भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 181 में से

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प्रकरण ९९-१०१ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । [ ७३ सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । १००) एकवार, सिद्धराज ने मालवक मण्डलके प्रति जाना चाहा तब किसी व्यवहारीने [ जो उस काममें नियुक्त अधिकारी था ] सहस्रलिंग सरोवरके कारखानेके लिये कुछ द्रव्य और भाग माँगा । राजा उसे कुछ भी दिये बिना चला गया । कुछ दिनोंके बाद द्रव्याभावसे उस कामके चलनेमें देरी होते देख, उस व्यवहारी (अधिकारी) ने अपने लड़केसे किसी धनाढ्य पुरुषकी स्त्रीका ताडंक (करन फूल) चुरा लिया, और फिर स्वयं उसके दण्डस्वरूप तीन लाख द्रव्य दे दिया । उससे वह काम पूरा हो गया । यह बात मालव मण्डलमें, वर्षाकालमें ठहरे हुए राजाने सुनी । सुन कर उसे जो आनन्द हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसके बाद वर्षाकालकी घनी वृष्टिसे जब सारी पृथ्वी एक समुद्रकी भाँति जलमय हो गई तो प्रधान पुरुषोंने राजाको बधाई देनेके लिये किसी मरुदेश वासीको भेजा । उसने [जा कर] राजाके सामने विस्तार पूर्वक वर्षाका स्वरूप कहना आरम्भ किया । इसी बीच, उसी समय आया हुआ कोई धूर्त गुजराती जल्दीसे बोल उठा—‘महाराज बधाई ! सहस्रलिंग सरोवर [जलसे परिपूर्ण] भर गया है । उसके ऐसा कहनेके साथ ही राजाने उस गुजरातीको अपने शरीरके सारे आभरण दे दिये । वह मरुवासी छींकेसे गिरे हुए मार्जार की भाँति देखता ही रह गया । १०१) इसके बाद, वर्षा बीतते ही, राजा वहाँसे लोटा । [रास्तेमें] नगर महास्थान (वडनगर) में डेरा डाला और वहाँ बनवाये गए मच-मडपमें राजसभाकी बैठक की गई । नगरके प्रासादोंमें ध्वज लगे हुए देख कर ब्राह्मणोंसे पूछा कि ‘ये कौनसे प्रासाद हैं ?’ उन्होंने जब वहाँके जिन और ब्रह्माके मंदिरोंका हाल बताया तो क्रुद्ध हो कर राजाने कहा कि ‘जब मैंने गूर्जर मडलमें, जैन मदिरोंमें पताका लगानेका निषेध किया है, तो फिर आप लोगोंके इस नगरमें इन जैन मंदिरों पर ये पताकायें क्यों उड़ रहीं हैं ?’ उन्होंने कहा कि—‘सुनिये, कृतयुगके प्रारंभमें श्रीमन्महादेवने इस महास्थान की स्थापना करते हुए श्री ऋषभनाथ और श्री ब्रह्मदेवके प्रासाद स्वयं बनाये और उन पर ध्वजायें चढाईं । सो इन दोनों प्रासादोंका सुकृतियों द्वारा उद्धार होते रहने पर ये चार युग बीत गये । दूसरी बात यह है कि—पहले यह नगर शत्रुञ्जय महागिरिकी उपत्यका भूमि था । क्यों कि नगर पुराण में भी कहा है कि— १४०. कहा जाता हे कि आदिकालमें इस जिनेश्वरके पर्वतकी मूलभूमिका विस्तार पचास योजन था ऊपरकी भूमिका विस्तार दश योजन था और ऊँचाई आठ योजन थी । कृतयुगमें आदिदेव श्री ऋषभदेव के पुत्र भरत नामरूप हुए । उन्हींके नामसे यह ‘भरतखण्ड’ प्रसिद्ध हुआ । १४१. नाभि और [उनकी पत्नी] मरुदेवीके पुत्र श्री वृषभ (ऋषभ देव) हुए जिन्होंने समदृक् हो कर मुनियोग्य चर्याका आचरण किया । वे स्वच्छ, प्रशान्त अन्त करण, समदृक् और सुधी थे । ऋषिगण उनके अर्हत पदको मानते हैं । १४२. मरुदेवी के गर्भसे नाभिके (श्री ऋषभदेव) पुत्र हुए जो अष्टम [विष्णुके अवतार स्वरूप] थे और सब आश्रमसे नमस्कृत थे । जिन्होंने धीरोंको अथवा वीरोंको [मोक्षका] मार्ग दिखाया । (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित-अनुवादवाले-श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [९१] स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामरूप हुए, उनके पुत्र हुए अग्नीन्ध्र, उनके नाभि और उनके पुत्र ऋषभ । १९-२०

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