भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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७८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर वह उन्मुद्रित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नाँई खडा रह गया । [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी-वन और नदियोंसे परिपूर्ण पर्वत पर, यहीं, [ नये ] विंध्यवनकी रचना करूँगा ' - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाथ हो गया था, उस मनोरथसे मैने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ यह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। * वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन । १०९) अथ यहाँ पर देवसूरिका चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुदचंद्र नामक दिगम्बर [ विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्णाटक देशसे गूर्जर देशको जीतनेकी इच्छासे कर्णावती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देवसूरि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक बार श्री अरिष्टनेमिके मंदिरमें जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिष्ट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी । उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुदचन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रोंमें प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवाचार्य की बहन तपोवना शीलसुन्दरी को चेटकाधिष्ठित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक ( टोना आदि ) के दूर होने पर वह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट पराभवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्त्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे। ( यहाँ पर P प्रतिमें इस विषयके निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [ १०३ ] हा ! मै किसके आगे पुकार करूँ ? मेरे प्रभु तो कर्णरहित हैं। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। [ साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे- ] [ १०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कण्ठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओंका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ !-जो मैं उनके शासन ( धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारकी विडंबनाओके डबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ । [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] [१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेतांबरोंके अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दूर्वा जैसी है, गुरुवर श्री देवसूरिके ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे। श्री देवसूरिने [ दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्याविनोद ( शास्त्रार्थ-विनोद ) के लिये आप पत्तन चलें। वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे ।' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्तन को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्धराजने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वही डेरा डाल कर ठहरा। सिद्धराज ने