प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न ६ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७
| मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तार- | परपारके समान अपुनरावृत्तिरूप |
|---|---|
| यस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान् | मोक्षसंज्ञक दूसरे पारपर पहुँचा |
| प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपि | दिया है; अतः आपका पितृत्व तो |
| हि पिता शरीरमात्रं जनयति । | अन्य ( जन्मदाता ) पिताकी अपेक्षा |
| तथापि स प्रपूज्यतमो लोके | भी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा |
| किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभय- | पिता भी केवल शरीरको ही उत्पन्न |
| दातुरित्यभिप्रायः । नमः परम- | करता है, तो भी वह लोकमें सबसे |
| ऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृ- | अधिक पूजनीय होता है; फिर |
| भ्यो नमः परमऋषिभ्य इति | आत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले |
| द्विर्वचनमादरार्थम् ॥८॥ | आपके पूजनीयत्वके विषयमें तो |
| कहना ही क्या है ? अतः ब्रह्मविद्या- | |
| सम्प्रदायके प्रवर्तक परमर्षिको | |
| नमस्कार हो । यहाँ 'नमः परम- | |
| ऋषिभ्यः' इसकी द्विरुक्ति आदर- | |
| प्रदर्शनके लिये है ॥८॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥
इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥