भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१ | | :--- | :--- |


निर्वर्त्यते किं वा करणलक्षणेन केनचिदित्यभिप्रायः ।है, अथवा करणरूप देव ? यह इसका अभिप्राय है ।
उपरते च जाग्रत्स्वप्नव्यापारे यत्प्रसन्नं निरायासलक्षणमनाबाधं सुखं कस्यैतद्भवति । तस्मिन्काले जाग्रत्स्वप्नव्यापाराद् उपरताः सन्तः कस्मिन्नु सर्वे सम्यगेकीभूताः संप्रतिष्ठिताः । मधुनि रसवत्समुद्रप्रविष्टनद्यादिवच्च विवेकानर्हाः प्रतिष्ठिता भवन्ति संगताः संप्रतिष्ठिता भवन्तीत्यर्थः ।तथा जाग्रत् और स्वप्नका व्यापार समाप्त हो जानेपर जो प्रसन्न, अनायासरूप एवं निर्बाध सुख होता है वह भी किसे होता है ? उस समय जाग्रत् और स्वप्नके व्यापारसे उपरत होकर सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भली प्रकार एकीभूत होकर किसमें स्थित होती हैं ? अर्थात् मधुमें रसोंके समान तथा समुद्रमें प्रविष्ट हुई नदी आदिके समान विवेचनके (पृथक्-प्रतीतिके) अयोग्य होकर वे किसमें भली प्रकार प्रतिष्ठित अर्थात् सम्मिलित हो जाती हैं ?
ननु न्यस्तदात्रादिकरणवत् स्वव्यापारादुपरतानि पृथक्पृथगेव स्वात्मन्यवतिष्ठन्त इत्येतद्युक्तं कुतः प्राप्तिः सुषुप्तपुरुषाणां करणानां कस्मिंश्चिदेकीभावगमनाशङ्कायाः प्रष्टुः ।शङ्का—[काम करनेके अनन्तर] छोड़े हुए दराँती आदि करणों (औजारों) के समान इन्द्रियाँ भी अपने-अपने व्यापारसे निवृत्त होकर अलग-अलग अपनेमें ही स्थित हो जाती हैं—ऐसा समझना ठीक ही है । फिर प्रश्नकर्ताको सोये हुए पुरुषोंकी इन्द्रियोंके किसीमें एकीभाव हो जानेकी आशङ्का कैसे प्राप्त हो सकती है ?