भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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( २ )

गुरुजीकी आज्ञानुसार उन मुनिकुमारोंने वैसा ही किया और फिर एक-एकने अलग-अलग प्रश्न कर मुनिवरके समाधानसे कृत-कृत्यता लाभ की। उन छहोंके पृथक्-पृथक् संवाद ही इस उपनिषद्के छः प्रश्न हैं। उनमेंसे पहले प्रश्नमें रयि और प्राणके द्वारा प्रजापतिसे ही सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत्‌की उत्पत्तिका निरूपण किया गया है। प्रायः यह देखा ही जाता है कि प्रत्येक पदार्थ दो संयोग-धर्म-वाली वस्तुओंके संसर्गसे उत्पन्न होता है। उनमें भोक्ता या प्रधानको प्राण कहा गया है तथा भोग्य या गौणको रयि। ये दोनों जिसके आश्रित हैं उसे प्रजापति कहा गया है। इसी सिद्धान्तको लेकर भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें—जो कई प्रकारसे संसारके मूलतत्त्व माने जाते हैं—प्रजापति आदि दृष्टिका निरूपण किया गया है।

दूसरे प्रश्नमें स्थूलदेहके प्रकाशक और धारण करनेवाले प्राणका निरूपण है तथा एक आख्यायिकाद्वारा समस्त इन्द्रियोंकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठता बतलायी है। तीसरे प्रश्नमें प्राणकी उत्पत्ति और स्थितिका विचार किया गया है। वहाँ बतलाया है कि जिस प्रकार पुरुषकी छाया होती है उसी प्रकार आत्मासे प्राणकी अभिव्यक्ति होती है और फिर जिस प्रकार सम्राट् भिन्न-भिन्न स्थानोंमें अधिकारियोंकी नियुक्ति कर उनके अधिपतिरूपसे स्वयं स्थित होता है उसी प्रकार यह भी भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें अपने ही अङ्गभूत अन्य प्राणोंको नियुक्त कर स्वयं उनका शासन करता है। वहीं यह भी बतलाया है कि मरणकालमें मनुष्यके सङ्कल्पानुसार यह प्राण ही उसे भिन्न-भिन्न लोकोंमें ले जाता है तथा जो लोग प्राणके रहस्यको जानकर उसकी उपासना करते हैं वे ब्रह्मलोकमें जाकर क्रममुक्तिके भागी होते हैं।

चौथे प्रश्नमें स्वप्नावस्थाका वर्णन करते हुए यह बतलाया गया है कि उस समय सूर्यकी किरणोंके समान सब इन्द्रियाँ मनमें ही लीन हो जाती हैं, केवल प्राण ही जागता रहता है। वहाँ उसके भिन्न-भिन्न भेदोंमें गार्हपत्यादिकी कल्पना कर उसमें अग्निहोत्रकी

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