भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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५०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तत्र सुदीप्तादिवाग्नेर्यथात्<br>परादक्षरात्सर्वे भावा विस्फुलिङ्गा<br>इव जायन्ते तत्र चैवापियन्ति<br>इत्युक्तं द्वितीये मुण्डके ; के ते<br>सर्वे भावा अक्षराद्विभज्यन्ते ?<br>कथं वा विभक्ताः सन्तस्तत्रैव<br>अपियन्ति ? किंलक्षणं वा तद-<br>क्षरमिति ? एतद्विवक्षयाधुना<br>प्रश्नान् उद्भावयति—<br><br>भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे शिरः-<br>पाण्यादिमति कानि करणानि<br>स्वपन्ति स्वापं कुर्वन्ति स्वव्या-<br>पारादुपरमन्ते कानि चास्मिन्<br>जाग्रति जागरणमनिद्रावस्थां स्व-<br>व्यापारं कुर्वन्ति। कतरः कार्यकारण-<br>लक्षणयोरेष देवः स्वप्नान्पश्यति ?<br>स्वप्नो नाम जाग्रद्दर्शनान्निवृत्तस्य<br>जाग्रद्वदन्तःशरीरे यद्दर्शनम् ।<br>तत्किं कार्यलक्षणेन देवेनतहाँ, द्वितीय मुण्डकमें यह बात कही गयी है कि 'अच्छी तरह प्रज्वलित हुए अग्निसे स्फुलिङ्गों (चिनगारियों) के समान जिस पर अक्षरसे सम्पूर्ण भाव पदार्थ उत्पन्न होते और उसीमें लीन हो जाते हैं' इत्यादि; सो उस अक्षर परमात्मासे अभिव्यक्त होनेवाले वे सम्पूर्ण भाव कौन-से हैं ? उससे विभक्त होकर वे किस प्रकार उसीमें लीन होते हैं ? तथा वह अक्षर किन लक्षणोंवाला है ? यह सब बतलानेके लिये अब श्रुति आगेके प्रश्न उठाती है—<br><br>भगवन् ! शिर और हाथ-पैरोंवाले इस पुरुषमें कौन इन्द्रियाँ सोती—निद्रा लेती अर्थात् अपने व्यापारसे उपरत होती हैं ? तथा कौन इसमें जागती यानी जागरण—अनिद्रावस्था अर्थात् अपना व्यापार करती हैं ? कार्य-करणरूप [यानी देहेन्द्रियरूप] देवोंमेंसे कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? जाग्रद्दर्शनसे निवृत्त हुए जीवका जो अन्तःकरणमें जाग्रत्के समान विषयोंको देखना है उसे स्वप्न कहते हैं । सो यह कार्य कोई कार्यरूप देव निष्पन्न करता
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