भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण ९६-९७ ] सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन [ ७१ सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन । ९७) प्रति दिन सब दर्शन [के आचार्यों] को आशीर्वाद और दानके लिये बुलाये जाने पर, यथावसर बुलाये गये श्री हेमचन्द्र प्रभृति जैनाचार्य श्री सिद्धराज के पास गये । राजाके दुकूल आदि दे कर उनका सत्कार करने पर, उन सभी अप्रतिम प्रतिभा पूर्ण पंडितों द्वारा दोनों तरह पुरस्कृत हो कर हेमचन्द्राचार्य ने राजाको इस प्रकार आशीर्वाद दिया- १३६. हे कामधेनु ! तू अपने गोमयके रससे भूमिका आसेचन कर, हे समुद्रो ! तुम अपने मोतियोंसे स्वस्तिक बनाओ, हे चन्द्र ! तूं पूर्णकुंभ बन जा और हे दिग्गजो ! तुम अपने सरल सूंडोंसे कल्पवृक्षके पत्ते तोड़ कर उनके तोरण सजाओ - क्यों कि संसारका विजय करके सिद्धराज आ रहा है । इस प्रकार निष्प्रपञ्च (सरल) काव्यके विवेचन करने पर उनकी वचन-चातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर राजाने [यथेष्ट] प्रशंसा की । इस पर कुछ असहिष्णुओके-अर्थात् ब्राह्मणोंके-यह कहने पर कि 'हमारे शास्त्रोंके - अर्थात् पाणिन्यादि व्याकरण ग्रंथोंके - अध्ययनके बल पर ही इन (जैनों) की विद्वत्ता है।' राजाने श्री हेमचन्द्र आचार्यसे पूछा । [उन्होंने कहा-] प्राचीन कालमें श्री जिनेन्द्र महावीर ने अपने शासन कालमें इन्द्रके सामने जिसकी व्याख्या की थी उसी जैनेन्द्र व्याकरणको हम लोग पढ़ते हैं । उनके ऐसा कहने पर उस पिशुनने कहा कि इन पुरानी बातोंको तो छोड़ दो और हमारे समयके ही किसी तुम्हारे व्याकरण कर्त्ताका पता बता सकते हो तो बताओ । इस पर वे राजासे बोले कि यदि महाराज श्री सिद्धराज सहायक हों तो, मैं ही स्वयं कुछ दिनोंमें ही पञ्चाङ्ग पूर्ण नूतन व्याकरण तैयार कर सकता हूँ। राजाने कहा- मैंने [साहाय्य करना] स्वीकार किया। आप अपने वचनका निर्वाह करें । ऐसा कह कर उसने सब सूरियोंको विदा किया । वे भी अपने अपने स्थानको गये । राजाने [पहले ही यह एक] प्रतिज्ञा करली थी कि यशोवर्माके हाथमें बिना म्यानकी छुरी देकर और उसको अपने पीछे बिठा कर हाथी पर सवार होकर हम नगरमें प्रवेश करेंगे । राजाकी इस प्रतिज्ञाको सुन कर मुञ्जाल नामक मंत्री [असंतुष्ट बना और उस] ने प्रधान पद छोड़ दिया । राजाके बार बार कारण पूछने पर १३७. राजा लोग चाहे सन्धि [करना] न जाने और विग्रह भी [करना] न जाने; पर यदि वे [मंत्रियोंका] आख्यात (कहा हुआ) ही सुनते रहें तो इसीसे वे पण्डित हो सकते हैं । इस प्रकारका नीतिशास्त्रका उपदेश है। महाराजने स्वयं अपनी बुद्धिसे जो यह प्रतिज्ञा की है, भविष्यमें यह बिल्कुल ही हितकर न होगी। राजाने प्रतिज्ञाभंग होनेके भयसे भीत हो कर कहा कि 'प्राणोंका त्याग करना अच्छा है। किन्तु विश्वविदित इस प्रतिज्ञाका नहीं।' इस पर मंत्रीने काठकी छुरी बना कर शालवृक्षके पाण्डुरंगके गोंदसे उसे परिमार्जित कर, पीछेके आसन पर बैठे हुए यशोवर्माके हाथमें दी । उसके आगेके आसन पर राजा सिद्धराज बैठा और खूब समारोहके साथ उसने अणहिल्लपुरमें प्रवेश किया । प्रावेशिक मंगलकी धूमधाम समाप्त हो जाने पर राजाने व्याकरण वृत्तान्तकी याद दिलाई। इस पर बहुतसे देशोंके तज्ज्ञ पंडितोंके साथ सभी व्याकरणोंको नगरमें मंगवा कर श्री हेमचन्द्राचार्य ने श्री सिद्धहैम नामक नूतन पञ्चाङ्ग व्याकरण एक वर्षमें तैयार किया । इसका ग्रंथप्रमाण सवालाख श्लोक था । राजाके निजके बैठनेके हाथी पर उस पुस्तकको रख कर उसका जुलूस निकाला गया। उसके ऊपर श्वेतच्छत्र लगाया गया और दो चामरग्राहिणिया चामर झलने लगीं । इस प्रकार उस ग्रंथकी महिमा करके उसे कोषागारमें रखा। फिर राजाकी