प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश श्री हेमचंद्राचार्य ने सुना कि श्री मयणल्ला देवी कुमुद चंद्र की पक्षपातिनी है और सभाके अपने संपर्कवाले सभ्योंसे उसकी जयके लिये नित्य अनुरोध कर रही है, तो उन्होंने, उन्हीं सभासदोंसे यह वृत्तान्त कहलवाया कि 'वादस्थल पर दिगंबर लोग तो स्वीकृत सुकृत्यको अप्रमाणित करेंगे और श्वेताम्बर प्रमाणित करेंगे।' यह सुन कर रानीने व्यवहारबहिर्मुख उस दिगंबर परसे अपना पक्षपात हटा लिया। इसके बाद, भाषोत्तर (वादका विषय) लिखानेके लिये कुमुदचंद्र तो पालकीमें बैठ कर, और पण्डित रत्नप्रभ पैदल ही चल कर, राजाके अक्षपटल (न्यायविभाग) कार्यालयमें आये। वहाँके अधिकारियोंको कुमुदचंद्रने अपनी यह भाषा (वादके विषयमें निजकी प्रतिज्ञा) लिखवाई- १५७. केवली होने पर [मनुष्य] भोजन नहीं करता, चीवर सहित [मनुष्य] निर्वाण नहीं पाता और स्त्रीजन्ममें मुक्ति नहीं मिलती। श्वेतांबरोंका इसके विरुद्ध यह उत्तर था- १५८. केवली होने पर भी [मनुष्य] भोजन करता है, सचीवर [मनुष्य] को भी निर्वाण मिलता है, और स्त्रीजन्ममें भी मुक्ति होती है-यह देवसूरिका मत है। इस प्रकार भाषा और उत्तर लिख लेनेके अनंतर वादका स्थान और समय निर्णीत हुआ। उसमें सिद्धराजके सभापतित्वमें, षड्दर्शन-प्रमाणको जाननेवाले सभ्यलोग जब उपस्थित हुए तो, तो सुखासन (पालकी) में बैठ कर, सिरपर श्वेत छत्र धारण किये हुए और जयडिंडिम बजाते हुए, वादी कुमुद चन्द्रने सभामें प्रवेश किया। उसके आगे बाणके सिरेपर, उसके प्राप्त किये हुए जयपत्र लटक रहे थे। सिद्धराजने उसके बैठनेके लिये सिंहासन दिलवाया। प्रभु श्री देवसूरिने मुनीन्द्र श्री हेमचंद्रके साथ सभामें एक ही आसनको अलंकृत किया। फिर, वादी कुमुदचंद्रने, जो अवस्थासे वृद्ध था, श्री हेमचंद्रसे - जिनकी शैशवावस्था कुछ ही समय पहले व्यतीत हुई थी; अर्थात् जो अब भी पूर्ण युवा नहीं हुए थे - कहा कि 'आपके द्वारा तक्र क्या पीत है! अर्थात्-आपने तक्र (छास) पी है?' इस पर श्री हेमचंद्रने उससे कहा-'क्या वृद्धावस्थाके कारण तुम्हारी बुद्धि अस्थिर हो गई है? जो ऐसा अनाप-सनाप बोल रहे हो! तक्र श्वेत होता है, पीत तो हल्दी होती है!' इस वाक्यसे नीचा मुँह हो कर उसने पूछा कि-'आप दोनोंमे वादी कौन है?' श्री सूरिने उसका कुछ तिरस्कार करनेके इरादेसे [अपनेको लक्ष्य कर लेकिन शब्दभेदके साथ ] कहा 'यह आपका प्रतिवादी है'। ऐसा कहने पर कुमुदचंद्र [उसके मर्मको ठीक न समझ कर] बोला-'मुझ वृद्धका इस शिशुके साथ क्या वाद हो सकता है?' उसकी यह बात सुन कर [आचार्य हेमचन्द्रने कहा-] 'वृद्ध तो मैं हूँ; और आप तो शिशु ही हैं-जो अब तक भी कंदोरा बाधना नहीं जानते और वस्त्र नहीं पहनते।' राजाके इन दोनोंकी इस प्रकारकी वितंडाका निषेध करने पर, परस्पर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा निश्चित हुई-"पराजित होने पर श्वेतांबर तो दिगंबर हो जायंगे, और [उसके विरुद्ध] दिगंबर देशत्याग करेंगे।" प्रतिज्ञा निश्चित हो जाने पर स्वदेशके कलंकसे डरनेवाले देवाचार्यने, सर्वानुवादका परिहार करके और देशानुवादका अनुसरण करके, कुमुदचंद्रसे कहा कि-'पहले आप ही अपना पक्ष स्थापित करें।' उनके ऐसा कहने पर कुमुदचंद्रने राजाको पहले यह आशीर्वाद दिया- १५९. हे राजन् ! आपके यशके स्मरण होने पर सूर्य खद्योतकी चमक जैसा प्रतीत होता है, चन्द्रमा पुराने मकड़ीके जालकी भाँति फीका जान पड़ता है और (हिमाच्छादित) पर्वत मशकसे जान पड़ते हैं। आकाश उसमें भौरे जैसा हो जाती है और इसके बाद तो वाणी बन्द हो जाती है।