प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न ५.] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ॐ इस अक्षरद्वारा इस परम-पुरुषकी उपासना करता है वह तेजोमय सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सर्प जिस प्रकार केंचुलीसे निकल आता है उसी प्रकार वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सामश्रुतियोंद्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है और इस जीवनघनसे भी उत्कृष्ट हृदयस्थित परम पुरुषका साक्षात्कार करता है। इस सम्बन्धमें ये दो श्लोक हैं ॥ ५ ॥
| यः पुनरेतमोङ्कारं त्रिमात्रेण <br><br> त्रिमात्राविषयविज्ञानविशिष्टेन <br><br> ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं सूर्या- <br><br> न्तर्गतं पुरुषं प्रतीकेनाभि- <br><br> ध्यायीत तेनाभिध्यानेन— <br><br> प्रतीकत्वेन ह्यालम्वनत्वं प्रकृतम् <br><br> ओङ्कारस्य परं चापरं च ब्रह्मेत्य- <br><br> भेदश्रुतेरोङ्कारमिति च द्वितीया- <br><br> नेकंशः श्रुता बाध्येतान्यथा <br><br> यद्यपि तृतीयाभिध्यानत्वेन करण- <br><br> त्वमुपपद्यते तथापि प्रकृतानु- <br><br> रोधात्त्रिमात्रं परं पुरुषमिति <br><br> द्वित्तीयैव परिणेया "त्यजेदेकं | परन्तु जो पुरुष इस तीन मात्राओंवाले—तीनमात्राविषयक विज्ञानसे युक्त ‘ॐ’ इस अक्षरात्मक प्रतीकरूपसे पर अर्थात् सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषका चिन्तन करता है वह उस चिन्तनके द्वारा ही ध्यान करता हुआ तृतीय मात्रारूप होकर तेजोमय सूर्यलोकमें स्थित हो जाता है। वह मृत्युके पश्चात् भी चन्द्रलोकादिके समान सूर्यलोकसे लौटकर नहीं आता, बल्कि सूर्यमें लीन हुआ ही स्थित रहता है। ‘परं चापरं च ब्रह्म’ इस अभेदश्रुतिद्वारा ओंकारका प्रतीकरूपसे आलम्बनत्व बतलाया गया है [ब्रह्मप्राप्तिमें उसका साधनत्व नहीं बतलाया गया]। अन्यथा बहुत-सी श्रुतियोंमें जो ‘ओंकारम्’ ऐसी द्वितीया विभक्ति आयी है, वह बाधित हो जायगी। |
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