प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| ६० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| क्षेत्रज्ञः परमार्थतः स्वतः स्वपिति जागर्ति वा। मनउपाधिकृतमेव तस्य जागरणं स्वप्नश्चेत्युक्तं वाजसनेयके "सधीः स्वप्नो भूत्वा ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ०उ० ४।३।७)*इत्यादि। तस्मान्मनसो विभूत्यनुभवे स्वातन्त्र्यवचनं न्याय्यमेव। | वास्तवमें क्षेत्रज्ञ तो स्वयं न सोता है और न जागता ही है। उसका जागना और सोना तो मनरूप उपाधिके ही कारण है—ऐसा बृहदारण्यक श्रुतिमें कहा है—"वह बुद्धिसे तादात्म्य प्राप्त कर स्वप्नरूप होता है और मानो ध्यान करता तथा चेष्टा करता है" इत्यादि। अतः विभूतिके अनुभवमें मनकी स्वतन्त्रता बतलाना न्याययुक्त ही है। |
| पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्व-स्थापनम् — मनउपाधिसहितत्वे स्वप्नकाले क्षेत्रज्ञस्य स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्यतेति केचित्। तन्न, श्रुत्यर्थापरिज्ञानकृता भ्रान्तिस्तेषाम्। यस्मात्स्वयंज्योतिष्ट्वादिव्यवहारोऽप्यामोक्षान्तः सर्वोऽविद्याविषय एव मनआद्युपाधिजनितः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (बृ० उ० ४।३।३१) "मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति"। "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्" | किन्हीं-किन्हींका कथन है कि स्वप्नकालमें मनरूप उपाधिके सहित माननेमें क्षेत्रज्ञकी स्वयंप्रकाशतामें बाधा आवेगी सो ऐसी बात नहीं है। उनकी यह भ्रान्ति श्रुत्यर्थको न जाननेके ही कारण है, क्योंकि मन आदि उपाधिसे प्राप्त हुआ स्वयंप्रकाशत्व आदि व्यवहार भी मोक्षपर्यन्त सब-का-सब अविद्याके कारण ही है। जैसा कि "जहाँ कोई अन्य-सा हो वहीं अन्यको अन्य देख सकता है" "इस आत्माको विषयका संसर्ग ही नहीं होता" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया वहाँ किसे किसके द्वारा |
* बृहदारण्यकोपनिषद्में इस श्रुतिका पाठ इस प्रकार है—'ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वा'।