प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| ५८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| भवति तावत्सर्वयागफलानुभव एव नाविदुषामिवानर्थायेति विद्वत्ता स्तूयते। न हि विदुष एव श्रोत्रादीनि स्वपन्ते प्राणाग्नयो वा जाग्रति जाग्रत्स्वप्नयोर्मनः स्वातन्त्र्यमनुभवदहरहः सुषुप्तं वा प्रतिपद्यते। समानं हि सर्वप्राणिनां पर्यायेण जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिगमनमतो विद्वत्तास्तुतिरेव इयमुपपद्यते। यत्पृष्टं कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यतीति तदाह— | लेकर जबतक वह सोनेसे उठता है तबतक सम्पूर्ण यज्ञोंका फल ही अनुभव होता है, अज्ञानियोंके समान [उसकी निद्रा] अनर्थकी हेतु नहीं होती—ऐसा कहकर विद्वत्ताकी ही स्तुति की गयी है, क्योंकि केवल विद्वान्की ही श्रोत्रादि इन्द्रियाँ सोती और प्राणाग्नियाँ जागती हैं तथा उसीका मन जाग्रत् और सुषुप्तिमें स्वतन्त्रताका अनुभव करता हुआ रोज-रोज सुषुप्तिको प्राप्त होता है—ऐसी बात नहीं है। क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें जाना तो सभी प्राणियोंके लिये समान है। अतः यह विद्वत्ताकी स्तुति ही हो सकती है। अब, पहले जो यह पूछा था कि कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? सो बतलाते हैं— |
स्वप्नदर्शनका विवरण
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥