प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| न; तत्रापि “पुरीतति शेते” (बृ० उ० २।१।१९) इति श्रुतेः पुरीतन्नाडीसम्बन्धादत्रापि पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्ध-भारापनयाभिप्रायो मृषैव । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; उस अवस्थामें भी “पुरीतत् नाडीमें शयन करता है” इस श्रुतिके अनुसार जीवका पुरीतत् नाडीसे सम्बन्ध रहनेके कारण यह अभिप्राय मिथ्या ही है कि उसका आधा भार निवृत्त हो जाता है । |
| कथं तर्हि “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः” (बृ० उ० ४।३।१४) इति । | **पूर्व०—**तो फिर यह कैसे कहा गया है कि ‘इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है’ ? |
| अन्यशाखात्पादनपेक्षा सा श्रुतिरिति चेत् । | **मध्यस्थ—**यदि ऐसा मानें कि अन्य शाखाकी श्रुति * होनेके कारण यहाँ उसकी कोई अपेक्षा नहीं है, तो ? |
| न; अर्थैकत्वस्येष्टत्वादेको ह्यात्मा सर्ववेदान्तानामर्थो विविज्ञापयिषितो बुभुत्सितश्च । तस्माद्युक्ता स्वप्न आत्मनः स्वयं-ज्योतिष्ट्वोपपत्तिर्वक्तुम् । श्रुते-र्यथार्थतत्त्वप्रकाशकत्वात् । | **पूर्व०—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि हमें सब श्रुतियोंके अर्थकी एकता ही इष्ट है । सम्पूर्ण वेदान्तोंका तात्पर्य एक आत्मा ही है; वही उन्हें बतलाना इष्ट है और वही जिज्ञासुओंको ज्ञातव्य है । इसलिये स्वप्नमें आत्माकी स्वयंप्रकाशताकी उपपत्ति बतलाना उचित है, क्योंकि श्रुति यथार्थ तत्त्वको ही प्रकाशित करनेवाली है । |
| एवं तर्हि शृणु श्रुत्यर्थं हित्वा सर्वमभिमानं न त्वभिमानेन | **सिद्धान्ती—**अच्छा तो अब सब प्रकारका अभिमान त्यागकर श्रुतिका |
* क्योंकि यह उपनिषद् अथर्ववेदीय है और ‘अत्रायं पुरुषः’ आदि श्रुति यजुर्वेदीय काण्व-शाखाकी है ।