प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
इस स्वप्नावस्थामें यह देव अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसने [जाग्रत्-अवस्थामें] जो देखा होता है उस देखे हुएको ही देखता है, सुनी-सुनी बातोंको ही सुनता है तथा दिशा-विदिशाओंमें अनुभव किये हुएको ही पुनः-पुनः अनुभव करता है। [अधिक क्या] यह देखे, बिना देखे, सुने, बिना सुने, अनुभव किये, बिना अनुभव किये तथा सत् और असत् सभी प्रकारके पदार्थोंको देखता है और स्वयं भी सर्वरूप होकर देखता है॥ ५॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अत्रोपरतेषु श्रोत्रादिषु देहरक्षायै जाग्रत्सु प्राणादिवायुषु प्राक्सुषुप्तिप्रतिपत्तेः एतस्मिन् अन्तराल एष देवोऽर्करश्मिवत् स्वात्मनि संहृतश्रोत्रादिकरणः स्वप्ने महिमानं विभूतिं विषयविषयीलक्षणमनेकात्मभावगमनम् अनुभवति प्रतिपद्यते। | इस अवस्थामें यानी श्रोत्रादि इन्द्रियोंके उपरत हो जानेपर और प्राणादि वायुओंके जागते रहनेपर सुषुप्तिकी प्राप्तिसे पूर्व इस [जाग्रत्-सुषुप्तिके] मध्यकी अवस्थामें यह देव, जिसने सूर्यकी किरणोंके समान श्रोत्रादि इन्द्रियोंको अपनेमें लीन कर लिया है, स्वप्नावस्थामें अपनी महिमा यानी विभूतिको अनुभव करता है अर्थात् विषय-विषयीरूप अनेकात्मत्वको प्राप्त हो जाता है। |
| [मनःस्वातन्त्र्य-विचारः]<br>ननु महिमानुभवे करणं मनोऽनुभवितुस्तत्कथं स्वातन्त्र्येणानुभवति इत्युच्यते स्वतन्त्रो हि क्षेत्रज्ञः। | **पूर्व०—**मन तो विभूतिका अनुभव करनेमें अनुभव करनेवाले पुरुषका करण है; फिर यह कैसे कहा जाता है कि वह स्वतन्त्रतासे अनुभव करता है, क्योंकि स्वतन्त्र तो क्षेत्रज्ञ ही है। |
| नैष दोषः; क्षेत्रज्ञस्य स्वातन्त्र्यस्य मनउपाधिकृतत्वान्न हि | **सिद्धान्ती—**इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि क्षेत्रज्ञकी स्वतन्त्रता मनरूप उपाधिके कारण है, |