भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 181 में से

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प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [ ७३ श्रीहेमाचार्यसे वादमें निष्णात ऐसे आचार्यकी बात पूछी। उन्होंने चारों विद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त, जैन मुनिरूप हाथियोंके यूथपति, श्वेतांबर शासनके लिये वज्रके प्राकार जैसे मानेजानेवाले, राजसभाके शृंगारहार, कर्णावती में [ चातुर्मास ] रहे हुए, वादविद्याके पारगामी, वादिहस्तियोंके लिये सिंहस्वरूप श्रीदेवाचार्य को बताया । इसके बाद उनको बुलानेके लिये, श्री संघके लेखके साथ राजाकी विज्ञाप्तिका वहा पहुंची। उसे पा कर देवसूरि पत्तन में आये और राजाके अनुरोधसे वाग्देवीकी आराधना की । उस देवीने आदेश दिया कि-- ‘वाद करते समय, वादिवेतालीय श्रीशान्तिसूरि विरचित उत्तराध्ययन बृहद्वृत्तिमें उल्लिखित दिगंबर वादस्थल विषयक चौरासी विकल्प जालका उपन्यास करके, उसे प्रपंचित करोगे तो दिगंबरके मुखमें मुद्रा लग जायगी ।’ देवीके इस आदेशके बाद, गुप्त भावसे कुमुद चंद्र के पास पंडितोंको यह जाननेके लिये भेजा कि किस शास्त्रमें इसकी विशेष कुशलता है। उनके द्वारा उसकी यह निम्न लिखित उक्ति सुनी- १५३. हे देव ! आदेश कीजिये में सहसा क्या करूं ? लंकाको यहीं ले आऊं, या जंबूद्वीपको यहाँसे ले जाऊं ?, क्या समुद्रको सुखा दूं, या उस उच्च पर्वतको, जिसकी चोटीका एक पत्थर कैलास है, उसे खेल-ही-में उखाड़ कर समुद्रको बाँध दूँ, कि जिसके प्रक्षेपसे क्षुब्ध हो कर समुद्रका पानी बढ़ जाय । इस उक्तिको सुन कर, श्रीदेवाचार्य और श्रीहेमाचार्य दोनों उसकी सिद्धान्तविषयक बहुत अल्प कुशलता समझ कर उसे अपने मनमें ‘जीत लिया, जीत लिया’ ऐसा मान बडे प्रसन्न हुए । इसके बाद देवसूरि आचार्यका प्रधान शिष्य रत्नप्रभ, प्रथम रात्रिमें गुप्त वेष करके कुमुदचंद्र के डेरेमें गया। उसने (कुमुदचंद्रने) पूछा कि- ‘तुम कौन हो?’; ‘मैं देव हूँ’; ‘देव कौन ?’; ‘मैं ?’; ‘मैं कौन ?’; ‘तुम कुत्ते’; ‘कुत्ता कौन ?’; ‘तुम’; ‘तुम कौन ?’; ‘मैं देव’; [ ‘तुम कहाँसे आये ?’; ‘स्वर्गसे’ ‘स्वर्गमें क्या बात चल रही है !’; ‘कुमुदचन्द्रका सिर ९५ पल है’; ‘इसमें प्रमाण क्या है?’ ‘काट कर तौल लो’] इस प्रकारकी उसकी उक्ति-प्रत्युक्ति के बंधनमें जब यह चाककी तरह चक्कर खाने लगा, तो अपनेको देव और दिगम्बरको श्वान बना कर, जैसे गया था वैसे ही लौट आया । [ पीछेसे ] उस चक्रदोषको ठीक ठीक समझा तो मनमें अतिशय विषण्ण हो कर, इस प्रकारकी उचित कविता बना कर उस मायावी कुमुदचन्द्रने देवसूरिके पास भेजी- १५४. अरे श्वेताम्बरो ! इस प्रकारके विकटाटोप वचनोंके द्वारा, संसार वृक्षके अतिविकट कोटरमें, इस मुग्ध जन-समूहको क्यों गिराते हो ? यदि तद्व्रतातत्त्वके विचारमें आप लोगोंको थोड़ीसी भी कामना हो तो सचमुच ही कुमुदचन्द्र के दोनों चरणोंका रात-दिन ध्यान किया करो । इसके बाद श्री देवसूरिके चरणका परम परमाणु (विनीत शिष्य), बुद्धिवैभवसे चाणक्य का भी उपहास करनेवाले पंडित माणिक्य ने निम्नलिखित श्लोक उसके पास भेजा- १५५. अरे! वह कौन है जो सिंहके केसराजालको पैरोंसे छूना चाहता है ? वह कौन है जो तेज भालेकी नोकसे अपनी आँख खुजाउना चाहता है ? वह कौन है जो नागराजके सिर परकी मणिको अपनी शोभाके लिये उतारना चाहता है ! जो यह करना चाहता है वही वंदनीय ऐसे श्वेतांबर शासनकी निन्दा करना चाहता है। फिर रत्नाकर पंडितने भी इस श्लोकको कुमुदचंद्रके पास उपहासके सहित भेजा- १५६. नंगो (दिगम्बरों) ने जो युवतियोंकी मुक्तिका निरोध किया है इसमें क्या तत्त्व है यह तो प्रकट ही है । फिर वृथा ही कर्कश तर्कके लिये यह अनर्थमूलक अभिलाषा क्यों करते हो !

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