर ली है ।।

प्रकरण ९६-९७ ] सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन [ ७१ सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन । ९७) प्रति दिन सब दर्शन [के आचार्यों] को आशीर्वाद और दानके लिये बुलाये जाने पर, यथावसर बुलाये गये श्री हेमचन्द्र प्रभृति जैनाचार्य श्री सिद्धराज के पास गये । राजाके दुकूल आदि दे कर उनका सत्कार करने पर, उन सभी अप्रतिम प्रतिभा पूर्ण पंडितों द्वारा दोनों तरह पुरस्कृत हो कर हेमचन्द्राचार्य ने राजाको इस प्रकार आशीर्वाद दिया- १३६. हे कामधेनु ! तू अपने गोमयके रससे भूमिका आसेचन कर, हे समुद्रो ! तुम अपने मोतियोंसे स्वस्तिक बनाओ, हे चन्द्र ! तूं पूर्णकुंभ बन जा और हे दिग्गजो ! तुम अपने सरल सूंडोंसे कल्पवृक्षके पत्ते तोड़ कर उनके तोरण सजाओ - क्यों कि संसारका विजय करके सिद्धराज आ रहा है । इस प्रकार निष्प्रपञ्च (सरल) काव्यके विवेचन करने पर उनकी वचन-चातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर राजाने [यथेष्ट] प्रशंसा की । इस पर कुछ असहिष्णुओके-अर्थात् ब्राह्मणोंके-यह कहने पर कि 'हमारे शास्त्रोंके - अर्थात् पाणिन्यादि व्याकरण ग्रंथोंके - अध्ययनके बल पर ही इन (जैनों) की विद्वत्ता है।' राजाने श्री हेमचन्द्र आचार्यसे पूछा । [उन्होंने कहा-] प्राचीन कालमें श्री जिनेन्द्र महावीर ने अपने शासन कालमें इन्द्रके सामने जिसकी व्याख्या की थी उसी जैनेन्द्र व्याकरणको हम लोग पढ़ते हैं । उनके ऐसा कहने पर उस पिशुनने कहा कि इन पुरानी बातोंको तो छोड़ दो और हमारे समयके ही किसी तुम्हारे व्याकरण कर्त्ताका पता बता सकते हो तो बताओ । इस पर वे राजासे बोले कि यदि महाराज श्री सिद्धराज सहायक हों तो, मैं ही स्वयं कुछ दिनोंमें ही पञ्चाङ्ग पूर्ण नूतन व्याकरण तैयार कर सकता हूँ। राजाने कहा- मैंने [साहाय्य करना] स्वीकार किया। आप अपने वचनका निर्वाह करें । ऐसा कह कर उसने सब सूरियोंको विदा किया । वे भी अपने अपने स्थानको गये । राजाने [पहले ही यह एक] प्रतिज्ञा करली थी कि यशोवर्माके हाथमें बिना म्यानकी छुरी देकर और उसको अपने पीछे बिठा कर हाथी पर सवार होकर हम नगरमें प्रवेश करेंगे । राजाकी इस प्रतिज्ञाको सुन कर मुञ्जाल नामक मंत्री [असंतुष्ट बना और उस] ने प्रधान पद छोड़ दिया । राजाके बार बार कारण पूछने पर १३७. राजा लोग चाहे सन्धि [करना] न जाने और विग्रह भी [करना] न जाने; पर यदि वे [मंत्रियोंका] आख्यात (कहा हुआ) ही सुनते रहें तो इसीसे वे पण्डित हो सकते हैं । इस प्रकारका नीतिशास्त्रका उपदेश है। महाराजने स्वयं अपनी बुद्धिसे जो यह प्रतिज्ञा की है, भविष्यमें यह बिल्कुल ही हितकर न होगी। राजाने प्रतिज्ञाभंग होनेके भयसे भीत हो कर कहा कि 'प्राणोंका त्याग करना अच्छा है। किन्तु विश्वविदित इस प्रतिज्ञाका नहीं।' इस पर मंत्रीने काठकी छुरी बना कर शालवृक्षके पाण्डुरंगके गोंदसे उसे परिमार्जित कर, पीछेके आसन पर बैठे हुए यशोवर्माके हाथमें दी । उसके आगेके आसन पर राजा सिद्धराज बैठा और खूब समारोहके साथ उसने अणहिल्लपुरमें प्रवेश किया । प्रावेशिक मंगलकी धूमधाम समाप्त हो जाने पर राजाने व्याकरण वृत्तान्तकी याद दिलाई। इस पर बहुतसे देशोंके तज्ज्ञ पंडितोंके साथ सभी व्याकरणोंको नगरमें मंगवा कर श्री हेमचन्द्राचार्य ने श्री सिद्धहैम नामक नूतन पञ्चाङ्ग व्याकरण एक वर्षमें तैयार किया । इसका ग्रंथप्रमाण सवालाख श्लोक था । राजाके निजके बैठनेके हाथी पर उस पुस्तकको रख कर उसका जुलूस निकाला गया। उसके ऊपर श्वेतच्छत्र लगाया गया और दो चामरग्राहिणिया चामर झलने लगीं । इस प्रकार उस ग्रंथकी महिमा करके उसे कोषागारमें रखा। फिर राजाकी

७२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश आज्ञासे अन्य व्याकरणोंको छोड़कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर किसी मत्सरने राजासे कहा कि 'इस व्याकरणमें आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है।' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह बात किसी राजपुरुषसे जान कर श्रीहेमाचार्यने [तत्क्षण] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया। प्रातःकाल जब राजसभा में व्याकरण बांचा गया तो- १३८. हरिकी भाँति बलि बंधकर (= १ बलिको बाँधनेवाला, २ बलियोंको बंदी करनेवाला), शिवकी नाँई त्रिशक्तियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (= १ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला- लक्ष्मीका आश्रय) श्री मूलराज नृपकी जय हो। इत्यादि, चौलुक्य वंशकी स्तुतिवाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोंके अन्तमे आये सुन कर राजा मनमें प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्रीसिद्धराज के दिग्विजय वर्णनमें [हेमाचार्यने] द्वयाश्रय नामक [काव्य] ग्रंथ बनाया। [हेमाचार्यके बनाए इस सिद्ध हेम व्याकरण के विषयमें विद्वानोंने ऐसी उक्तियाँ कही हैं-] १३९. हे भाई! पाणिनि के प्रलापको बंद करो, कातन्त्र का चीथड़ा मत फाड़ो शाकटायन के कटु वचनको मत पढ़ो, और क्षुद्र चांद्रव्याकरण से क्या मतलब है, भलौँ, और कण्ठाभरण आदि व्याकरणोंसे अपने आपको कोई क्यों भुलायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्धहेम की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं। ९८) इसके बाद, श्री सिद्धराज ने पत्तन में यशोवर्मराजा को, त्रिपुरुषप्रभृति सभी राजप्रासादों और सहस्रलिंग प्रभृति धर्मस्थानोंको दिखा कर बताया कि-[हमारे राज्यमें] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़ द्रव्य व्यय किया जाता है।! और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर?'। वह बोला-मैं तो अठारह लाख संख्यावाले (!) मालवदेश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ?। पर यह देश तो पहले ही महाकालदेव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मालवी लोग उपभोग कर रहे हैं; और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है। आपके वंशवाले राजा भी इतना देवद्रव्य व्यय करनेमें असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार वे विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायेंगे। * सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना। ९९) इसके पश्चात, एक बार श्री सिद्धराज ने सिद्धपुर में रुद्रमहालय का प्रासाद बनवाना चाहा। किसी [प्रसिद्ध] स्थपति (कारीगर) को अपने पास रख कर, प्रासादके प्रारंभ होनेके समय उसकी कंठासिकाको-जो उसने किसी साहूकारके यहाँ एक लाखमें बंधक रखी थी-छुड़ा कर उसको दिलवाई। वह बांसकी कमचियोंकी बनी हुई थी; उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है? इस पर उस स्थपतिने कहा कि मैने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है। फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते हुए भी लौटा दिया। फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सर्वाङ्गपूर्ण प्रासाद बनवाया। उस प्रासादमें अश्वपति, गजपति, नरपति प्रभृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ बनवा कर रखीं और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी मूर्ति भी बनवाई। [जिसका आशय यह है कि राजा] उनसे वर माँगता है कि देशका भङ्ग करते हुए भी इस प्रासादका कोई भंग न करें। उस मंदिर पर ध्वजारोपका उत्सव करते समय सभी जैन प्रासादोंकी पताकायें उतरवा दी गईं। जैसे मालव देश के महाकालके मंदिरमें जब वैजयंती चढ़ाई जाती है तब जैन प्रासादोंमें ध्वजारोपण नहीं होने पाता। १ यह कलासिका नामका कारीगरका कोई ओजार है जिसका ठीक अर्थ समझमें नहीं आता।

प्रकरण ९९-१०१ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । [ ७३ सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । १००) एकवार, सिद्धराज ने मालवक मण्डलके प्रति जाना चाहा तब किसी व्यवहारीने [ जो उस काममें नियुक्त अधिकारी था ] सहस्रलिंग सरोवरके कारखानेके लिये कुछ द्रव्य और भाग माँगा । राजा उसे कुछ भी दिये बिना चला गया । कुछ दिनोंके बाद द्रव्याभावसे उस कामके चलनेमें देरी होते देख, उस व्यवहारी (अधिकारी) ने अपने लड़केसे किसी धनाढ्य पुरुषकी स्त्रीका ताडंक (करन फूल) चुरा लिया, और फिर स्वयं उसके दण्डस्वरूप तीन लाख द्रव्य दे दिया । उससे वह काम पूरा हो गया । यह बात मालव मण्डलमें, वर्षाकालमें ठहरे हुए राजाने सुनी । सुन कर उसे जो आनन्द हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसके बाद वर्षाकालकी घनी वृष्टिसे जब सारी पृथ्वी एक समुद्रकी भाँति जलमय हो गई तो प्रधान पुरुषोंने राजाको बधाई देनेके लिये किसी मरुदेश वासीको भेजा । उसने [जा कर] राजाके सामने विस्तार पूर्वक वर्षाका स्वरूप कहना आरम्भ किया । इसी बीच, उसी समय आया हुआ कोई धूर्त गुजराती जल्दीसे बोल उठा—‘महाराज बधाई ! सहस्रलिंग सरोवर [जलसे परिपूर्ण] भर गया है । उसके ऐसा कहनेके साथ ही राजाने उस गुजरातीको अपने शरीरके सारे आभरण दे दिये । वह मरुवासी छींकेसे गिरे हुए मार्जार की भाँति देखता ही रह गया । १०१) इसके बाद, वर्षा बीतते ही, राजा वहाँसे लोटा । [रास्तेमें] नगर महास्थान (वडनगर) में डेरा डाला और वहाँ बनवाये गए मच-मडपमें राजसभाकी बैठक की गई । नगरके प्रासादोंमें ध्वज लगे हुए देख कर ब्राह्मणोंसे पूछा कि ‘ये कौनसे प्रासाद हैं ?’ उन्होंने जब वहाँके जिन और ब्रह्माके मंदिरोंका हाल बताया तो क्रुद्ध हो कर राजाने कहा कि ‘जब मैंने गूर्जर मडलमें, जैन मदिरोंमें पताका लगानेका निषेध किया है, तो फिर आप लोगोंके इस नगरमें इन जैन मंदिरों पर ये पताकायें क्यों उड़ रहीं हैं ?’ उन्होंने कहा कि—‘सुनिये, कृतयुगके प्रारंभमें श्रीमन्महादेवने इस महास्थान की स्थापना करते हुए श्री ऋषभनाथ और श्री ब्रह्मदेवके प्रासाद स्वयं बनाये और उन पर ध्वजायें चढाईं । सो इन दोनों प्रासादोंका सुकृतियों द्वारा उद्धार होते रहने पर ये चार युग बीत गये । दूसरी बात यह है कि—पहले यह नगर शत्रुञ्जय महागिरिकी उपत्यका भूमि था । क्यों कि नगर पुराण में भी कहा है कि— १४०. कहा जाता हे कि आदिकालमें इस जिनेश्वरके पर्वतकी मूलभूमिका विस्तार पचास योजन था ऊपरकी भूमिका विस्तार दश योजन था और ऊँचाई आठ योजन थी । कृतयुगमें आदिदेव श्री ऋषभदेव के पुत्र भरत नामरूप हुए । उन्हींके नामसे यह ‘भरतखण्ड’ प्रसिद्ध हुआ । १४१. नाभि और [उनकी पत्नी] मरुदेवीके पुत्र श्री वृषभ (ऋषभ देव) हुए जिन्होंने समदृक् हो कर मुनियोग्य चर्याका आचरण किया । वे स्वच्छ, प्रशान्त अन्त करण, समदृक् और सुधी थे । ऋषिगण उनके अर्हत पदको मानते हैं । १४२. मरुदेवी के गर्भसे नाभिके (श्री ऋषभदेव) पुत्र हुए जो अष्टम [विष्णुके अवतार स्वरूप] थे और सब आश्रमसे नमस्कृत थे । जिन्होंने धीरोंको अथवा वीरोंको [मोक्षका] मार्ग दिखाया । (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित-अनुवादवाले-श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [९१] स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामरूप हुए, उनके पुत्र हुए अग्नीन्ध्र, उनके नाभि और उनके पुत्र ऋषभ । १९-२०

७४ ] प्रबंधचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [९२] मोक्षधर्मका विधान करनेकी इच्छासे वासुदेव ही अंशरूपसे अवतीर्ण हुए हैं, यह बात उनके निश्चयमें [ मुनियोंने ] कही है । उनके सौ पुत्र हुए जो सभी ब्रह्मपारंगत थे । [९३] उनमें सबसे ज्येष्ठ भरत थे जो नारायणके भक्त थे । जिनके नामसे यह अद्भुत ऐसा भारतवर्ष विख्यात हुआ । [९४] अर्हन्, शिव, भव, विष्णु, सिद्ध, बुद्ध, परमात्मा, और पर—ये सभी शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं । [९५] मनीषियोंने जैन, बौद्ध, ब्राह्म, शैव, कापिल और नास्तिक इन छहोंको दर्शन कहा है । [९६] उसमें, इन सबके कुलके आदि बीज विमलवाहन हैं । मरुदेव और नाभि ये भरतखंडमें कुल-सत्तम ( कुलश्रेष्ठ ) हुए । इत्यादि पुराण वाक्योंको सुना कर, विशेष विश्वासके लिए ऋषभदेवके मन्दिरके भण्डारमेंसे, राजा भरतके नामसे अंकित, पाँच आदमियों द्वारा उठाये जाने लायक काँसेका बड़ा ताल ले आ कर राजाको ब्राह्मणोंने दिखाया । और इस प्रकार जैनधर्मका आदिधर्म होना उन्होंने सिद्ध किया । इसके बाद खेदसे मनमें खिन्न हो कर राजाने, एक वर्षके बाद, जैन मंदिरों पर पुनः ध्वजारोपण करवाये । १०२) तदुपरान्त, पत्तन में पहुँचने पर राजाको जब सरोवरके खर्चका हिसाब बताया गया तो व्यवहारीके उस अपराधी पुत्रसे दण्डस्वरूप तीन लाख लिये जानेकी भी बात सुनी । यह तीन लाख उसके घर भिजवा दिया । इसके बाद वह व्यवहारी राजाके लिये हाथमें भेंट ले कर उसके समीप आया और बोला कि ‘यह आपने क्या किया!’ तब फिर उस कर्मस्थायके अधिकारी व्यवहारीसे राजाने कहा— ‘जो व्यवहारी कोटीध्वज है वह ताडङ्कका चोरनेवाला कैसे हो सकता है ? तुमने इस धर्मस्थानके बनवानेमें कुछ धर्मभाग मांगा था, लेकिन उसके न मिलने पर प्रपञ्चमें चतुर—तथा मुँहसे मृग और भीतरसे व्याघ्रकी वृत्तिवाले, ऊपरसे गूथ सरछ और अंतरसे शठभागवाले मनुष्यकी तरह—तुम्हींने यह कर्म ( ताडङ्ककी चोरी ) करवाया है।’ [ इस प्रकारकी और भी कितनी ही बातें कह कर उसे खूब लज्जित किया । ] १४३. जिस सरोवरके भीतर, शिवके मन्दिरके दीपक प्रतिबिंबित हो कर पातालमें सर्पोंके सिरपरके मणियोंकी भाँति शोभा पाते हैं । १४४. सिद्धराजके इस सरोवरके शोभित रहते, मेरा मन मानसरोवरमें नहीं रमता, पम्पा सर उसका आनंद सम्पादन नहीं करता और अच्छोद सरोवर, जिसका जल बहुत ही अच्छा है, यह भी असार ( जान पड़ता ) है । * एक बार श्री सिद्धराजने रामचन्द्र [ कवि ] से पूछा ‘ग्रीष्म ऋतुमें दिन क्यों बड़े होते हैं ?’ रामचन्द्रने कहा— [९७] हे श्री गिरिदुर्गके मल्ल महाराज ! आपके दिग्विजयके उत्सवमें दौड़ते हुए वीरोंके घोड़ोंकी टापसे पृथ्वीमण्डल खोद डाला गया है और इससे उड़ी हुई उसकी धूलने जा कर आकाशगंगाने मिल कर उसे पंकावलीके रूपमें परिणत कर दिया है। इससे उसमें दूर्वा उग गई है और उसे सूर्यके घोड़े चरने लग गये हैं । इसी लिए यह दिन बड़ा हो गया है ।

प्रकरण १०२-१०३ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना . [ ७५ [ ९८] मार्गणोंने तुम्हारे शत्रुओंके पास लक्ष ( निशाना ) पा लिया है और तुम्हारे पास वे विलक्ष ( निशानेसे रहित ) हो कर रहे हैं। फिर भी हे सिद्धराज ! तुम्हारा 'दाता'पनका जो यश है वह ऊपर सिर उठाये रह रहा है-बढ़ता चला जाता है ! * इसके बाद, एक बार राजाने प्रथिनाचार्य जयमङ्गल सूरि से नगरवर्णन करनेको कहा । उन्होंने कहा- [९९] मालूम होता है कि इस नगरीकी नागरिकोंके चातुर्यसे निर्जित हो कर सरस्वती देवी है सो हक्की-बक्की-सी हो कर अपनी कच्छपी वीणाको अपने बाहुसे उतार कर यहाँ पर छोड़ दी है और स्वयं पानी वहन करने लगी है। उसकी इस वीणाका यह सहस्रलिंग सरोवर तो मानों तुंबा है और कीर्तिस्तंभ मानों उसका उच्च दण्ड है । १०३) इसके बाद, जब श्रीपाल कविकी रची हुई सहस्रलिङ्गसरोवरकी प्रशस्ति, पट्टिका पर लिखी गई तो उसके संशोधनके लिये सर्व दर्शनके ( आचार्योंके ) बुलाये जाने पर श्रीहेमचंद्राचार्य ने [ अपने प्रधान शिष्य ] रामचंद्र पण्डितको यह कह कर भेजा कि 'प्रशस्ति काव्य जो सभी विद्वानोंको अनुमत हो तो उसमें अपना कुछ भी पाण्डित्य मत दिखाना ।' फिर उन सब विद्वानोंने प्रशस्ति काव्यको शोधनेकी दृष्टिसे पढ़ा और राजाके अनुरोधसे तथा श्रीपालकविकी चतुरतापूर्ण पाण्डित्यसे प्रसन्न हो कर सारे काव्यको मान्य किया । उसमें भी उन सभीने निम्नलिखित काव्यकी विशेष प्रशंसा की- १४५. " कोशसे युक्त होते हुए भी तथा दल ( १ पत्ता, २ सेना ) से समृद्ध हो कर भी यह कमल अपने ही कण्टकोंके समूहको उच्छिन्न करनेमें असमर्थ है और इसके अतिरिक्त पुंस्त्व भी नहीं धारण करता । ( कमल शब्द पुंल्लिंग नहीं है ) [ दूसरी ओर सिद्धराज का जो कृपाण है ] यह अकेला ही बिना कोश- ( म्यान ) के भी भूतलको निष्कण्टक कर रहा है, ऐसा समझ कर लक्ष्मीने [ अपने उस निवासस्थान रूप ] कमलको छोड़ कर इसके कृपाणका आश्रय लिया है। इस विषयमें श्री सिद्धराज ने रामचन्द्र से खास पूछा तो उसने कहा कि 'यह कुछ सदोष है।' उन सभी पंडितोंसे पूछे जाने पर [ उसने कहा कि ] 'इस काव्यमें सेनाका वाचक 'दल' शब्द और कमल शब्दका 'नित्यक्लीवत्व' ये दो दोष चिन्तनीय हैं। तब उन सभी पंडितोंसे अनुरोध करके राजाने 'दल' शब्दको तो सेनाके अर्थमें प्रमाणित कराया। किन्तु कमल शब्दका 'नित्यक्लीबत्व' जो लिङ्गानुशासनसे असिद्ध है उसे कौन प्रमाणित कर सकता । इसलिये 'पुंस्त्वं च धत्ते न वा' (कभी पुंस्त्व धारण करता है, कभी नहीं) इस प्रकार इस पदमें अक्षरभेद करवाया [ जिससे वह अशुद्धि दूर हो गई ] । उस समय रामचन्द्र को सिद्धराज का दृष्टिदोष लगा और वह ज्यों ही वसतिमें प्रवेश करने लगा त्यों ही उसकी एक आँख नष्ट हो गई । * १ इस श्लोकमें 'मार्गण' और 'लक्ष' शब्द पर श्लेष है । 'मार्गण' का एक अर्थ है बाण और दूसरा अर्थ है मंगन=याचक । 'लक्ष' का एक अर्थ है लाख संख्या परिमित द्रव्य और दूसरा अर्थ है लक्ष्य=निशाना । मार्गणका अर्थ जब बाण ऐसा विवक्षित है तब उसके साथ लक्षका अर्थ निशाना लेना होगा; और जब मंगन=याचक ऐसा अर्थ अपेक्षित होगा तब लक्षका अर्थ लाख द्रव्य लेना होगा । सिद्धराजके मार्गण याने बाण विपक्ष याने शत्रुके पक्षमें लब्धलक्ष्य-निशाना प्राप्त करनेवाले

  • होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते; और वे ही बाण (शत्रुके फेंके हुए) सिद्धराजके पक्षमें विलक्ष-लक्ष्यभ्रष्ट हो कर रह जाते हैं। इससे विपरीत, मार्गण याने याचक लोग हैं वे सिद्धराजके पास लब्धलक्ष याने लाखोंका द्रव्य प्राप्त करते हैं और शत्रु राजाओंके पास विलक्ष याने विगतलक्ष-बिनाही प्राप्तिके रह जाते हैं।

७६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश १०४) किसी समय, सान्धिविग्रहिकों द्वारा डाहल देशके राजाका निम्न लिखित श्लोक, जो यमल पत्र (मित्रताका संबंध सूचक पत्र) पर लिखा हुआ था, सुनाया गया- १४६. आ-युक्त हो कर लोकमें प्राणदान करता है, वि-युक्त हो कर मुनियोंको प्रिय होता है, सं-युक्त हो कर सर्वथा अनिष्ट कारक बनता है और केवल-अकेला होने पर स्त्रियोंका प्रिय बनता है। राजाने पूछा कि 'इसमें क्या बात है?' उन्होंने कहा- 'आपके देशमें एक-से-एक प्रधान ऐसे बहुतसे विद्वान् रहते हैं। सो उनसे इस दुर्बोध्य श्लोककी व्याख्या कराइये।' उनकी यह बात सुन कर सभी विद्वान् उसका अर्थ सोचने लगे पर किसीकी समझमें नहीं आया। राजाने आचार्य हेमचन्द्र से पूछा। उन्होंने इस प्रकार व्याख्या की- 'इसमें 'हार' शब्दका अध्याहार है। उसके साथ 'आ' उपसर्गका योग होनेसे 'आहार' बनता है जो सब जीवोंको प्राण देता है। 'वि' उपसर्गके योगसे 'विहार' बन कर दोनों तरहसे यतियोंका प्रिय होता है। 'सं' के योगसे 'संहार' बनता है जो सर्वथा अनिष्ट लगता है और बिना किसी उपसर्गके स्त्रियोंका प्रिय आभूषण गलेका 'हार' होता है।' * १०५) एक दूसरी बार, सपादलक्ष देशके राजाने 'उगी हुई चन्द्रकला तो गौरीके मुखकमलका अनुहार नहीं कर सकती।' इस प्रकारकी समस्यावाला आधा दोहा यहाँ पर (पाटनमें) भेजा। अन्यान्य उन कवियोंके उसकी पूर्ति न करने पर '(और) जो न देखी गई वैसी प्रतिपदाकी चन्द्रकलाकी उपमा दी कैसे जाय।' इस प्रकारका उत्तरार्द्ध कह कर मुनीन्द्र हेमचन्द्रने उसको पूर्ण किया। * सिद्धराजका सौराष्ट्रके राजा खंगारको विजय करना। १०६) श्रीसिद्धराजने, नवघण नामक आभीर राणाका निग्रह करनेमें, पहले ग्यारह बार अपनी सेनाका पराजित होना जान कर, बर्द्धमान (वडधाण) आदि नगरोंमें बड़े बड़े प्राकार बनवा कर, स्वयम् ही उसके लिये प्रयाण किया। उस (नवघन) के भगिनी पुत्रने [किलेका रहस्य आदि बतलानेवाले] संकेत देते समय यह वचन लिया था कि 'किलेका कब्जा करते समय इस नवघन को सिर्फ द्रव्यमारसे मारना (अर्थात् भारी दण्ड दे कर द्रव्य वसूल करना), लेकिन किसी शस्त्रके मारसे नहीं मारना।' [राजाके किल सर कर लेने पर] उस नवघनको उसकी स्त्रीने कहीं अन्दर छुपा दिया जिसको राजाने उस विशाल महलमेंसे बहार खींच निकाला और धनके भरे हुए बर्तनोंसे उसे पीट पीट कर मार डाला। उसकी स्त्रीको यह कह कर कि 'इसको हमने द्रव्यके मारसे ही मारा है' अपने वचनका पालन बतलाया और उसे शांत किया। शोकसे निमग्न उसकी रानी [सूनलदेवी] के ये वाक्य कहे जाते हैं- १४८. वह राणा स्वघरमें नहीं है। न कोई उसे लाया है, न कोई लायेगा। खंगारके साथ मैं स्वयं अपने प्राण अग्निमें क्यों न होम दूँ। १४९. और सब राणा तो बनिये हैं और उनमें यह जेसल (जय सिंह) बड़ा सेठ है। हमारे गढके नीचे इसने यह कैसा व्योपार मांड रखा है। १५०. हे गौरवशाली गिरनार तैंने क्यों मनमें मात्सर्य धारण कर लिया है ? खंगार के मरने पर तैंने अपना एक शिखर भी नहीं गिराया।

प्रकरण १०४-१०८ ] सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना [ ७७ [ १०१ ] हे गरवा गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ । [ खंगार के लिये ] लंबा बुलावा आया है । इसके जैसा भारक्षम ( समर्थ ) सज्जन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा । [ १०२ ] मुझको इतने-ही-से संतोष होगा, जो प्रभु ( स्वामी ) के पगोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ] प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोष है । ये दोनों खंगार के साथ चले गये । [ १०३ ] हे मन ! अब तंबोल मत माँगो, खुले मुँह मत झांको । देउलवाडे के संग्राममें खंगार के साथ वह सब चला गया है । [ १०४ ] हे जेसल ! मेरी बाँह मत मोडो और वारंवार विरूप भाव न बताओ । नवघनके बिना नदीमें नया प्रवाह नहीं आता । [ १०५ ] हे वढवाण ! मैं तुझसे क्या लडूं - भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती । हे भोगावा ( वढवाण के पासकी नदी ) तँने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया । इस प्रकारके बहुतसे वाक्ये [ कहे जाते ] हैं । ये यथाप्रसंग जानलेने योग्य हैं । १०७) इसके बाद, महं० जाम्ब के वंशज दण्डाधिपति सज्जन की योग्यता देखकर उसे सुराष्ट्र देश का प्रबन्धक ( गवर्नर ) नियुक्त किया । उसने स्वामीको बिना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए [ राजकीय ] द्रव्यसे श्री उज्जयन्त ( गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पत्थरका मन्दिर बनवाया । चौथे वर्ष चार सामंतोंको भेज कर राजाने सज्जन दण्डाधिपतिको पत्तन में बुलवाया । उससे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला - 'महाराज ! श्री उज्जयन्त के मंदिरके जीर्णोद्धारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनोंमेंसे चाहे सो एक ले लें ।' उसके ऐसा बताने पर उसकी अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्धराज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया । वह सज्जन फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुंजय और उज्जयन्त इन दोनों तीर्थोंमें उनके बीचके बारह योजन विस्तृत अन्तरके जितना ही लंबा दुकूलका बना हुआ महाध्वज चढ़ाया । इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना । .१०८) इसके बाद, एक बार फिर सोमेश्वर की यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्धराज ने, रैवतकगिरिकी उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन ( मन्दिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनवाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका है, इसलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है ।' राजाने वहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और शत्रुञ्जय महातीर्थके पास आ कर पड़ार डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले कर तीर्थ पर जानेका मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सबेरा होनेके पहले ही, कापड़ीका वेष बना कर, और जिसके दोनों ओर गंगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी बहंगी कंधे पर रख कर, खुद इन ब्राह्मणोंके बीचमें हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किसीने उसके स्वरूपको नहीं जाना । [ ऊपर जा कर ] गंगाजलसे श्री युगादि देव ( ऋषभनाथ ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उस १ ये जो वाक्य ऊपर अनूदित किये गये हैं, उनमेंका कितनाक कथन अस्पष्ट और अस्फुटार्थक है । जो अर्थ यहा पर दिया गया है यह निर्भ्रान्त है ऐसा नहीं कह सकते ।

७८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर वह उन्मुद्रित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नाँई खडा रह गया । [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी-वन और नदियोंसे परिपूर्ण पर्वत पर, यहीं, [ नये ] विंध्यवनकी रचना करूँगा ' - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाथ हो गया था, उस मनोरथसे मैने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ यह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। * वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन । १०९) अथ यहाँ पर देवसूरिका चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुदचंद्र नामक दिगम्बर [ विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्णाटक देशसे गूर्जर देशको जीतनेकी इच्छासे कर्णावती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देवसूरि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक बार श्री अरिष्टनेमिके मंदिरमें जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिष्ट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी । उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुदचन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रोंमें प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवाचार्य की बहन तपोवना शीलसुन्दरी को चेटकाधिष्ठित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक ( टोना आदि ) के दूर होने पर वह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट पराभवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्त्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे। ( यहाँ पर P प्रतिमें इस विषयके निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [ १०३ ] हा ! मै किसके आगे पुकार करूँ ? मेरे प्रभु तो कर्णरहित हैं। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। [ साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे- ] [ १०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कण्ठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओंका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ !-जो मैं उनके शासन ( धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारकी विडंबनाओके डबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ । [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] [१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेतांबरोंके अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दूर्वा जैसी है, गुरुवर श्री देवसूरिके ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे। श्री देवसूरिने [ दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्याविनोद ( शास्त्रार्थ-विनोद ) के लिये आप पत्तन चलें। वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे ।' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्तन को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्धराजने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वही डेरा डाल कर ठहरा। सिद्धराज ने

प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [ ७३ श्रीहेमाचार्यसे वादमें निष्णात ऐसे आचार्यकी बात पूछी। उन्होंने चारों विद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त, जैन मुनिरूप हाथियोंके यूथपति, श्वेतांबर शासनके लिये वज्रके प्राकार जैसे मानेजानेवाले, राजसभाके शृंगारहार, कर्णावती में [ चातुर्मास ] रहे हुए, वादविद्याके पारगामी, वादिहस्तियोंके लिये सिंहस्वरूप श्रीदेवाचार्य को बताया । इसके बाद उनको बुलानेके लिये, श्री संघके लेखके साथ राजाकी विज्ञाप्तिका वहा पहुंची। उसे पा कर देवसूरि पत्तन में आये और राजाके अनुरोधसे वाग्देवीकी आराधना की । उस देवीने आदेश दिया कि-- ‘वाद करते समय, वादिवेतालीय श्रीशान्तिसूरि विरचित उत्तराध्ययन बृहद्वृत्तिमें उल्लिखित दिगंबर वादस्थल विषयक चौरासी विकल्प जालका उपन्यास करके, उसे प्रपंचित करोगे तो दिगंबरके मुखमें मुद्रा लग जायगी ।’ देवीके इस आदेशके बाद, गुप्त भावसे कुमुद चंद्र के पास पंडितोंको यह जाननेके लिये भेजा कि किस शास्त्रमें इसकी विशेष कुशलता है। उनके द्वारा उसकी यह निम्न लिखित उक्ति सुनी- १५३. हे देव ! आदेश कीजिये में सहसा क्या करूं ? लंकाको यहीं ले आऊं, या जंबूद्वीपको यहाँसे ले जाऊं ?, क्या समुद्रको सुखा दूं, या उस उच्च पर्वतको, जिसकी चोटीका एक पत्थर कैलास है, उसे खेल-ही-में उखाड़ कर समुद्रको बाँध दूँ, कि जिसके प्रक्षेपसे क्षुब्ध हो कर समुद्रका पानी बढ़ जाय । इस उक्तिको सुन कर, श्रीदेवाचार्य और श्रीहेमाचार्य दोनों उसकी सिद्धान्तविषयक बहुत अल्प कुशलता समझ कर उसे अपने मनमें ‘जीत लिया, जीत लिया’ ऐसा मान बडे प्रसन्न हुए । इसके बाद देवसूरि आचार्यका प्रधान शिष्य रत्नप्रभ, प्रथम रात्रिमें गुप्त वेष करके कुमुदचंद्र के डेरेमें गया। उसने (कुमुदचंद्रने) पूछा कि- ‘तुम कौन हो?’; ‘मैं देव हूँ’; ‘देव कौन ?’; ‘मैं ?’; ‘मैं कौन ?’; ‘तुम कुत्ते’; ‘कुत्ता कौन ?’; ‘तुम’; ‘तुम कौन ?’; ‘मैं देव’; [ ‘तुम कहाँसे आये ?’; ‘स्वर्गसे’ ‘स्वर्गमें क्या बात चल रही है !’; ‘कुमुदचन्द्रका सिर ९५ पल है’; ‘इसमें प्रमाण क्या है?’ ‘काट कर तौल लो’] इस प्रकारकी उसकी उक्ति-प्रत्युक्ति के बंधनमें जब यह चाककी तरह चक्कर खाने लगा, तो अपनेको देव और दिगम्बरको श्वान बना कर, जैसे गया था वैसे ही लौट आया । [ पीछेसे ] उस चक्रदोषको ठीक ठीक समझा तो मनमें अतिशय विषण्ण हो कर, इस प्रकारकी उचित कविता बना कर उस मायावी कुमुदचन्द्रने देवसूरिके पास भेजी- १५४. अरे श्वेताम्बरो ! इस प्रकारके विकटाटोप वचनोंके द्वारा, संसार वृक्षके अतिविकट कोटरमें, इस मुग्ध जन-समूहको क्यों गिराते हो ? यदि तद्व्रतातत्त्वके विचारमें आप लोगोंको थोड़ीसी भी कामना हो तो सचमुच ही कुमुदचन्द्र के दोनों चरणोंका रात-दिन ध्यान किया करो । इसके बाद श्री देवसूरिके चरणका परम परमाणु (विनीत शिष्य), बुद्धिवैभवसे चाणक्य का भी उपहास करनेवाले पंडित माणिक्य ने निम्नलिखित श्लोक उसके पास भेजा- १५५. अरे! वह कौन है जो सिंहके केसराजालको पैरोंसे छूना चाहता है ? वह कौन है जो तेज भालेकी नोकसे अपनी आँख खुजाउना चाहता है ? वह कौन है जो नागराजके सिर परकी मणिको अपनी शोभाके लिये उतारना चाहता है ! जो यह करना चाहता है वही वंदनीय ऐसे श्वेतांबर शासनकी निन्दा करना चाहता है। फिर रत्नाकर पंडितने भी इस श्लोकको कुमुदचंद्रके पास उपहासके सहित भेजा- १५६. नंगो (दिगम्बरों) ने जो युवतियोंकी मुक्तिका निरोध किया है इसमें क्या तत्त्व है यह तो प्रकट ही है । फिर वृथा ही कर्कश तर्कके लिये यह अनर्थमूलक अभिलाषा क्यों करते हो !

८० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश श्री हेमचंद्राचार्य ने सुना कि श्री मयणल्ला देवी कुमुद चंद्र की पक्षपातिनी है और सभाके अपने संपर्कवाले सभ्योंसे उसकी जयके लिये नित्य अनुरोध कर रही है, तो उन्होंने, उन्हीं सभासदोंसे यह वृत्तान्त कहलवाया कि 'वादस्थल पर दिगंबर लोग तो स्वीकृत सुकृत्यको अप्रमाणित करेंगे और श्वेताम्बर प्रमाणित करेंगे।' यह सुन कर रानीने व्यवहारबहिर्मुख उस दिगंबर परसे अपना पक्षपात हटा लिया। इसके बाद, भाषोत्तर (वादका विषय) लिखानेके लिये कुमुदचंद्र तो पालकीमें बैठ कर, और पण्डित रत्नप्रभ पैदल ही चल कर, राजाके अक्षपटल (न्यायविभाग) कार्यालयमें आये। वहाँके अधिकारियोंको कुमुदचंद्रने अपनी यह भाषा (वादके विषयमें निजकी प्रतिज्ञा) लिखवाई- १५७. केवली होने पर [मनुष्य] भोजन नहीं करता, चीवर सहित [मनुष्य] निर्वाण नहीं पाता और स्त्रीजन्ममें मुक्ति नहीं मिलती। श्वेतांबरोंका इसके विरुद्ध यह उत्तर था- १५८. केवली होने पर भी [मनुष्य] भोजन करता है, सचीवर [मनुष्य] को भी निर्वाण मिलता है, और स्त्रीजन्ममें भी मुक्ति होती है-यह देवसूरिका मत है। इस प्रकार भाषा और उत्तर लिख लेनेके अनंतर वादका स्थान और समय निर्णीत हुआ। उसमें सिद्धराजके सभापतित्वमें, षड्दर्शन-प्रमाणको जाननेवाले सभ्यलोग जब उपस्थित हुए तो, तो सुखासन (पालकी) में बैठ कर, सिरपर श्वेत छत्र धारण किये हुए और जयडिंडिम बजाते हुए, वादी कुमुद चन्द्रने सभामें प्रवेश किया। उसके आगे बाणके सिरेपर, उसके प्राप्त किये हुए जयपत्र लटक रहे थे। सिद्धराजने उसके बैठनेके लिये सिंहासन दिलवाया। प्रभु श्री देवसूरिने मुनीन्द्र श्री हेमचंद्रके साथ सभामें एक ही आसनको अलंकृत किया। फिर, वादी कुमुदचंद्रने, जो अवस्थासे वृद्ध था, श्री हेमचंद्रसे - जिनकी शैशवावस्था कुछ ही समय पहले व्यतीत हुई थी; अर्थात् जो अब भी पूर्ण युवा नहीं हुए थे - कहा कि 'आपके द्वारा तक्र क्या पीत है! अर्थात्-आपने तक्र (छास) पी है?' इस पर श्री हेमचंद्रने उससे कहा-'क्या वृद्धावस्थाके कारण तुम्हारी बुद्धि अस्थिर हो गई है? जो ऐसा अनाप-सनाप बोल रहे हो! तक्र श्वेत होता है, पीत तो हल्दी होती है!' इस वाक्यसे नीचा मुँह हो कर उसने पूछा कि-'आप दोनोंमे वादी कौन है?' श्री सूरिने उसका कुछ तिरस्कार करनेके इरादेसे [अपनेको लक्ष्य कर लेकिन शब्दभेदके साथ ] कहा 'यह आपका प्रतिवादी है'। ऐसा कहने पर कुमुदचंद्र [उसके मर्मको ठीक न समझ कर] बोला-'मुझ वृद्धका इस शिशुके साथ क्या वाद हो सकता है?' उसकी यह बात सुन कर [आचार्य हेमचन्द्रने कहा-] 'वृद्ध तो मैं हूँ; और आप तो शिशु ही हैं-जो अब तक भी कंदोरा बाधना नहीं जानते और वस्त्र नहीं पहनते।' राजाके इन दोनोंकी इस प्रकारकी वितंडाका निषेध करने पर, परस्पर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा निश्चित हुई-"पराजित होने पर श्वेतांबर तो दिगंबर हो जायंगे, और [उसके विरुद्ध] दिगंबर देशत्याग करेंगे।" प्रतिज्ञा निश्चित हो जाने पर स्वदेशके कलंकसे डरनेवाले देवाचार्यने, सर्वानुवादका परिहार करके और देशानुवादका अनुसरण करके, कुमुदचंद्रसे कहा कि-'पहले आप ही अपना पक्ष स्थापित करें।' उनके ऐसा कहने पर कुमुदचंद्रने राजाको पहले यह आशीर्वाद दिया- १५९. हे राजन् ! आपके यशके स्मरण होने पर सूर्य खद्योतकी चमक जैसा प्रतीत होता है, चन्द्रमा पुराने मकड़ीके जालकी भाँति फीका जान पड़ता है और (हिमाच्छादित) पर्वत मशकसे जान पड़ते हैं। आकाश उसमें भौरे जैसा हो जाती है और इसके बाद तो वाणी बन्द हो जाती है।

प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [ ८१ उसके इस अपशब्दको सुन कर कि 'वाणी बंद हो जाती है'-सभ्य लोग उसे अपने ही हाथों बंधा समझ कर बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवाचार्यने राजाको, यह आशीर्वाद दिया- १६०. हे चालुक्य महाराज! तुम्हारा यह राज्य और यह जिनशासन चिरकाल तक प्रवर्तित रहे। (राज्यपक्षमें पहला अर्थ-) जो राज्य शत्रुओंको शान्ति नहीं प्राप्त करने देता है, उज्ज्वल आकाशकी-सी उल्लसित कीर्तिकी प्रभासे जो मनोहर हो रहा है, न्यायमार्गके प्रसारकी पद्धतियोंका जो गृह बना हुआ है और जिसमें परपक्षके हाथियोंका सदैव मद उतारनेवाले ऐसे कौन हाथी बलवान् नहीं है। (जिनशासनपक्षमें दूसरा अर्थ-) जो जिनशासन नारियों (स्त्रियों) को मुक्तिपद प्रदान करता है, श्वेतवस्त्रोंको धारण करनेवाले यतियोंकी उल्लसित कीर्तिसे मनोहर लग रहा है, नय मार्ग (जैन तत्त्व पद्धति) के विविध प्रस्तार और भङ्गियोंका गृहरूप है और जिसमें अन्य मतवादियोंके गर्वका जय करनेवाले केवलज्ञानी कभी भी भोजन नहीं करते ऐसा विधान नहीं है-यह जिनशासन चिरंजीव रहो। इसके बाद, वादी कुमुदचंद्रने केवलि-मुक्ति, स्त्री-मुक्ति और चीवर-सिद्धिके निराकरण रूप अपने पक्षके उपन्यासमें, कबूतर पक्षीकी भाँति मन्द मन्द और बार बार स्खलित वाणीसे बोलना शुरू किया। उसे देख कर सभ्यलोग, ऊपरसे तो उसे उत्साहपरक वचन कह रहे थे और अन्दर दिलमें हंस रहे थे। इस प्रकार कितनाक उपन्यास (स्वपक्ष स्थापन) करनेके बाद, अन्तमें [देवाचार्यको लक्ष्य करके कहा कि] 'अब आप बोलिये'। देवाचार्यने प्रलय कालमें उन्मीलित प्रचण्ड पवनसे विक्षुब्ध समुद्रके तरङ्गावातके समान गंभीर वाणीसे, उत्तराध्ययन सूत्रकी वृहद्वृत्तिमें कथन किये हुए चौरासी विकल्पोंका उपन्यास करना प्रारंभ किया। इसे देख कर, भास्वत् प्रकाशके प्रसारसे म्लान हो जाने वाले कुमुद-रात्रिविकासी कमल-की भाँति निष्प्रभ हृदय कुमुदचंद्रने भयसे चित्तमें भ्रान्त हो कर, उन बातको समझनेमें असमर्थ बन कर, फिरसे उसी उपन्यासके दुहरानेकी प्रार्थना की। श्रीसिद्धराजके तथा और सभ्योंके निषेध करने पर भी, उन्होंने उसे अप्रमेय प्रमेय लहरियोंके द्वारा प्रमाण-समुद्रमें डुबोना शुरू किया। इस तरह निरन्तर वाक्प्रवाह चलने पर, सोलहवें दिन अकस्मात् देवाचार्यका कण्ठ रुद्ध हो गया। तब मंत्रशास्त्रविद् श्री यशोभद्रसूरिने, जिन्होंने कुरु कुल्लादेवीके मंदिरमें अतुलनीय वर प्राप्त किया हुआ था, उनकी कण्ठनाडीसे क्षणभरमें क्षपणक (दिगंबर)के किये गये अभिचारके प्रभावसे पड़ा हुआ केशोंका गुच्छा बाहर निकाल दिया। इस विचित्र व्यापारके निरीक्षणसे चतुर लोगोंने श्री यशोभद्रसूरिकी भूरि प्रशंसा की और कुमुदचंद्र की खूब निंदा की। इस प्रकार (पहलेने) प्रमोद और (दूसरेने) विषाद् धारण किया। इसके बाद, देवसूरिने पक्षके उपन्यासके उपक्रममें 'फोटारोटि' शब्द कहा। कुमुदचंद्रने उस शब्दकी व्युत्पत्ति पूछी। तब काकल पंडित ने, जिसके कण्ठमें आठों व्याकरण घोट रहे थे, शाकटायन व्याकरणमें कहे हुए 'टाप् टीप्' सूत्रसे निष्पन्न 'फोटारोटिः' 'फोटीफोटिः' 'फोटिरोटिः' इन तीनों सिद्ध शब्दोंका निर्णय सुनाया। पहले-ही-मे 'वाचस्ततो मुद्रिता' इस कहे हुए अपशब्दके प्रभावसे उसका मुख मुद्रित (बन्द) हो गया; और फिर स्वयं ही बोला कि-'मैं श्री देवाचार्यसे जीता गया'। श्रीसिद्धराजने उसे पराजित कह कर अपद्वारसे बाहर कर दिया। इस पराभवके कारण उसका सिर फट गया और वह मर गया। इसके अनन्तर श्रीसिद्धराजने आनन्द उल्लसित मनसे देवाचार्यके प्रभावकी ख्याति करनेकी इच्छा की। उनके सिर पर चार श्वेतच्छत्र धारण करवाये गये, खूब सुंदर चामर ढलाये गये, शंखोंके युगल २१-२२

८२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश बजाये गये, डंकोंकी चोटसे मानों आकाशका पेट गुड़गुड़ा रहा था और उत्तम प्रकारकी दुंदुभियोंके नादसे दिगंतराल भरा जा रहा था। राजाने स्वयं अपने हाथका अवलंबन दे कर, 'हे वादि चक्रवर्ती, पधारिये !' ऐसी स्तुतिपूर्वक उन्हें राजसभासे प्रस्थान करवाया। वाहड नामक उपासकने उस समय तीन लाख [द्रम्म] याचकोंको दान किये। इस तरह जगत्के आनंद स्वरूप कन्द (मूल) के कन्दल (अंकुर) समान मंगलके वारंवार उच्चारित होने पर, उसी वाहड द्वारा बनवाये गये श्रीमहावीर देवके प्रासाद (मन्दिर) में, देवको नमस्कार करने बाद, उसीकी वसति (उपाश्रय) में जा कर उन्होंने आश्रय लिया। सूरिकी अनिच्छा होने पर भी राजाने उनको पारितोषिकके रूपमें छाला आदि बारह गांव भेंट दिये। [भिन्न भिन्न समर्थ आचार्यों द्वारा की गई ] उनकी स्तुतिके कुछ श्लोक इस प्रकार हैं- १६१. जिनके प्रसाद-ही-का मानों सुखप्रश्वके समय दर्शन (श्वेतांबर संप्रदाय) उच्चारण करता है, उन वस्त्रप्रतिष्ठाचार्य श्रीदेवसूरिको नमस्कार है। -इस प्रकार श्रीप्रद्युम्नाचार्यने कहा। १६२. यदि सूर्यके समान देवाचार्य, कुमुदचंद्रको न जीत पाते तो कौन श्वेतांबर, संसारमें कटिमें वस्त्र पहनने पाता ।- इस प्रकार हेमाचार्यने कहा। १६३. जिस नग्नने कीर्तिरूपी कंथा उपार्जन करके अपना व्रतभंग किया था, देवसूरिने उस कंथाको छीन कर उसे निर्ग्रन्थ (नंगा) कर दिया। - इस प्रकार श्री उदयप्रभ देवने कहा। १६४. अभी तक भी जिन्होंने खेल-शालाका त्याग नहीं किया उन देवसूरि (बृहस्पति) के साथ, वादविद्याको जानने वाले प्रभु देवसूरिकी, तुलना कैसे की जाय।- इस प्रकार श्री मुनिदेवाचार्यने कहा। १६५. जिनकी प्रतिभाके घाम-तेजसे [त्रस्त हो कर] कीर्तिरूपी योगवस्त्रका त्याग कर देने वाले [उस] नग्न [दिगंबर] को भारती ने मानों लाजके कारण छोड़ दिया, वह देवसूरि तुम्हारा कल्याण करें। १६६. अशेष केषोलियोंकी मुक्ति स्थापन कर जो सत्राकार बने तथा स्त्रियोंकी मुक्तिके युक्त उत्तर द्वारा मोक्ष तीर्थ बने, और नग्नको जीत लेने पर श्वेताम्बरशासनके प्रतिष्ठागुरु बने, उन प्रभु श्री देवसूरिकी महिमा, देवता और गुरुकी अपेक्षा भी अपरिमित है।- इस प्रकार दो श्लोक श्री मेरुतुंगसूरिने कहे। इस प्रकार यह देवसूरिका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । ११०) इसके बाद, पत्तनका रहने वाला, जिसका वंश विलुप्त हो गया है ऐसा, आभड नामक एक वणिकपुत्र कंसारेकी दुकान पर, गागर घिसनेका काम, किये करता था। उसको वहा रोज पाँच विशोपकका उपार्जन होता था। वह अपना सारा दिन उस काममें व्यतीत कर, दोनों शाम प्रभु श्री हेम सूरिके चरणोंके पास बैठ कर प्रतिक्रमण किये करता था। स्वभाव-ही-से चतुर होनेके कारण उसने अगस्त्य और बौद्ध मत आदिके

  • रत्न परीक्षा के ग्रंथोंको पढ़ डाला और रत्नपरीक्षकोंके निकट रह कर उस परीक्षामें दक्ष हो गया। किसी समय, श्री हेमचंद्र मुनीन्द्रके निकट उसने, धनाभावके कारण, स्वल्प प्रमाणमें परिग्रह-परिमाण व्रतका नियम लेना चाहा। सामुद्रिक विद्याके जानकार प्रभुने मणिबंधमें उसके भाग्य वैभवका खूब प्रसार होना जान कर, तीन लाख द्रम्मसे अधिक द्रव्य न रखनेका उसे नियम कराया। इसके बाद, संतोष पूर्वक वह अपना व्यवहार

प्रकरण ११०-१११ ] पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । [ ८३ करने लगा। किसी अवसर पर, वह किसी गाँवको जा रहा था, तो उसने रास्तेमें बकरियोंका एक झुंड जाते देखा। उसमें एक बकरेके गलेमें पाषाणका एक खण्ड बन्धा देखा, जिसको रत्नपरीक्षक होनेके कारण, परीक्षा करके देखा तो वह सच्चा रत्न मालूम दिया। फिर उस रत्नके लोभसे, मूल्य दे कर उस बकरीको उसने खरीद लिया। मणिकार (मणियारे) के पाससे उस रत्नको सान पर चढ़वा कर उसे देदीप्यमान बनवाया और फिर श्रीसिद्धराजके मुकुट बनानेके अवसर पर, एक लाख मूल्य पर राजा-जीको दे दिया। उसी मूल धनसे उसने एक वार बिकनेको आये हुए मञ्जिष्ठाके कई बोरे खरीदे और जब बेचनेके समय उन्हें खोलकर देखा तो समुद्रके चोरोंसे छिपानेके लिए, व्यापारियोंने उनमें सोनेकी पट्टियाँ छिपा रखी हुई मालूम दीं। फिर उसने सब बोरे खोल कर उनमेंसे वे पट्टियाँ निकाल लीं। इस तरह फिर वह सारे नगरमें मुख्य ऐसा सिद्धराजका मान्य (नगर सेठ) और जिन-धर्मकी प्रभावना करने वाला [ प्रसिद्ध ] श्रावक हुआ। प्रति दिन, प्रति वर्ष, स्वेच्छा- नुसार जैन मुनियोंको अन्न वस्त्र आदि दिया करता और गुप्तरूपसे स्वदेश और विदेशमें नये नये धर्मस्थान बन- वाता तथा पुराने धर्मस्थानोंका जीर्णोद्धार करवाता रहा। पर किसी पर उसने अपनी प्रशस्ति नहीं लिखवाई। [ कहा भी है कि ]- १६७. लतासे आच्छन्न वृक्षकी नाईं और मृत्तिकासे आच्छादित बीजकी नाईं प्रच्छन्न (गुप्तरूपसे) किया हुआ सुकृत कर्म प्रायः सैंकडों शाखाओंवाला विस्तृत हो जाता है। इस प्रकार यह वसाहू आभडका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समानदृष्टि। १११) एक दूसरी बार, श्री सिद्धराज संसार सागरको पार करनेकी इच्छासे, सर्व देशके सर्व दर्शनोंमेंसे, प्रत्येकसे देवतत्त्व, धर्मतत्त्व, और पात्रतत्त्वकी जिज्ञासासे पूछने लगा, तो मालूम हुआ कि, ये प्रत्येक अपनी स्तुति और दूसरेकी निंदा कर रहे हैं। इससे उसका मन [खूब] संदेह-दोलाढूढ हो गया। श्रीहेमाचार्यको बुला कर उनसे विचारणीय कार्यको पूँछा। आचार्यने चतुर्दश विद्याओंके रहस्यका विचार करके, इस प्रकार एक पौराणिक निर्णय कह सुनाया कि-'पहिले ज़मानेमें किसी व्यवहारी [गृहस्थ] ने अपनी पहली परिणीत पत्नीको छोड़ कर किसी रखेलिनको अपना सर्वस्व दे दिया। इससे उसकी पूर्व पत्नी, सर्वदा ही, उसको अपने वशमें करनेके लिये अभिचार (मंत्र-तंत्र आदि) के उपाय पूछा करती। किसी गौड (बंगाल) देशीय [जादूगर] ने बताया कि-"तुम्हारे पतिको मैं ऐसा कर दूँ कि तुम उसे फिर रस्सीमें बाँधे रखो" ऐसा कह कर, उसने कोई एक ऐसी अचिन्त्यवीर्य ओषधि ला दी और कहा कि-"इसे भोजनमें खिला देना"। ऐसा कह कर वह चला गया। कुछ दिनोंके बाद जब क्षयाह (श्राद्धका दिन) आया तो उस स्त्रीने वैसा ही किया-पतिको वह ओषधि खिला दी। फलस्वरूप वह (पति) साक्षात् बैल हो गया। उसका फिर कोई प्रतीकार न जान कर वह, सारी दुनियाकी झिड़कियाँ सहती हुई, अपने दुश्चरितके ऊपर शोक करने लगी। एक बार [ग्रीष्म कालके] दोपहरके समय, सूर्यके कठोर किरणोंसे खूब संतप्त हो कर भी, किसी शाद्वल भूमिमें वह अपने उस पशुरूप पतिको चरा रही थी और किसी वृक्षके नीचे बैठ कर खूब निर्भर भारसे विलाप कर रही थी। अकस्मात् उसने आकाशमें कुछ आलाप सुना। पशुपति (शिव) भवानीके साथ विमानमें बैठे हुए उस समय यहाँसे निकले। भवानीने उसके दुःखका कारण पूछा। इस पर शिवने वह वृत्तांत ज्यों का त्यों कह सुनाया। फिर भवानीके आग्रह करने पर शिवने यह भी बताया कि, उसी वृक्षकी छाया में, पुरुष बननेकी ओषधि है;

८४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश और वे अन्तर्धान हो गये । फिर वह भी उस वृक्षकी छायाको रेखांकित करके, उसके भीतर पड़ने वाली [ सभी ] ओषधियोंके अंकुरोंको उखाड़ उखाड़ कर वृषभके मुँहमें डालने लगी । उस अज्ञात स्वरूप ओषधिके मुँहमें पड़ते ही वह बैल फिर मनुष्य हो गया । अज्ञात स्वरूप हो कर भी, ओषधिने जैसे अभीष्ट कार्य किया, वैसे ही कलियुगमें मोहके कारण, बहु पात्र-परिज्ञान तिरोहित होने पर भी, भक्तियुक्त हो कर सब दर्शनोंका आराधन करनेसे, अविदित स्वरूप-ही-से मुक्तिदायक हो जाता है, यह निश्चय है । इस प्रकार श्रीहेमचंद्राचार्यने जब सर्व दर्शनके सम्मत होनेका उपदेश दिया तो श्री सिद्धराजने फिर सब धर्मोंका समान आराधन किया । इस प्रकार यह सर्व दर्शन मान्यता प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार । ११२) एक दूसरी बार रातमें, राजा कर्ण मेरु प्रसादमें नाटक देख रहा था । वहाँ पर कोई चना बेचने वाला एक गरीब बनिया भी चला आया और वह राजाके कन्धे पर हाथ रख कर देखने लगा । राजा उसके इस अभिनव ( व्यवहार ) से मनमें प्रसन्न हो रहा, और बार बार उसका दिया हुआ कर्पूर मिश्रित पानका बीड़ा आनंदके साथ लेता रहा । नाटकके विसर्जन होने पर, राजाने अनुचरोंके द्वारा उसका घर आदि अच्छी तरह जान लिया और फिर अपने महलमें आ कर सो गया । सबेरे उठ कर प्रातःकृत्य कर लेने बाद, सर्वावसर ( राजसभा ) के मिलने पर, राजाने सभामंडपको अलंकृत किया और उस चना बेचने वाले बनियेको बुलाया । राजाने उससे [ व्यंगमें ] कहा कि- 'रातमें तुमने जो मेरे कन्धे पर हाथ रखा था उससे मेरी गर्दनमें दर्द हो रहा है' -तो उस तत्कालोत्पन्न मति वाले (हाजिर जवाब ) बनियेने कहा कि- 'महाराज ! आसमुद्र विस्तृत ऐसी पृथ्वीके भारको कन्धे पर उठा रखनेसे यदि स्वामीके कन्धेमें कोई पीड़ा नहीं होती तो मुझ समान तृण-मात्रसे निर्जीव बनियेके भारसे स्वामीके कन्धोंमें क्या पीड़ा होगी !' उसके इस उचित उत्तरको सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और बदलेमें उसको इनाम दे कर विदा किया । इस तरह यह चना बेचनेवाले बनियेका प्रबंध समाप्त हुआ । * लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना । ११३) एक दूसरी रातको, राजा कर्ण मेरु प्रासादसे नाटक देख कर लौट रहा था, तब [ राजमार्गमें ] किसी व्यवहारीके घर पर बहुत-से दीपक जलते हुए देख कर पूछा कि- 'यह क्या है ?' उसने कहा कि ये लक्षप्रदीप हैं । राजाने उसको धन्य कहा और वह अपने महलमें चला गया । रात्रिको व्यतीत कर [ अपने नगरमें ऐसे प्रजाजन है इस विचारसे ] अपनेको धन्य मानता हुआ, सबेरे उसे राजसभामें बुला कर आदेश किया कि- ' इन प्रदीपोंको सदा जलाते रहनेसे तुमको सदा ही अग्निका भय रहता है, तो कहो कि तुम्हारे पास कितने लाखका धन है'। उत्तरमें उसने निवेदन किया कि- 'वर्तमानमें चौरासी लाख है' । इस पर मनमें अनुकंपित हो कर राजाने कृपापूर्वक अपने खजानेसे १६ लाख निकाल कर दे दिया और उसके मकान पर [ दीपकोंके बदले ] कोटिपति होनेका सूचक कोटिध्वज फहराया गया । इस तरह यह पोटिललसप्रसाद प्रबंध समाप्त हुआ । *

प्रकरण, ११२-११६ ] सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । [ ८५ सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । ११४) एक दूसरी बार, राजाने वालक देशकी दुर्गभूमि ( पहाड़ी जमीन ) में सिंहपुर नामका प्रदेश ब्राह्मणोंको रहनेके लिये दे दिया और उसके अधीन १०६ ग्राम दान कर दिये । पर वहा पर सिंहका डर देख कर ब्राह्मणोंने सिद्धराज से प्रार्थना की कि, उन्हें कहीं देशके भीतर निवास दिया जाय । इस परसे राजाने उनको साभ्रमती के तीर परका आसात्रिली ग्राम दे दिया, और सिंहपुर से धान्य लानेमें जो आते जाते कर लगता था उसे माफ कर दिया गया । वाराहीके पटेलोंको त्रूचाका विरुद्ध देना । ११५) बादमें, राजा सिद्धराज ने किसी समय, मालव देश की यात्राके लिये प्रयाण किया । रास्तेमें वाराही ग्राम के पास जब वह आया तो उस गाँवके पटेलों (मुखियों) को बुला कर, उनकी चतुरताकी परीक्षाके लिये, अपनी एक प्रधान पालकी, उनको अपने पास थातीके रूपमें रखनेके लिये दी । राजाके आगे प्रयाण कर जाने पर उन सभीने मिल कर, उसके एक एक हिस्सेको अलग अलग कर, यथोचित रूपसे सबने अपने अपने घर पर संभालके रखा । यात्रासे लौटते समय राजाने अपनी रखी हुई उस थातीको जब उनसे माँगी, तो उन्होंने अलग अलग किये हुए उसके वे सब टुकडे लाके दिये । यह देख कर राजाने आश्चर्यसे पूछा कि- ' यह क्या बात है ?' तो उन्होंने विज्ञापना की कि- 'महाराज ! [ इनमेंसे ] कोई एक आदमी तो इसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । कभी चौर और अग्नि आदिका उपद्रव हो जाय तो फिर स्वामीके सामने कौन जवाबदेह हो - यही सोच कर हम लोगोंने यह ऐसा किया है।' तब राजा मनमें खूब आश्चर्यचकित हुआ और उनको 'त्रूच *' ऐसा विरुद्ध उसने दिया । इस प्रकार यह वाराहीय त्रूच प्रबंध समाप्त हुआ । * उञ्झाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप । ११६) इसके बाद, एक बार राजा श्री जय सिंह देव, मालव विजय करके लौट रहे थे तब रास्तेमें पडने वाले उञ्झा ग्राम में खीमे डाले गये । वहाके ग्रामीणोंने, जिनको राजा मामा कहा करता था, दूधसे भरे हुए हडों आदिके उचित सत्कारसे राजाको सन्तुष्ट किया । उसी रातको, राजा गुप्त वेष करके उनके दुख- सुख जाननेकी इच्छासे, किसी ग्रामीणके घर पर चला गया । वह (ग्रामीण) गाय दुहने आदिके कामोंमें व्यस्त होता हुआ भी, उसने पूछा कि- 'तुम कौन हो?' [इत्यादि। इसके उत्तरमें उसने] कहा कि- मै श्री सोमेश्वरका कार्पटिक (यात्री) हूं; महाराष्ट्र देश का रहने वाला हूं।' उसने फिर उससे महाराष्ट्र देश और उसके राजाके गुण-दोष आदि पूछे । उसने वहाके राजाके ९६ गुणोंकी प्रशंसा करते हुए, उस ग्रामीणसे गूर्जर देशके राजाके गुण-दोष पूछे । इस पर वह श्री सिद्धराज के प्रजा-पालन-दक्षत्व और सेवकों पर अनुपम प्रेम इत्यादि गुणोंका वर्णन करने लगा। तब बीचमें उसने राजाका कोई कृत्रिम दोष बताना चाहा, तो वह आँसू गिराता हुआ बोला कि- 'हम लोगोंके मंद भाग्यसे राजाको कोई पुत्र नहीं है और यही उसमें एक दोष है'। इस प्रकार निष्कपट भावसे उसने उससे सब कह कर उसे सतुष्ट किया । फिर प्रभात कालमें सब लोग मिल कर राजाके

  • यह 'त्रूच' कोई देश्य शब्द है । हिंदीमें इसके जैसा बूचा शब्द है जिसका अर्थ ' कानकटा हुआ ' ऐसा होता है । इन पटेलोंने राजाकी पालकीके अंग-प्रत्यंग काट डाले थे इस लिए इनको 'त्रूचा' कहा गया प्रतीत होता है । गुजरातीमें त्रूचाका अर्थ भोला-मूर्ख ऐसा भी होता है । इससे राजाने उनके इस भोलेपनको देख कर उन्हें 'त्रूचा' ऐसा सम्भाषण किया हो ।

८६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश दर्शनके लिये उत्कंठित हो कर उसके निवासस्थानमें गये और राजाको प्रणामादि करके उसके अनुपम ऐसे पलंग पर ही बैठ गये । आसन देनेके लिये नियुक्त नोकरोंने उनको अलग आसन पर बैठनेको कहा तो वे लोग अपने हाथोंसे उस पलंगकी कोमल शय्याका स्पर्श करते हुए [ भोले भावसे ] 'हम लोग यहाँ बड़े आरामसे बैठे हैं'-ऐसा कहते हुए वही बैठ रहे। [यह देख कर] राजाका मुख मुस्कराहटसे कमलकी भाँति खिल उठा । इस प्रकार उज्झावासी ग्रामीणोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ ! * झाला सामंत माँगूकी शूरताका वर्णन । ११०) किसी समय, झाला जाति का माहू नामक क्षत्रिय श्री सिद्धराज की सेवाके लिये सभामें आया करता था। वह रोज ही दो परांची (लोहेकी भारी कुसी) जमीनमें गाड़ कर बैठता और फिर उन दोनोंको उखाड़ कर उठता। उसके भोजनमें घीसे भरा एक कुतुप (कुडुवा-घी तेल भरनेका घडेके जैसा चमडेका भाजन ) खर्च होता था । घी लगी हुई उसकी दाढ़ीके धोने पर भी उसमें सोलहवाँ हिस्सा घी बच जाता था। किसी समय उसके शरीरमें रोग होने पर, पथ्यके लिये यवागू ( जौकी पतली माँड ) खानेको वैद्यने कहा तो, वह ५ माणक (करीब ४ शेर कच्चे नाप जितनी ) खा गया । इस पर वैद्यने डाँट कर कहा कि आधा भोजन कर लेने पर बीचमें अमृतोदक क्यों नही पिया ?' क्यों कि कहा है कि- १६८. जब तक सूर्योदय न हो जाय तब तक एक हजार घड़ा भी पानी पिया जा सकता है, पर जब सूर्योदय हो जाता है तो फिर एक बूँद भी एक घड़ेके बराबर हो जाता है। रातकी पिछली चार घड़ीमें, सूर्योदय न होने तक, जो जल पिया जाता है-जो जल प्रयोग किया जाता है-उसे वज्रोदक कहते हैं (वह अमृतोदक भी कहलाता है)। सूर्योदय हो जाने पर बिना अन्न खाये, जो पानी पिया जाता है, वह विष है। इस लिये एक बूँद भी वह पानी सौ घड़ोंके बराबर हो जाता है। आधा भोजन करने पर, बीचमें जो जल पिया जाता है वह अमृत कहलाता है, और भोजनान्तमें तत्काल पिया जाता हुआ जल छत्र या छत्रोदक कहलाता है। उस माँगूने, यह सुन कर कहा कि- 'यदि ऐसा है, तो पहिले जो अन्न खाया है उसे आधा आहार कल्पना कर लिया जाय, और इस समय अब पानी पी कर फिर उतना ही आहार और कर लूँ।' ऐसा कह कर वह फिर खानेकी तैयारी करने लगा, लेकिन वैद्यने उसे वैसा करनेसे रोक दिया। किसी समय राजाने उसके निःशस्त्र रहनेका कारण पूछा। उसने कहा कि-'मेरा हथियार तो समयोचित होता है'। फिर एक बार उसके स्नान करते समय, किसी महावत द्वारा चलाये हुए हाथीको अपने ऊपर आता देख, नजदीकमें रहे हुए कुत्तेको पकड कर उसकी सूंड पर फेंक मारा। मर्मस्थान पर चोट लगनेके कारण निपीडित ऐसे उस हाथी को खींचा, तो उसके अतुल बलसे वह हाथी भीतर-ही-भीतर नसोंमेंसे टूट गया और उस महावतके नीचे उतरने पर, वह जमीन पर गिरते ही प्राणोंसे मुक्त हो गया। गुर्जर देश पर आयी हुई म्लेच्छोंकी सेनाको देख कर राजाके पलायन कर जाने पर, वह अपनी इच्छासे उस सेनाका उच्छेद करता हुआ, युद्धमें जिस स्थान पर मारा गया, उस जगहकी, पत्तन में अब भी 'माहूस्यगण्डिल' के नामसे प्रसिद्धि चल आ रही है। इस प्रकार यह माँगू प्रबंध समाप्त हुआ।