प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| न; तत्रापि “पुरीतति शेते” (बृ० उ० २।१।१९) इति श्रुतेः पुरीतन्नाडीसम्बन्धादत्रापि पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्ध-भारापनयाभिप्रायो मृषैव । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; उस अवस्थामें भी “पुरीतत् नाडीमें शयन करता है” इस श्रुतिके अनुसार जीवका पुरीतत् नाडीसे सम्बन्ध रहनेके कारण यह अभिप्राय मिथ्या ही है कि उसका आधा भार निवृत्त हो जाता है । |
| कथं तर्हि “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः” (बृ० उ० ४।३।१४) इति । | **पूर्व०—**तो फिर यह कैसे कहा गया है कि ‘इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है’ ? |
| अन्यशाखात्पादनपेक्षा सा श्रुतिरिति चेत् । | **मध्यस्थ—**यदि ऐसा मानें कि अन्य शाखाकी श्रुति * होनेके कारण यहाँ उसकी कोई अपेक्षा नहीं है, तो ? |
| न; अर्थैकत्वस्येष्टत्वादेको ह्यात्मा सर्ववेदान्तानामर्थो विविज्ञापयिषितो बुभुत्सितश्च । तस्माद्युक्ता स्वप्न आत्मनः स्वयं-ज्योतिष्ट्वोपपत्तिर्वक्तुम् । श्रुते-र्यथार्थतत्त्वप्रकाशकत्वात् । | **पूर्व०—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि हमें सब श्रुतियोंके अर्थकी एकता ही इष्ट है । सम्पूर्ण वेदान्तोंका तात्पर्य एक आत्मा ही है; वही उन्हें बतलाना इष्ट है और वही जिज्ञासुओंको ज्ञातव्य है । इसलिये स्वप्नमें आत्माकी स्वयंप्रकाशताकी उपपत्ति बतलाना उचित है, क्योंकि श्रुति यथार्थ तत्त्वको ही प्रकाशित करनेवाली है । |
| एवं तर्हि शृणु श्रुत्यर्थं हित्वा सर्वमभिमानं न त्वभिमानेन | **सिद्धान्ती—**अच्छा तो अब सब प्रकारका अभिमान त्यागकर श्रुतिका |
* क्योंकि यह उपनिषद् अथर्ववेदीय है और ‘अत्रायं पुरुषः’ आदि श्रुति यजुर्वेदीय काण्व-शाखाकी है ।
प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६३
| वर्षशतेनापि श्रुत्यर्थो ज्ञातुं शक्यते सर्वैः पण्डितम्मन्यैः । यथा-हृदयाकाशे पुरीतति नाडीषु च स्वपतस्तत्संबन्धाभावात्ततो विविच्य दर्शयितुं शक्यत इत्यात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वं न बाध्यते । एवं मनस्यविद्याकामकर्मनिमित्तोद्भूतवासनावति कर्मनिमित्ता वासनाविद्ययान्यद्वस्त्वन्तरमिव पश्यतः सर्वकार्यकरणेभ्यः प्रविविक्तस्य द्रष्टुर्वासनाभ्यो दृश्यरूपाभ्योऽन्यत्वेन स्वयंज्योतिष्ट्वं सुदर्पितेनापि तार्किकेण न वारयितुं शक्यते । तस्मात् साधूक्तं मनसि प्रलीनेषु करणेषु अप्रलीने च मनसि मनोमयः स्वप्नान्पश्यतीति । | अर्थ श्रवण कर, क्योंकि अपनेको पण्डित माननेवाले सभी पुरुषोंको सौ वर्षमें भी श्रुतिका अर्थ समझमें नहीं आ सकता । जिस प्रकार [स्वप्नावस्थामें ] हृदयाकाशमें और पुरीतत् नाडीमें शयन करनेवाले आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बाधित नहीं हो सकता, क्योंकि वह उससे सम्बन्ध न रहनेके कारण उससे पृथक् करके दिखलाया जा सकता है उसी प्रकार अविद्या, कामना और कर्म आदिके कारण उद्भूत हुई वासनाओंसे युक्त होनेपर भी मनमें अविद्यावश प्राप्त हुई कर्म-निमित्तक वासनाको अन्य वस्तुके समान देखनेवाले तथा सम्पूर्ण कार्य-करणोंसे पृथग्भूत द्रष्टा आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बड़े गर्वीले तार्किकोंद्वारा भी निवृत्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह दृश्यरूप वासनाओंसे भिन्नरूपसे स्थित है । इसलिये यह कहना बहुत ठीक है कि ‘इन्द्रियोंके मनमें लीन हो जानेपर तथा मनके लीन न होनेपर आत्मा मनरूप होकर स्वप्न देखा करता है’ । |
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६४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
| (विभूत्यनुभवप्रकारः) कथं महिमानमनुभवतीत्युच्यते; यन्मित्रं पुत्रादि वा पूर्वं दृष्टं तद्वासनावासितः पुत्रमित्रादिवासनासमुद्भूतं पुत्रं मित्रमिव वाविद्यया पश्यतीत्येवं मन्यते । तथा श्रुतमर्थं तद्वासनयानुशृणोतीव । देशदिगन्तरैश्च देशान्तरैर्दिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनस्तत्प्रत्यनुभवतीवाविद्यया । तथा दृष्टं चास्मिञ्जन्मन्यदृष्टं च जन्मान्तरदृष्टमित्यर्थः; अत्यन्तादृष्टे वासनानुपपत्तेः; एवं श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चास्मिञ्जन्मनि केवलैन मनसा अननुभूतं च मनसैव जन्मान्तरेऽनुभूतमित्यर्थः । सच्च परमार्थोदकादि, असच्च मरीच्युदकादि । किं बहुनोक्तानुक्तं सर्वं पश्यति | वह अपनी विभूतिका किस प्रकार अनुभव करता है ? सो अब बतलाते हैं—जिस मित्र या पुत्रादिको उसने पहले देखा होता है उसीकी वासनासे युक्त हो वह पुत्र-मित्रादिकी वासनासे प्रकट हुए पुत्र या मित्रको मानो अविद्यासे देखता है—ऐसा समझता है । इसी प्रकार सुने हुए विषयको मानो उसीकी वासनासे सुनता है तथा दिग्देशान्तरोंमें यानी भिन्न-भिन्न दिशा और देशोंमें अनुभव किये हुए पदार्थोंको अविद्यासे पुनः-पुनः अनुभव-सा करता है । इसी प्रकार दृष्ट—इसी जन्ममें देखे हुए एवं अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें देखे हुए, क्योंकि अत्यन्त अदृष्ट पदार्थोंमें वासनाका होना सम्भव नहीं है, तथा श्रुत-अश्रुत, अनुभूत—जिसका इसी जन्ममें केवल मनसे अनुभव किया हो, अननुभूत—जिसका मनसे ही जन्मान्तरमें अनुभव किया हो, सत्—जल आदि वास्तविक पदार्थ और असत्—मृगजलादि, अधिक क्या कहा जाय—ऊपर कहे हुए अथवा नहीं कहे हुए सभी पदार्थोंको |
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प्रश्न ४] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६५
| सर्वः पश्यति सर्वमनोवासनो- | वह सर्वरूपसे मनोवासनारूप | | पाधिः सन्नेवं सर्वकरणात्मा | उपाधिवाला होकर देखता है। इस | | मनोदेवः स्वप्नान्पश्यति ॥ ५ ॥ | प्रकार यह सर्वेन्द्रियरूप मनोदेव | | | स्वप्नोंको देखा करता है ॥ ५ ॥ |
सुषुप्तिनिरूपण
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥
जिस समय यह मन तेज (पित्त) से आक्रान्त होता है उस समय यह आत्मदेव स्वप्न नहीं देखता। उस समय इस शरीरमें यह सुख (ब्रह्मानन्द) होता है ॥ ६ ॥
| स यदा मनोरूपो देवो यस्मिन्काले सौरेण पित्ताख्येन तेजसा नाडीशयेन सर्वतोऽभिभूतो भवति तिरस्कृतवासनाद्वारो भवति तदा सह करणैः मनसो रश्मयो हृद्युपसंहृता भवन्ति। यदा मनो दार्वग्निवदविशेषविज्ञानरूपेण कृत्स्नं शरीरं व्याप्यावतिष्ठते तदा सुषुप्तो भवति। अत्रैतस्मिन्काल एष मनआक्यो देवः स्वप्नान्न पश्यति दर्शनद्वारस्य निरुद्धत्वात् | जिस समय वह मनरूप देव नाडीमें रहनेवाले पित्त नामक सौर तेजसे सब ओरसे अभिभूत अर्थात् जिसकी वासनाओंकी अभिव्यक्तिका द्वार लुप्त हो गया है—ऐसा हो जाता है उस समय इन्द्रियोंके सहित मनकी किरणोंका हृदयमें उपसंहार हो जाता है। जिस समय मन काष्ठमें व्याप्त अग्निके समान निर्विशेष विज्ञानरूपसे सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करके स्थित होता है उस समय वह सुषुप्ति-अवस्थामें पहुँच जाता है। यहाँ अर्थात् इस समय यह मन नामवाला देव स्वप्नोंको नहीं देखता, क्योंकि |
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| ६६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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| तेजसा । अथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति यद्विज्ञानं निराबाधमविशेषेण शरीरव्यापकं प्रसन्नं भवतीत्यर्थः ॥ ६ ॥ | उन्हें देखनेका द्वार तेजसे रुक जाता है । तदनन्तर इस शरीरमें यह सुख होता है; तात्पर्य यह कि जो निराबाध और सामान्यरूपसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त विज्ञान है वही स्फुट हो जाता है ॥ ६ ॥ |
| एतस्मिन्कालेऽविद्याकामकर्मनिबन्धनानि कार्यकारणानि शान्तानि भवन्ति । तेषु शान्तेषु आत्मस्वरूपमुपाधिभिरन्यथा विभाव्यमानमद्वयमेकं शिवं शान्तं भवतीत्येतामेवावस्थां पृथिव्याद्यविद्याकृतमात्रानुप्रवेशेन दर्शयितुं दृष्टान्तमाह— | इस समय अविद्या, काम और कर्मजनित शरीर एवं इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं। उनके शान्त हो जानेपर, उपाधियोंके कारण अन्यरूपसे भासित होनेवाला आत्मस्वरूप अद्वितीय, एक, शिव और शान्त हो जाता है । अतः पृथिवी आदि अविद्याकृत मात्राओं (विषयों) के अनुप्रवेशद्वारा इसी अवस्थाको दिखलानेके लिये दृष्टान्त दिया जाता है— |
स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने वसेरेके वृक्षपर जाकर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वह सब (कार्यकरणसंघात) सबसे उत्कृष्ट आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥
| स दृष्टान्तो यथा येन प्रकारेण सोम्य प्रियदर्शन वयांसि | वह दृष्टान्त इस प्रकार है— हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! जिस |
प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| पक्षिणो वासार्थं वृक्षं वासोवृक्षं प्रति संप्रतिष्ठन्ते गच्छन्ति । एवं यथा दृष्टान्तो ह वै तद्वक्ष्यमाणं सर्वं पर आत्मन्यक्षरे संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥ | प्रकार पक्षी अपने वासोवृक्ष—बसेरेके वृक्षकी ओर प्रस्थान करते यानी जाते हैं, यह जैसा दृष्टान्त है उसी प्रकार आगे कहा जानेवाला वह सब सर्वातीत आत्मा—अक्षरमें जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥ |
| किं तत्सर्वम्— | वह सब क्या है ? |
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पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥
पृथिवी और पृथिवीमात्रा (गन्धतन्मात्रा), जल और रसतन्मात्रा, तेज और रूपतन्मात्रा, वायु और स्पर्शतन्मात्रा, आकाश और शब्दतन्मात्रा, नेत्र और द्रष्टव्य (रूप), श्रोत्र और श्रोतव्य (शब्द), घ्राण और घ्रातव्य (गन्ध) रसना और रसयितव्य (रस), त्वचा और स्पर्शयोग्य पदार्थ, हाथ और ग्रहण करनेयोग्य वस्तु, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय, पाद और गन्तव्य स्थान, मन और मनन करनेयोग्य, बुद्धि और बोद्धव्य, अहङ्कार और अहङ्कारका
| ६८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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विषय, चित्त और चेतनीय, तेज और प्रकाश्य पदार्थ तथा प्राण और धारण करनेयोग्य वस्तु [ये सभी आत्मामें लीन हो जाते हैं] ॥ ८ ॥
| पृथिवी च स्थूला पञ्चगुणा तत्कारणा च पृथिवीमात्रा च गन्धतन्मात्रा, तथापश्चापोमात्रा च, तेजश्च तेजोमात्रा च, वायुश्च वायुमात्रा च, आकाशश्चाकाशमात्रा च, स्थूलानि च सूक्ष्माणि च भूतानीत्यर्थः । तथा चक्षुश्चेन्द्रियं रूपं च द्रष्टव्यं च, श्रोत्रं च श्रोतव्यं च, घ्राणं च घ्रातव्यं च, रसश्च रसयितव्यं च, त्वक्च स्पर्शयितव्यं च, वाक्च वक्तव्यं च, हस्तौ चादातव्यं च, उपस्थश्चानन्दयितव्यं च, पायुश्च विसर्जायितव्यं च, पादौ च गन्तव्यं च, बुद्धीन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि तथा चोक्तानि, मनश्च पूर्वोक्तम्, मन्तव्यं च तद्विषयः, बुद्धिश्च निश्चयात्मिका, बोद्धव्यं च तद्विषयः, अहङ्कारश्चाभिमानलक्षणमन्तःकरणमहङ्कर्तव्यं च तद्विषयः, चित्तं च चेतनावदन्तःकरणम्, चेतयितव्यं च | शब्दादि पाँच गुणोंसे युक्त स्थूल पृथिवी और उसकी कारणभूत पृथिवीतन्मात्रा यानी गन्धतन्मात्रा, तथा जल और रसतन्मात्रा, तेज और रूपतन्मात्रा, वायु और स्पर्शतन्मात्रा एवं आकाश और शब्दतन्मात्रा; अर्थात् सम्पूर्ण स्थूल और सूक्ष्मभूत; इसी प्रकार चक्षु-इन्द्रिय और उससे द्रष्टव्य रूप, श्रोत्र और श्रवणीय (शब्द), घ्राण और घ्रातव्य (गन्ध), रस और रसयितव्य, त्वक् और स्पर्शयितव्य, वाक्-इन्द्रिय और वक्तव्य (वचन), हाथ और उनसे ग्रहण करनेयोग्य पदार्थ, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय (मल), पाद और गन्तव्य स्थान; इस प्रकार वर्णन की हुई ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियाँ तथा पूर्वोक्त मन और उसका मन्तव्य विषय, निश्चयात्मिका बुद्धि और उसका बोद्धव्य विषय; अहङ्कार—अभिमानात्मक अन्तःकरण और उसका विषय अहङ्कर्तव्य; चित्त—चेतनायुक्त अन्तःकरण और उसका चेतयितव्य विषय; |
प्रश्न ४ ] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६९
| तद्विषयः, तेजश्च त्वगिन्द्रियव्यतिरेकेण प्रकाशविशिष्टा या त्वक्तया निर्भास्यो विषयो विद्योतयितव्यम्, प्राणश्च सूत्रं यदाचक्षते तेन विधारयितव्यं संग्रथनीयं सर्वं हि कार्यकारणजातं पारार्थ्येन संहतं नामरूपात्मकमेतावदेव ॥८॥ | तेज यानी त्वगिन्द्रियसे भिन्न प्रकाशविशिष्ट त्वचा और विद्योतयितव्य—उससे प्रकाशित होनेवाला विषय [ चर्म ] तथा प्राण जिसे सूत्रात्मक कहते हैं और उससे धारणं किये जानेयोग्य अर्थात् ग्रथित होनेयोग्य [ यह सब सुषुप्तिके समय आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है, क्योंकि ] पर—आत्माके लिये संहत हुआ नामरूपात्मक सम्पूर्ण कार्य-कारण-जात इतना ही है ॥ ८ ॥ |
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| अतः परं यदात्मरूपं जलसूर्यकादिवद्भोक्तृत्वकर्तृत्वेन इह अनुप्रविष्टम्— | इससे परे जो आत्मस्वरूप जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान इस शरीरमें कर्ता-भोक्तारूपसे अनुप्रविष्ट है— |
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सुषुप्तिमें जीवकी परमात्मप्राप्ति
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥
यही द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता (मनन करनेवाला), बोद्धा और कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष है। वह पर अक्षर आत्मामें सम्यक्प्रकारसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता | यही देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, |
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| घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा | चखनेवाला, मनन करनेवाला, जानने- |
| ७० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४: |
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| कर्ता विज्ञानात्मा विज्ञानं विज्ञायतेऽनेनेति करणभूतं बुद्ध्यादीदं तु विजानातीति विज्ञानं कर्तृकारकरूपं तदात्मा तत्स्वभावो विज्ञातृस्वभाव इत्यर्थः । पुरुषः कार्यकरणसंघातोक्तोपाधिपूर्णत्वात्पुरुषः । स च जलसूर्यकादिप्रतिबिम्बस्य सूर्यादिप्रवेशवज्जगदाधारशेषे परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठ ॥ ९ ॥ | वाला, कर्ता, विज्ञानात्मा—जिनसे जाना जाता है वह बुद्धि आदि ज्ञानके साधनस्वरूप हैं; किन्तु यह आत्मा तो उन्हें जानता है इसलिये यह कर्ता कारकरूप विज्ञान है । यह तद्रूप—वैसे स्वभाववाला अर्थात् विज्ञातृस्वभाव है । तथा कार्यकरणसंघातरूप उपाधिमें पूर्ण होनेके कारण यह पुरुष है । जलमें दिखायी देनेवाला सूर्यका प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जलरूप उपाधिके नष्ट हो जानेपर सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार यह द्रष्टा, श्रोता आदिरूपसे बतलाया गया पुरुष जगत्के आधारभूत पर अक्षर आत्मामें सम्यक्रूपसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥ | | तदेकत्वविदः फलमाह— | [ अक्षरब्रह्मके साथ ] उस विज्ञानात्माका एकत्व जाननेवालेको जो फल मिलता है, वह बतलाते हैं— |
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥
हे सोम्य ! इस छायाहीन, अशरीरी, अलोहित, शुभ्र अक्षरको जो पुरुष जानता है वह पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है । इस सम्बन्धमें यह श्लोक (मन्त्र) है ॥ १० ॥
| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |
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| परमेवाक्षरं वक्ष्यमाणविशेषणं प्रतिपद्यत इत्येतदुच्यते । स यो ह वै तत्सर्वैषणाविनिर्मुक्तोऽच्छायं तमोवर्जितम्, अशरीरं नामरूपसर्वोपाधिशरीरवर्जितम्, अलोहितं लोहितादिसर्वगुणवर्जितम्, यत एवमतः शुभ्रं शुद्धम् , सर्वविशेषणरहितत्वादक्षरम् , सत्यं पुरुषाख्यम्, अप्राणम् अमनोगोचरम्, शिवं शान्तं सबाह्याभ्यन्तरमजं वेदयते विजानाति यस्तु सर्वत्यागी सोम्य स सर्वज्ञो न तेनाविदितं किंचित् सम्भवति । पूर्वमविद्ययाऽसर्वज्ञ आसीत्पुनर्विद्ययाविद्यापनये सर्वो भवति तदा । तत्तस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति उक्तार्थसंग्राहकः ॥ १० ॥ | उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि वह आगे बतलाये जानेवाले विशेषणोंसे युक्त पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । सम्पूर्ण एषणाओंसे छूटा हुआ जो अधिकारी उस अच्छाय—तमोहीन, अशरीर—नामरूपमय सम्पूर्ण औपाधिक शरीरोंसे रहित, अलोहित—लोहितादि सब प्रकारके गुणोंसे हीन, और ऐसा होनेके कारण ही जो शुभ्र—शुद्ध, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित होनेके कारण अक्षर, पुरुषसंज्ञक सत्य, अप्राण, मनका अविषय, शिव, शान्त और सबाह्याभ्यन्तर अज परब्रह्मको जानता है, तथा जो सबका त्याग करनेवाला है, हे सोम्य ! वह सर्वज्ञ हो जाता है—उससे कुछ भी अज्ञात नहीं रह सकता । वह अविद्यावश पहले असर्वज्ञ था, फिर विद्याद्वारा अविद्याके नष्ट हो जानेपर वही [ सर्वज्ञ और ] सर्वरूप हो जाता है । इस विषयमें उपर्युक्त अर्थका संग्रह करनेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है ॥ १० ॥ |
अक्षरब्रह्मके ज्ञानका फल
$\begin{aligned} विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः \ प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । \end{aligned}$
७२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य
स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥
हे सोम्य ! जिस अक्षरमें समस्त देवोंके सहित विज्ञानात्मा प्राण और भूत सम्यक् प्रकारसे स्थित होते हैं उसे जो जानता है वह सर्वज्ञ सभीमें प्रवेश कर जाता है ॥ ११ ॥
| विज्ञानात्मा सह देवैश्चाग्न्या- | जिस अक्षरमें अग्नि आदि | | दिभिः प्राणाश्चक्षुरादयो भूतानि | देवोंके सहित विज्ञानात्मा तथा | | पृथिव्यादीनि संप्रतिष्ठन्ति | चक्षु आदि प्राण और पृथिवी आदि | | प्रविशन्ति यत्र यस्मिन्नक्षरे | भूत प्रतिष्ठित होते अर्थात् प्रवेश | | तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य | करते हैं, हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! | | प्रियदर्शन स सर्वज्ञः सर्वमेव | उस अक्षरको जो जानता है वह सर्वज्ञ | | आविवेशाविशतीत्यर्थः ॥ ११ ॥ | सभीमें आविष्ट अर्थात् प्रविष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
चतुर्थः प्रश्नः ॥ ४ ॥
पञ्चम प्रश्न (त्रिमात्र ओङ्कारोपासना व फल)
पञ्चम प्रश्न
सत्यकामका प्रश्न—ओङ्कारोपासकको किस लोककी प्राप्ति होती है?
अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे शिविपुत्र सत्यकामने पूछा—'भगवन् ! मनुष्योंमें जो पुरुष प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओंकारका चिन्तन करे, वह उस (ओंकारोपासना) से किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥
| अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ; अथेदानों परापरब्रह्म-प्राप्तिसाधनत्वेनोङ्कारस्योपासन-विधित्सया प्रश्न आरभ्यते- | तदनन्तर उन आचार्य पिप्पलादसे शिविके पुत्र सत्यकामने पूछा; अब इससे आगे पर और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिके साधन-स्वरूप ओंकारोपासनाका विधान करनेकी इच्छासे आगेका प्रश्न प्रारम्भ किया जाता है । |
| स यः कश्चिद् वै भगवन् मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये तद् अद्भुतमिव प्रायणान्तं मरणान्तम्, यावज्जीवमित्येतत्, ओङ्कारमभिध्यायीताभिमुख्येन चिन्तयेत्, | हे भगवन् ! मनुष्योंमें—मनुष्यजातिके बीच जो कोई आश्चर्यसदृश विरल पुरुष मरण-पर्यन्त--यावज्जीवन ओंकारका अभिध्यान अर्थात् मुख्यरूपसे चिन्तन करे |
७४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५ ]
| बाह्यविषयेभ्य उपसंहृतकरणः समाहितचित्तो भक्त्यावेशित-ब्रह्मभाव ओंकारे, आत्मप्रत्यय-सन्तानाविच्छेदो भिन्नजातीय-प्रत्ययान्तराखिलीकृतो निर्वात-स्थदीपशिखासमोऽभिध्यानश-ब्दार्थः। सत्यब्रह्मचर्याहिंसापरि-ग्रहत्यागसंन्यासशौचसन्तोषा-मायावित्वाद्यनेकयमनियमानु-गृहीतः स एवं यावज्जीवव्रत-धारणः कतमं वाव, अनेके हि ज्ञानकर्मनिर्वर्त्या लोकास्तिष्ठन्ति तेषु तेनोङ्काराभिध्यानेन कतमं स लोकं जयति ॥ १ ॥ | लेता है?] इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर और चित्तको एकाग्र कर उसे भक्तिके द्वारा जिसमें ब्रह्मभाव-की प्रतिष्ठा की गयी है उस ओंकारमें इस प्रकार लगा देना कि आत्मप्रत्ययसन्ततिका विच्छेद न हो—भिन्न जातीय प्रतीतियोंसे उसमें बाधा न आवे तथा वह वायुहीन स्थानमें रक्खे हुए दीपक-की शिखाके समान स्थित हो जाय—ऐसा ध्यान ही ‘अभिध्यान’ शब्दका अर्थ है। सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, संन्यास, शौच, सन्तोष, निष्कपटता आदि अनेक यम-नियमोंसे सम्पन्न होकर यावज्जीवन ऐसा व्रत धारण करने-वालेको भला कौन-सा लोक प्राप्त होगा ? क्योंकि ज्ञान और कर्मसे प्राप्त होनेयोग्य तो बहुत-से लोक हैं; उनमें उस ओंकारचिन्तनद्वारा वह किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥ |
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ओंकारोपासनासे प्राप्तव्य पर अथवा अपर ब्रह्म
तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥
उससे उस पिप्पलादने कहा—हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है। अतः विद्वान् इसीके आश्रयसे उनमेंसे किसी एक [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७५
| इति पृष्टवते तस्मै स होवाच पिप्पलादः—एतद्वै सत्यकाम ! एतद्ब्रह्म वै परं चापरं च ब्रह्म परं सत्यमक्षरं पुरुषाख्यमपरं च प्राणाख्यं प्रथमजं यत्तदोङ्कार एवोङ्कारात्मकमोङ्कारप्रतीकत्वात्। परं हि ब्रह्म शब्दाद्युपलक्षणानहं सर्वधर्मविशेषवर्जितमतो न शक्यम् अतीन्द्रियगोचरत्वात्केवलेन मनसावगाहितुम् । ओङ्कारे तु विष्ण्वादिप्रतिमास्थानीये भक्त्यावेशितब्रह्मभावे ध्यायिनां तत्प्रसीदति इत्येतदवगम्यते शास्त्रप्रामाण्यात् तथापरं च ब्रह्म । तस्मात्परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कार इत्युपचर्यते। तस्मादेवं विद्वानेतेनैवात्मप्राप्तिसाधनेनैवोङ्काराभिध्यानेन एकतरं परमपरं चान्वेति ब्रह्मानुगच्छति नेदिष्ठं ह्यालम्वनम् ओङ्कारो ब्रह्मणः ॥२॥ | इस प्रकार पूछनेवाले सत्यकामसे पिप्पलादने कहा — हे सत्यकाम ! यह पर और अपर ब्रह्म; पर अर्थात् सत्य अक्षर अथवा पुरुषसंज्ञक ब्रह्म तथा जो प्रथम विकाररूप प्राण नामक अपर ब्रह्म है वह ओंकार ही है; अर्थात् ओंकाररूप प्रतीकवाला होनेसे ओंकारस्वरूप ही है । परब्रह्म शब्दादिसे उपलक्षित होनेके अयोग्य और सब प्रकारके विशेष धर्मोंसे रहित है; अतः इन्द्रिय-गोचरतासे अतीत होनेके कारण केवल मनसे उसका अवगाहन नहीं किया जा सकता । किन्तु विष्णु आदिकी प्रतिमास्थानीय ओंकारमें जिसमें कि भक्तिके द्वारा ब्रह्म-भावकी स्थापना की गयी है, ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है—यह बात शास्त्र-प्रमाणसे जानी जाती है। इसी प्रकार अपर ब्रह्म भी [ॐकारमें ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है] । अतः पर और अपर ब्रह्म ओंकार ही है—ऐसा उपचारसे कहा जाता है । सुतरां, विद्वान् आत्मप्राप्तिके इस ओंकार-चिन्तनरूप साधनसे ही पर या अपर किसी एक ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि ओंकार ही ब्रह्म-का सबसे अधिक समीपवर्ती आलम्बन है ॥२॥ |
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| ७६ | प्रश्नोपनिषद् | [. प्रश्न ५ |
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एकमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥
वह यदि एकमात्राविशिष्ट ॐकारका ध्यान करता है तो उसीसे बोधको प्राप्त कर तुरन्त ही संसारको प्राप्त हो जाता है । उसे ऋचाएँ मनुष्यलोकमें ले जाती हैं । वहाँ वह तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर महिमाका अनुभव करता है ॥ ३ ॥
| स यद्यप्योङ्कारस्य सकलमात्राविभागज्ञो न भवति तथापि ओङ्काराभिध्यानप्रभावाद्विशिष्टामेव गतिं गच्छति; एतदेकदेशज्ञानवैगुण्यतयोङ्कारशरणः कर्मज्ञानोभयभ्रष्टो न दुर्गतिं गच्छति । किं तर्हि ? यद्यप्येवम् ओङ्कारमेवैकमात्राविभागज्ञ एव केवलोऽभिध्यायीतैकमात्रं सदा ध्यायीत स तेनैवैकमात्राविशिष्टोङ्काराभिध्यानेनैव संवेदितः सम्बोधितस्तूर्णं क्षिप्रमेव जगत्यां पृथिव्यामभिसम्पद्यते । | यद्यपि वह ओंकारकी समस्त मात्राओंका ज्ञाता नहीं होता; तो भी ओंकारके चिन्तनके प्रभावसे वह विशिष्ट गतिको ही प्राप्त होता है । अर्थात् ओंकारकी शरणमें प्राप्त हुआ पुरुष इसके एकांश ज्ञानरूप दोषसे कर्म और ज्ञान दोनोंसे भ्रष्ट होकर दुर्गति को प्राप्त नहीं होता । तो फिर क्या होता है ? वह इस प्रकार यदि ओंकारकी केवल एकमात्राका ज्ञाता होकर केवल एकमात्राविशिष्ट ओंकारका ही अभिध्यान यानी सर्वदा चिन्तन करता है तो वह उस एकमात्राविशिष्ट ओंकारके ध्यानसे ही संवेदित अर्थात् बोध प्राप्त कर तत्काल जगती यानी पृथिवीलोकमें प्राप्त हो जाता है । |
प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
| किम् ? मनुष्यलोकम् । अनेकानि हि जन्मानि जगत्त्यां सम्भवन्ति । तत्र तं साधकं जगत्त्यां मनुष्यलोकमेवर्च उपनयन्त उपनिगमयन्ति । ऋच ऋग्वेदस्वरूपा ह्योङ्कारस्य प्रथमैकमात्राभिध्याता । तेन स तत्र मनुष्यजन्मनि द्विजाग्र्यः संस्तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया च संपन्नो महिमानं विभूतिमनुभवति न वीतश्रद्धो यथेष्टचेष्टो भवति योगभ्रष्टः कदाचिदपि न दुर्गतिं गच्छति ॥ ३ ॥ | - [पृथिवीलोकमें] किसे प्राप्त होता है ? मनुष्यलोकको; क्योंकि संसारमें तो अनेक प्रकारके जन्म हो सकते हैं । उनमेंसे संसारमें उस साधकको ऋचाएँ मनुष्यलोकको ही ले जाती हैं, क्योंकि ओंकारकी ध्यान की हुई पहली एक मात्रा (अ) ऋग्वेदस्वरूपा है । इससे उस मनुष्यजन्ममें वह द्विजश्रेष्ठ होकर तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न हो महिमा यानी विभूतिका अनुभव करता है—श्रद्धाहीन होकर स्वेच्छाचारी नहीं होता । ऐसा योगभ्रष्ट कभी दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता ॥ ३ ॥ |
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द्विमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥
और यदि वह द्विमात्राविशिष्ट ओंकारके चिन्तनद्वारा मनसे एकत्वको प्राप्त हो जाता है तो उसे यजुःश्रुतियाँ अन्तरिक्षस्थित सोमलोकमें ले जाती हैं । तदनन्तर सोमलोकमें विभूतिका अनुभव कर वह फिर लौट आता है ॥ ४ ॥
७८ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५
| अथ पुनर्यदि द्विमात्राविभागज्ञो द्विमात्रेण विशिष्टमोङ्कारम् अभिध्यायीत स्वप्नात्मके मनसि मननीये यजुर्मये सोमदैवत्ये संपद्यत एकाग्रतयात्मभावं गच्छति स एवं सम्पन्नो मृतोऽन्तरिक्षम् अन्तरिक्षाधारं द्वितीयमात्रारूपं द्वितीयमात्रारूपैरेव यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकं सौम्यं जन्म प्रापयन्ति तं यजूंषीत्यर्थः। स तत्र विभूतिम् अनुभूय सोमलोके मनुष्यलोकं प्रति पुनरावर्तते ॥ ४ ॥ | और यदि वह दो मात्राओं (अ उ) के विभागका ज्ञाता होकर द्विमात्राविशिष्ट ओंकारका चिन्तन करता है तो वह सोम ही जिसका देवता है उस स्वप्नात्मक यजुर्वेदस्वरूप मननीय मनको प्राप्त होता है अर्थात् एकाग्रताद्वारा उसके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है [यानी उसे ही अपना-आप मानने लगता है]। इस अवस्थामें मृत्युको प्राप्त होनेपर वह अन्तरिक्षाधार द्वितीयमात्रास्वरूप सोमलोकमें द्वितीयमात्रारूप यजुःश्रुतियों द्वारा सोमलोकको ले जाया जाता है। अर्थात् यजुःश्रुतियाँ उसे सोमलोकसम्बन्धी जन्म प्राप्त कराती हैं। उस सोमलोकमें विभूतिका अनुभव कर वह फिर मनुष्यलोकमें लौट आता है ॥ ४ ॥ |
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त्रिमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
प्रश्न ५.] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ॐ इस अक्षरद्वारा इस परम-पुरुषकी उपासना करता है वह तेजोमय सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सर्प जिस प्रकार केंचुलीसे निकल आता है उसी प्रकार वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सामश्रुतियोंद्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है और इस जीवनघनसे भी उत्कृष्ट हृदयस्थित परम पुरुषका साक्षात्कार करता है। इस सम्बन्धमें ये दो श्लोक हैं ॥ ५ ॥
| यः पुनरेतमोङ्कारं त्रिमात्रेण <br><br> त्रिमात्राविषयविज्ञानविशिष्टेन <br><br> ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं सूर्या- <br><br> न्तर्गतं पुरुषं प्रतीकेनाभि- <br><br> ध्यायीत तेनाभिध्यानेन— <br><br> प्रतीकत्वेन ह्यालम्वनत्वं प्रकृतम् <br><br> ओङ्कारस्य परं चापरं च ब्रह्मेत्य- <br><br> भेदश्रुतेरोङ्कारमिति च द्वितीया- <br><br> नेकंशः श्रुता बाध्येतान्यथा <br><br> यद्यपि तृतीयाभिध्यानत्वेन करण- <br><br> त्वमुपपद्यते तथापि प्रकृतानु- <br><br> रोधात्त्रिमात्रं परं पुरुषमिति <br><br> द्वित्तीयैव परिणेया "त्यजेदेकं | परन्तु जो पुरुष इस तीन मात्राओंवाले—तीनमात्राविषयक विज्ञानसे युक्त ‘ॐ’ इस अक्षरात्मक प्रतीकरूपसे पर अर्थात् सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषका चिन्तन करता है वह उस चिन्तनके द्वारा ही ध्यान करता हुआ तृतीय मात्रारूप होकर तेजोमय सूर्यलोकमें स्थित हो जाता है। वह मृत्युके पश्चात् भी चन्द्रलोकादिके समान सूर्यलोकसे लौटकर नहीं आता, बल्कि सूर्यमें लीन हुआ ही स्थित रहता है। ‘परं चापरं च ब्रह्म’ इस अभेदश्रुतिद्वारा ओंकारका प्रतीकरूपसे आलम्बनत्व बतलाया गया है [ब्रह्मप्राप्तिमें उसका साधनत्व नहीं बतलाया गया]। अन्यथा बहुत-सी श्रुतियोंमें जो ‘ओंकारम्’ ऐसी द्वितीया विभक्ति आयी है, वह बाधित हो जायगी। |
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| ८० | . प्रश्नोपनिषद् . | [ प्रश्न ५ |
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| कुलस्यार्थे" (महा० उ० ३७।१७) इति न्यायेन । स तृतीयमात्रारूपस्तेजसि सूर्ये संपन्नो भवति ध्यायमानो मृतोऽपि सूर्यात्सोमलोकादिव न पुनरावर्तते किन्तु सूर्ये संपन्नमात्र एव । | यद्यपि 'ओमित्येतेन' इस पदमें तृतीया विभक्ति होनेके कारण इसका करणत्व (साधनत्व) मानना भी ठीक है तथापि 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' (कुलके हितके लिये एक व्यक्तिका त्याग कर देना चाहिये) इस न्यायसे प्रकरणके अनुसार इसे 'त्रिमात्रं परं पुरुषम्' इस प्रकार द्वितीया विभक्तिमें ही परिणत कर लेना चाहिये । |
| यथा पादोदरः सर्पस्त्वचा विनिर्मुच्यते जीर्णत्वग्विनिर्मुक्तः स पुनर्नवो भवति । एवं ह वा एष यथा दृष्टान्तः स पाप्मना सर्पत्वक्स्थानीयेनाशुद्धिरूपेण विनिर्मुक्तः सामभिस्तृतीयमात्रारूपैरूर्ध्वमुन्नीयते ब्रह्मलोकं हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो लोकं सत्याख्यम् । स हिरण्यगर्भः सर्वेषां संसारिणां जीवानामात्मभूतः । स ह्यन्तरात्मा लिङ्गरूपेण सर्वभूतानां तस्मिन्हि लिङ्गात्मनि संहताः सर्वे जीवाः । तस्मात्स जीवघनः । स विद्वांस्त्रिमात्रोङ्काराभिज्ञ एतस्माज्जीवघनाद्धिरण्य- | जिस प्रकार पादोदर—सर्प केंचुलीसे छूट जाता है, और वह जीर्ण त्वचासे छूटकर पुनः नवीन हो जाता है, उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, वह साधक सर्पकी केंचुलीरूप अशुद्धिमय पापसे मुक्त हो तृतीय मात्रारूप सामश्रुतियोंद्वारा ऊपरकी ओर ब्रह्मलोकको यानी हिरण्यगर्भ—ब्रह्माके सत्य नामक लोकको ले जाया जाता है । वह हिरण्यगर्भ सम्पूर्ण संसारी जीवोंका आत्मस्वरूप है । वही लिङ्गदेहरूपसे समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है । उस लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भमें ही समस्त जीव संहत हैं । अतः वह जीवघन है । वह त्रिमात्र ओंकार का ज्ञाता एवं ध्यान करनेवाला विद्वान् इस उत्तम जीवघनस्वरूप |
प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
| गर्भात्परात्परं परमात्मारूयं पुरुषमीक्षते पुरिशयं सर्वशरीरा- नुप्रविष्टं पश्यति ध्यायमानः । तदेतस्मिन्यथोक्तार्थप्रकाशकौ मन्त्रौ भवतः ॥ ५ ॥ | हिरण्यगर्भसे भी श्रेष्ठ तथा पुरिशय- सम्पूर्ण शरीरोंमें अनुप्रविष्ट परमात्मा- संज्ञक पुरुषको देखता है। इस उपर्युक्त अर्थको ही प्रकाशित करने- वाले ये दो श्लोक यानी मन्त्र हैं ॥ ५॥ |
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ओङ्कारकी तीन मात्राओंकी विशेषता
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
ओङ्कारकी तीनों मात्राएँ [पृथक्-पृथक् रहनेपर] मृत्युसे युक्त हैं। वे [ध्यान-क्रियामें] प्रयुक्त होती हैं और परस्पर सम्बद्ध तथा अनविप्रयुक्ता (जिनका विपरीत प्रयोग न किया गया हो—ऐसी) हैं। इस प्रकार बाह्य (जाग्रत्), आभ्यन्तर (सुषुप्ति) और मध्यम (स्वप्न-स्थानीय) क्रियाओंमें उनका सम्यक् प्रयोग किया जानेपर ज्ञाता पुरुष विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥
| तिस्रस्त्रिसंख्याका अकारो-कारमकाराख्या ओङ्कारस्य मात्रा मृत्युमत्यो मृत्यु- र्यासां विद्यते ता मृत्युमंत्यो मृत्युगोचरादनतिक्रान्ता मृत्यु- गोचरा एवेत्यर्थः । ता आत्मनो <br> ६ | ओंकारकी अकार, उकार और मकार—ये तीन मात्राएँ मृत्युमती हैं। जिनकी मृत्यु विद्यमान है— जो मृत्युकी पहुँचसे परे नहीं हैं अर्थात् मृत्युकी विषयभूता ही हैं उन्हें मृत्युमती कहते हैं। ये आत्मा- |
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