प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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चतुर्थ प्रश्न
गार्ग्यका प्रश्न—सुषुप्तिमें कौन सोता है और कौन जागता है ?
अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे सूर्यके पौत्र गार्ग्यने पूछा—'भगवन् ! इस पुरुषमें कौन [ इन्द्रियाँ ] सोती हैं ? कौन इसमें जागती हैं ? कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? किसे यह सुख अनुभव होता है ? तथा किसमें ये सब प्रतिष्ठित हैं ?' ॥ १ ॥
| अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । प्रश्नत्रयेणापरविद्यागोचरं सर्वं परिसमाप्य संसारं व्याकृतविषयं साध्यसाधनलक्षणमनित्यम्; अथेदानीमसाध्यसाधनलक्षणमप्राणममनोगोचरम् अतीन्द्रियविषयं शिवं शान्तम् अविकृतमक्षरं सत्यं परविद्यागम्यं पुरुषाख्यं सबाह्याभ्यन्तरमजं वक्तव्यमित्युत्तरं प्रश्नत्रयम् आरभ्यते । | तदनन्तर उनसे सौर्यायणी गार्ग्यने पूछा । उपर्युक्त तीन प्रश्नोंमें अपरा विद्याके विषय व्याकृताश्रित साध्यसाधनरूप अनित्य संसारका निरूपण समाप्त कर अब साध्य-साधनसे अतीत तथा प्राण, मन और इन्द्रियोंके अविषय, परविद्यावेद्य, शिव, शान्त, अविकारी, अक्षर, सत्य और बाहर-भीतर विद्यमान अजन्मा पुरुष नामक तत्त्वका वर्णन करना है; इसीलिये आगेके तीन प्रश्नोंका आरम्भ किया जाता है । |
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