भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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७२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश आज्ञासे अन्य व्याकरणोंको छोड़कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर किसी मत्सरने राजासे कहा कि 'इस व्याकरणमें आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है।' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह बात किसी राजपुरुषसे जान कर श्रीहेमाचार्यने [तत्क्षण] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया। प्रातःकाल जब राजसभा में व्याकरण बांचा गया तो- १३८. हरिकी भाँति बलि बंधकर (= १ बलिको बाँधनेवाला, २ बलियोंको बंदी करनेवाला), शिवकी नाँई त्रिशक्तियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (= १ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला- लक्ष्मीका आश्रय) श्री मूलराज नृपकी जय हो। इत्यादि, चौलुक्य वंशकी स्तुतिवाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोंके अन्तमे आये सुन कर राजा मनमें प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्रीसिद्धराज के दिग्विजय वर्णनमें [हेमाचार्यने] द्वयाश्रय नामक [काव्य] ग्रंथ बनाया। [हेमाचार्यके बनाए इस सिद्ध हेम व्याकरण के विषयमें विद्वानोंने ऐसी उक्तियाँ कही हैं-] १३९. हे भाई! पाणिनि के प्रलापको बंद करो, कातन्त्र का चीथड़ा मत फाड़ो शाकटायन के कटु वचनको मत पढ़ो, और क्षुद्र चांद्रव्याकरण से क्या मतलब है, भलौँ, और कण्ठाभरण आदि व्याकरणोंसे अपने आपको कोई क्यों भुलायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्धहेम की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं। ९८) इसके बाद, श्री सिद्धराज ने पत्तन में यशोवर्मराजा को, त्रिपुरुषप्रभृति सभी राजप्रासादों और सहस्रलिंग प्रभृति धर्मस्थानोंको दिखा कर बताया कि-[हमारे राज्यमें] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़ द्रव्य व्यय किया जाता है।! और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर?'। वह बोला-मैं तो अठारह लाख संख्यावाले (!) मालवदेश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ?। पर यह देश तो पहले ही महाकालदेव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मालवी लोग उपभोग कर रहे हैं; और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है। आपके वंशवाले राजा भी इतना देवद्रव्य व्यय करनेमें असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार वे विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायेंगे। * सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना। ९९) इसके पश्चात, एक बार श्री सिद्धराज ने सिद्धपुर में रुद्रमहालय का प्रासाद बनवाना चाहा। किसी [प्रसिद्ध] स्थपति (कारीगर) को अपने पास रख कर, प्रासादके प्रारंभ होनेके समय उसकी कंठासिकाको-जो उसने किसी साहूकारके यहाँ एक लाखमें बंधक रखी थी-छुड़ा कर उसको दिलवाई। वह बांसकी कमचियोंकी बनी हुई थी; उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है? इस पर उस स्थपतिने कहा कि मैने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है। फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते हुए भी लौटा दिया। फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सर्वाङ्गपूर्ण प्रासाद बनवाया। उस प्रासादमें अश्वपति, गजपति, नरपति प्रभृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ बनवा कर रखीं और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी मूर्ति भी बनवाई। [जिसका आशय यह है कि राजा] उनसे वर माँगता है कि देशका भङ्ग करते हुए भी इस प्रासादका कोई भंग न करें। उस मंदिर पर ध्वजारोपका उत्सव करते समय सभी जैन प्रासादोंकी पताकायें उतरवा दी गईं। जैसे मालव देश के महाकालके मंदिरमें जब वैजयंती चढ़ाई जाती है तब जैन प्रासादोंमें ध्वजारोपण नहीं होने पाता। १ यह कलासिका नामका कारीगरका कोई ओजार है जिसका ठीक अर्थ समझमें नहीं आता।

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