प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
प्रश्न ५.] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ॐ इस अक्षरद्वारा इस परम-पुरुषकी उपासना करता है वह तेजोमय सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सर्प जिस प्रकार केंचुलीसे निकल आता है उसी प्रकार वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सामश्रुतियोंद्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है और इस जीवनघनसे भी उत्कृष्ट हृदयस्थित परम पुरुषका साक्षात्कार करता है। इस सम्बन्धमें ये दो श्लोक हैं ॥ ५ ॥
| यः पुनरेतमोङ्कारं त्रिमात्रेण <br><br> त्रिमात्राविषयविज्ञानविशिष्टेन <br><br> ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं सूर्या- <br><br> न्तर्गतं पुरुषं प्रतीकेनाभि- <br><br> ध्यायीत तेनाभिध्यानेन— <br><br> प्रतीकत्वेन ह्यालम्वनत्वं प्रकृतम् <br><br> ओङ्कारस्य परं चापरं च ब्रह्मेत्य- <br><br> भेदश्रुतेरोङ्कारमिति च द्वितीया- <br><br> नेकंशः श्रुता बाध्येतान्यथा <br><br> यद्यपि तृतीयाभिध्यानत्वेन करण- <br><br> त्वमुपपद्यते तथापि प्रकृतानु- <br><br> रोधात्त्रिमात्रं परं पुरुषमिति <br><br> द्वित्तीयैव परिणेया "त्यजेदेकं | परन्तु जो पुरुष इस तीन मात्राओंवाले—तीनमात्राविषयक विज्ञानसे युक्त ‘ॐ’ इस अक्षरात्मक प्रतीकरूपसे पर अर्थात् सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषका चिन्तन करता है वह उस चिन्तनके द्वारा ही ध्यान करता हुआ तृतीय मात्रारूप होकर तेजोमय सूर्यलोकमें स्थित हो जाता है। वह मृत्युके पश्चात् भी चन्द्रलोकादिके समान सूर्यलोकसे लौटकर नहीं आता, बल्कि सूर्यमें लीन हुआ ही स्थित रहता है। ‘परं चापरं च ब्रह्म’ इस अभेदश्रुतिद्वारा ओंकारका प्रतीकरूपसे आलम्बनत्व बतलाया गया है [ब्रह्मप्राप्तिमें उसका साधनत्व नहीं बतलाया गया]। अन्यथा बहुत-सी श्रुतियोंमें जो ‘ओंकारम्’ ऐसी द्वितीया विभक्ति आयी है, वह बाधित हो जायगी। |
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| ८० | . प्रश्नोपनिषद् . | [ प्रश्न ५ |
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| कुलस्यार्थे" (महा० उ० ३७।१७) इति न्यायेन । स तृतीयमात्रारूपस्तेजसि सूर्ये संपन्नो भवति ध्यायमानो मृतोऽपि सूर्यात्सोमलोकादिव न पुनरावर्तते किन्तु सूर्ये संपन्नमात्र एव । | यद्यपि 'ओमित्येतेन' इस पदमें तृतीया विभक्ति होनेके कारण इसका करणत्व (साधनत्व) मानना भी ठीक है तथापि 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' (कुलके हितके लिये एक व्यक्तिका त्याग कर देना चाहिये) इस न्यायसे प्रकरणके अनुसार इसे 'त्रिमात्रं परं पुरुषम्' इस प्रकार द्वितीया विभक्तिमें ही परिणत कर लेना चाहिये । |
| यथा पादोदरः सर्पस्त्वचा विनिर्मुच्यते जीर्णत्वग्विनिर्मुक्तः स पुनर्नवो भवति । एवं ह वा एष यथा दृष्टान्तः स पाप्मना सर्पत्वक्स्थानीयेनाशुद्धिरूपेण विनिर्मुक्तः सामभिस्तृतीयमात्रारूपैरूर्ध्वमुन्नीयते ब्रह्मलोकं हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो लोकं सत्याख्यम् । स हिरण्यगर्भः सर्वेषां संसारिणां जीवानामात्मभूतः । स ह्यन्तरात्मा लिङ्गरूपेण सर्वभूतानां तस्मिन्हि लिङ्गात्मनि संहताः सर्वे जीवाः । तस्मात्स जीवघनः । स विद्वांस्त्रिमात्रोङ्काराभिज्ञ एतस्माज्जीवघनाद्धिरण्य- | जिस प्रकार पादोदर—सर्प केंचुलीसे छूट जाता है, और वह जीर्ण त्वचासे छूटकर पुनः नवीन हो जाता है, उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, वह साधक सर्पकी केंचुलीरूप अशुद्धिमय पापसे मुक्त हो तृतीय मात्रारूप सामश्रुतियोंद्वारा ऊपरकी ओर ब्रह्मलोकको यानी हिरण्यगर्भ—ब्रह्माके सत्य नामक लोकको ले जाया जाता है । वह हिरण्यगर्भ सम्पूर्ण संसारी जीवोंका आत्मस्वरूप है । वही लिङ्गदेहरूपसे समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है । उस लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भमें ही समस्त जीव संहत हैं । अतः वह जीवघन है । वह त्रिमात्र ओंकार का ज्ञाता एवं ध्यान करनेवाला विद्वान् इस उत्तम जीवघनस्वरूप |
प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
| गर्भात्परात्परं परमात्मारूयं पुरुषमीक्षते पुरिशयं सर्वशरीरा- नुप्रविष्टं पश्यति ध्यायमानः । तदेतस्मिन्यथोक्तार्थप्रकाशकौ मन्त्रौ भवतः ॥ ५ ॥ | हिरण्यगर्भसे भी श्रेष्ठ तथा पुरिशय- सम्पूर्ण शरीरोंमें अनुप्रविष्ट परमात्मा- संज्ञक पुरुषको देखता है। इस उपर्युक्त अर्थको ही प्रकाशित करने- वाले ये दो श्लोक यानी मन्त्र हैं ॥ ५॥ |
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ओङ्कारकी तीन मात्राओंकी विशेषता
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
ओङ्कारकी तीनों मात्राएँ [पृथक्-पृथक् रहनेपर] मृत्युसे युक्त हैं। वे [ध्यान-क्रियामें] प्रयुक्त होती हैं और परस्पर सम्बद्ध तथा अनविप्रयुक्ता (जिनका विपरीत प्रयोग न किया गया हो—ऐसी) हैं। इस प्रकार बाह्य (जाग्रत्), आभ्यन्तर (सुषुप्ति) और मध्यम (स्वप्न-स्थानीय) क्रियाओंमें उनका सम्यक् प्रयोग किया जानेपर ज्ञाता पुरुष विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥
| तिस्रस्त्रिसंख्याका अकारो-कारमकाराख्या ओङ्कारस्य मात्रा मृत्युमत्यो मृत्यु- र्यासां विद्यते ता मृत्युमंत्यो मृत्युगोचरादनतिक्रान्ता मृत्यु- गोचरा एवेत्यर्थः । ता आत्मनो <br> ६ | ओंकारकी अकार, उकार और मकार—ये तीन मात्राएँ मृत्युमती हैं। जिनकी मृत्यु विद्यमान है— जो मृत्युकी पहुँचसे परे नहीं हैं अर्थात् मृत्युकी विषयभूता ही हैं उन्हें मृत्युमती कहते हैं। ये आत्मा- |
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| ८२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ५ |
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| ध्यानक्रियासु प्रयुक्ताः, किं चान्योन्यासक्ता इतरेतरसंबद्धाः, अनविप्रयुक्ता विशेषेणैकैकविषय एव प्रयुक्ता विप्रयुक्ताः, न तथा विप्रयुक्ता अविप्रयुक्ता नाविप्रयुक्ता अनविप्रयुक्ताः। | की ध्यानक्रियाओंमें प्रयुक्त होती हैं; और अन्योन्यासक्त यानी एक-दूसरीसे सम्बद्ध हैं [ तथा ] वे 'अनविप्रयुक्ता' हैं—जो विशेषरूपसे एक विषयमें ही प्रयुक्त हों वे 'विप्रयुक्ता' कहलाती हैं, तथा जो विप्रयुक्ता न हों उन्हें 'अविप्रयुक्ता' कहते हैं और जो अविप्रयुक्ता नहीं हैं वे ही 'अनविप्रयुक्ता' कहलाती हैं। |
| किं तर्हि, विशेषेणैकस्मिन्ध्यानकाले तिसृषु क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थानपुरुषाभिध्यानलक्षणासु योगक्रियासु सम्यक्प्रयुक्तासु सम्यग्ध्यानकाले योजितासु न कम्पते न चलति ज्ञो योगी यथोक्तविभागज्ञ ओङ्कारस्य इत्यर्थः न तस्यैवंविदश्चलनमुपपद्यते । यस्माज्जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तपुरुषाः सह स्थानैर्मात्रात्रयरूपेण | तो इससे क्या सिद्ध हुआ? इस प्रकार विशेषरूपसे एक ही बाह्य, आभ्यन्तर और मध्यम तीन क्रियाओंमें यानी ध्यानकालमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके अभिमानी [विश्व, तैजस और प्राज्ञ अथवा समष्टिरूपसे विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—इन तीनों ] पुरुषोंके अभिध्यानरूप योगक्रियाओंके सम्यक् प्रयोग किये जानेपर—सम्यग् ध्यानकालमें प्रोजित होनेपर ज्ञानी—योगी अर्थात् ओंकारकी मात्राओंके पूर्वोक्त विभागको जाननेवाला साधक विचलित नहीं होता। इस प्रकार जाननेवाले उस योगीका विचलित होना सिद्ध नहीं होता; क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके अभिमानी पुरुष अपने स्थानोंके सहित मात्रात्रयरूप ओंकार- |
प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
| ओङ्कारात्मरूपेण दृष्टाः । स ह्येवं विद्वान्सर्वात्मभूत ओङ्कारमयः कुतो वा चलेत्कस्मिन्वा ॥ ६ ॥ | स्वरूपसे देखे जा चुके हैं । इस प्रकार सर्वात्मभूत और ओंकारस्वरूपताको प्राप्त हुआ वह विद्वान् कहाँसे और किसके प्रति विचलित होगा ? ॥ ६ ॥ |
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ऋगादि वेद और ओङ्कारसे प्राप्त होनेवाले लोक
| सर्वार्थसंग्रहार्थो द्वितीयो मन्त्रः— | दूसरा मन्त्र उपर्युक्त सम्पूर्ण अर्थका संग्रह करनेके लिये है— |
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ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं
सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते ।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥७॥
साधक ऋग्वेदद्वारा इस लोकको, यजुर्वेदद्वारा अन्तरिक्षको और सामवेदद्वारा उस लोकको प्राप्त होता है जिसे विज्ञजन जानते हैं । तथा उस ओंकाररूप आलम्बनके द्वारा ही विद्वान् उस लोकको प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है ॥ ७ ॥
| ऋग्भिरेतं लोकं मनुष्योपलक्षितम् । यजुर्भिरन्तरिक्षं सोमाधिष्ठितम् । सामभिर्यत्तद्ब्रह्मलोकमिति तृतीयं कवयो मेधाविनो विद्यावन्त एव नाविद्वांसो वेदयन्ते । | ऋग्वेदद्वारा इस मनुष्योपलक्षित लोकको, यजुर्वेदद्वारा सोमाधिष्ठित अन्तरिक्षको और सामवेदद्वारा उस तृतीय ब्रह्मलोकको, जिसे कि कवि, मेधावी अर्थात् विद्वान्लोग ही जानते हैं—अविद्वान् नहीं; |
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| ८४ | 'प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ५' |
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| तं त्रिविधं लोकमोङ्कारेण साधनेनापरब्रह्मलक्षणमन्वेत्यनुगच्छति विद्वान् ।<br><br>तेनैवोङ्कारेण यत्तत्परं ब्रह्माक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं शान्तं विमुक्तं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिविशेषसर्वप्रपञ्चविवर्जितमत एव अजरं जरावर्जितममृतं मृत्युवर्जितमत एव यस्माज्जरादिक्रियारहितमतोऽभयम् , यस्मादेव अभयं तस्मात्परं निरतिशयम्; तदप्योङ्कारेणायतनेन गमनसाधनेनान्वेतीत्यर्थः । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ७ ॥ | इस क्रमसे ओंकाररूप साधनके द्वारा ही विद्वान् अपरब्रह्मस्वरूप इस त्रिविध लोकको प्राप्त हो जाता है अर्थात् इन तीनोंका अनुगमन करता है ।<br><br>उस ओंकारसे ही वह उस अक्षर सत्य और पुरुषसंज्ञक परब्रह्मको प्राप्त होता है जो शान्त अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि विशेषभावसे मुक्त तथा सब प्रकारके प्रपञ्चसे रहित है, इसीलिये जो अजर—जराशून्य अतः अमृत—मृत्युरहित है । क्योंकि वह जरा आदि विकारोंसे रहित है इसलिये अभयरूप है । और अभय होनेके कारण ही पर–निरतिशय है । तात्पर्य यह कि उसे भी वह ओंकाररूप आलम्बन यानी गमनसाधनके द्वारा ही प्राप्त होता है । मन्त्रके अन्तमें 'इति' शब्द वाक्यकी परिसमाप्तिके लिये है ॥७॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
पञ्चमः प्रश्नः ॥ ५ ॥
षष्ठ प्रश्न (षोडशकल पुरुष, सृष्टि व आचार्यवन्दना)
षष्ठ प्रश्न
सुकेशाका प्रश्न—सोलह कलाओंवाला पुरुष कौन है ?
अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन्हिर- ण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्ना- र्हाम्यनृतं वक्तुं स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥
तदनन्तर उन पिप्पलादाचार्यसे भरद्वाजके पुत्र सुकेशाने पूछा— "भगवन् ! कोसलदेशके राजकुमार हिरण्यनाभने मेरे पास आकर यह प्रश्न पूछा था—'भारद्वाज ! क्या तू सोलह कलाओंवाले पुरुषको जानता है ?' तब मैंने उस कुमारसे कहा—'मैं इसे नहीं जानता; यदि मैं इसे जानता होता तो तुझे क्यों न बतलाता ? जो पुरुष मिथ्याभाषण करता है वह सब ओरसे मूलसहित सूख जाता है; अतः मैं मिथ्याभाषण नहीं कर सकता।' तब वह चुपचाप रथपर चढ़कर चला गया । सो अब मैं आपसे उसके विषयमें पूछता हूँ कि वह पुरुष कहाँ है ?" ॥ १ ॥
| अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । समस्तं जगत्कार्यकरणलक्षणं सह विज्ञानात्मना परस्मिन्नक्षरे सुषुप्तिकाले संप्र- | तदनन्तर उन पिप्पलादाचार्यसे भरद्वाजके पुत्र सुकेशाने पूछा । पहले यह कहा जा चुका है कि सुषुप्तिकालमें विज्ञानात्माके सहित सम्पूर्ण कार्यकारणरूप जगत् अक्षर (अविनाशी) परम पुरुषमें लीन |
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८६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६
| तिष्ठत इत्युक्तम्। सामर्थ्यात्प्रलयेऽपि तस्मिन्नेवाक्षरे सम्प्रतिष्ठते जगत्तत एवोत्पद्यत इति सिद्धं भवति। न ह्यकारणे कार्यस्य सम्प्रतिष्ठानमुपपद्यते। | हो जाता है। इसी नियमके अनुसार यह भी सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें भी यह जगत् उस अक्षरमें ही स्थित होता है और फिर उसीसे उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि जो कारण नहीं है उसमें कार्यका लीन होना सम्भव नहीं है। |
| उक्तं च 'आत्मन एष प्राणो जायते' इति। जगतश्च यन्मूलं तत्परिज्ञानात्परं श्रेय इति सर्वोपनिषदां निश्चितोऽर्थः। अनन्तरं चोक्तं 'स सर्वज्ञः सर्वो भवति' इति। वक्तव्यं च क्व तर्हि तदक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं विज्ञेयमिति। तदर्थोऽयं प्रश्न आरभ्यते। वृत्तान्ताख्यानं च विज्ञानस्य दुर्लभत्वख्यापनेन तल्लब्ध्यर्थं मुमुक्षूणां यत्नविशेषोपादानार्थम्। | इसके सिवा [ प्रश्न ३।३ में ] यह कहा भी है कि 'यह प्राण आत्मासे उत्पन्न होता है' तथा सम्पूर्ण उपनिषदोंका यह निश्चित अभिप्राय है कि 'जो जगत्का आदि कारण है उसके ज्ञानसे ही आत्यन्तिक कल्याण हो सकता है।' अभी [ प्रश्न ४।१० में ] यह कहा जा चुका है कि 'वह सर्वज्ञ और सर्वात्मक हो जाता है।' अतः अब यह बतलाना चाहिये कि 'उस पुरुषसंज्ञक सत्य और अक्षरको कहाँ जानना चाहिये?' इसीके लिये यह [ छठा ] प्रश्न आरम्भ किया जाता है। आख्यायिकाका उल्लेख इसलिये किया गया है कि जिससे विज्ञानकी दुर्लभता प्रदर्शित होनेसे मुमुक्षुलोग उसकी प्राप्तिके लिये विशेष प्रयत्न करें। |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| हे भगवन् हिरण्यनाभो नामतः कोसलायां भवः कौसल्यो राजपुत्रो जातितः क्षत्रियो माम् उपेत्योपगम्यैतद्वक्ष्यमाणं प्रश्नम् अपृच्छत । षोडशकलं षोडशसंख्याकाः कला अवयवा इव आत्मन्यविद्याध्यारोपितरूपा यस्मिन् पुरुषे सोऽयं षोडशकलस्तं षोडशकलं हे भारद्वाज पुरुषं वेत्थ विजानासि । तमहं राजपुत्रं कुमारं पृष्टवन्तमब्रवमुक्तवानस्मि नाहमिमं वेद यं त्वं पृच्छसीति ।<br><br>एवमुक्तवत्यपि मय्यज्ञानम् असंभावयन्तं तमज्ञाने कारणम् अवादिषम् । यदि कथञ्चिदहमिमं त्वया पृष्टं पुरुषमवेदिषं विदितवानस्मि कथमत्यन्तशिष्यगुणवतेऽर्थिने ते तुभ्यं नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि न ब्रूयामित्यर्थः । भूयोऽप्यप्रत्ययमिवालक्ष्य प्रत्याययितुमब्रवम् । समूलः सह मूलेन वा . . एषोऽन्यथा | [ अत्र सुकेशाका प्रश्न आरम्भ होता है—] 'हे भगवन् ! कोसलपुरीमें उत्पन्न हुए हिरण्यनाभ नामक एक राजपुत्रने—जो जातिका क्षत्रिय था मेरे समीप आकर यह आगे कहा जानेवाला प्रश्न किया—'हे भारद्वाज ! क्या तू षोडशकल पुरुषको—जिस पुरुषमें, शरीरमें अवयवोंके समान, अविद्यावश सोलह कलाएँ आरोपित की गयी हों उसे षोडशकल पुरुष कहते हैं ऐसे उस सोलह कलाओंवाले पुरुषको क्या तू जानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उस राजकुमारसे मैंने कहा—'तुम जिसके विषयमें पूछते हो मैं उसे नहीं जानता ।'<br><br>ऐसा कहनेपर भी मुझमें अज्ञानकी सम्भावना न करनेवाले उस राजकुमारको मैंने अपने अज्ञानका कारण बतलाया—'यदि कहीं तेरे पूछे हुए इस पुरुषको मैं जानता तो तुझ अत्यन्त शिष्यगुणसम्पन्न प्रार्थीसे क्यों न कहता ? अर्थात् तुझे क्यों न बतलाता ?' फिर भी उसे अविश्वस्त-सा देख उसको विश्वास दिलानेके लिये मैंने कहा—'जो पुरुष अपने आत्माको अन्यथा करता हुआ अनृत—अयथार्थ |
| ६८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| सन्तमात्मानमन्यथा कुर्वन्ननृतम् अयथाभूतार्थमभिवदति यः स परिशुष्यति शोषमुपैतीहलोकपरलोकाभ्यां विच्छिद्यते विनश्यति । यत एवं जाने तस्मान्नार्हाम्यहम् अनृतं वक्तुं मूढवत् ।<br><br>स राजपुत्र एवं प्रत्यायितः तूष्णीं व्रीडितो रथमारुह्य प्रवव्राज प्रगतवान्यथागतमेव । अतो न्यायत उपसन्नाय योग्याय जानता विद्या वक्तव्यैवानृतं च न वक्तव्यं सर्वास्वप्यवस्थासु इत्येतत्सिद्धं भवति । तं पुरुषं त्वा त्वां पृच्छामि मम हृदि विज्ञेयत्वेन शल्यमिव मे हृदि स्थितं क्वासौ वर्तते विज्ञेयः पुरुष इति ॥ १ ॥ | भाषण करता है वह समूल अर्थात् मूलके सहित सूख जाता है अर्थात् इस लोक और परलोक दोनोंसे ही विलग होकर नष्ट हो जाता है । मैं इस बातको जानता हूँ, इसलिये अज्ञानी पुरुषके समान मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ।<br><br>इस प्रकार विश्वास दिलाये जानेपर वह राजकुमार चुपचाप—संकुचित हो रथपर चढ़कर जहाँसे आया था वहीं चला गया । इससे यह सिद्ध होता है कि अपने समीप नियमपूर्वक आये हुए योग्य जिज्ञासुके प्रति विज्ञ पुरुषको विद्याका उपदेश करना ही चाहिये तथा सभी अवस्थाओंमें मिथ्या भाषण कभी न करना चाहिये । [सुकेशा कहता है—'हे भगवन् !] मेरे हृदयमें ज्ञातव्यरूपसे काँटेके समान खटकते हुए उस पुरुषके विषयमें मैं आपसे पूछता हूँ कि वह ज्ञातव्य पुरुष कहाँ रहता है ? ॥ १ ॥ |
पिप्पलादका उत्तर—वह पुरुष शरीरमें स्थित है ।
तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥
[प्रश्न ६] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
: उससे आचार्य पिप्पलादने कहा—'हे सोम्य ! जिसमें इन सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है वह पुरुष इस शरीरके भीतर ही वर्तमान है ॥ २ ॥
| तस्मै स होवाच । इहैवान्तः-शरीरे हृदयपुण्डरीकाकाशमध्ये हे सोम्य स पुरुषो न देशान्तरे विज्ञेयो यस्मिन्नेता उच्यमानाः षोडश कलाः प्राणाद्याः प्रभवन्ति उत्पद्यन्त इति षोडशकलाभिः उपाधिभूताभिः सकल इव निष्कलः पुरुषो लक्ष्यतेऽविद्ययेति तदुपाधिकलाध्यारोपापनयेन विद्यया स पुरुषः केवलो दर्शयितव्य इति कलानां तत्प्रभवत्वम् उच्यते। प्राणादीनामत्यन्तनिर्विशेषे ऽद्वये शुद्धे तत्त्वे न शक्योऽध्यारोपमन्तरेण प्रतिपाद्यप्रतिपादनादिव्यवहारः कर्तुमिति कलानां प्रभवस्थित्यप्यया आरोप्यन्ते अविद्याविषयाः । चैतन्या- | उससे उस (पिप्पलादाचार्य) ने कहा—हे सोम्य ! उस पुरुषको यहीं—इस शरीरके भीतर हृदयपुण्डरीकाकाशमें ही जानना चाहिये—किसी अन्य देश (स्थान) में नहीं, जिस (पुरुष) में कि इन आगे कही जानेवाली प्राण आदि सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् जिससे ये उत्पन्न होती हैं। इन उपाधिभूत सोलह-कलाओंके कारण वह पुरुष कलाहीन होकर भी अविद्यावश कलावान्-सा दिखलायी देता है। उन औपाधिक कलाओंके अध्यारोपकी विद्यासे निवृत्ति करके उस पुरुषको शुद्ध दिखलाना है इसलिये प्राणादि कलाओंको उसीसे उत्पन्न होनेवाली कहा है, क्योंकि अत्यन्त निर्विशेष, अद्वय और विशुद्ध तत्त्वमें अध्यारोपके बिना प्रतिपाद्य-प्रतिपादन आदि कोई व्यवहार नहीं किया जा सकता । इसलिये उसमें कलाओंके अविद्याविषयक उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका आरोप किया जाता है, क्योंकि ये कलाएँ चैतन्यसे |
| ९० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| व्यतिरेकेणैव हि कला जायमानाः तिष्ठन्त्यः प्रलीयमानाश्च सर्वदा लक्ष्यन्ते । | अभिन्न रहकर ही सर्वदा उत्पन्न स्थित तथा लीन होती देखी जाती हैं। |
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| अत एव भ्रान्ताः केचिद् <br> <sub>आत्मचैतन्ये विकल्पाः</sub> अग्निसंयोगाद्धृतमिव घटाद्याकारेण चैतन्यम् एव प्रतिक्षणं जायते नश्यतीति तन्निरोधे शून्यमिव सर्वमित्यपरे । घटादिविषयं चैतन्यं चेतयितुर्नित्यस्यात्मनोऽनित्यं जायते विनश्यतीत्यपरे । चैतन्यं भूतधर्म इति लौकायतिकः । अनपायोपजनधर्मकचैतन्यमात्मा एव नाम रूपाद्युपाधिधर्मैः प्रत्यवभासते “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” (बृ० उ० २।४।१२) इत्यादि श्रुतिभ्यः । स्वरूपव्यभिचारिषु | इसीसे कुछ भ्रान्त पुरुषोंका मत है कि 'अग्निके संयोगसे घृतके समान चैतन्य ही प्रत्येक क्षणमें घट आदि आकारोंमें उत्पन्न और नष्ट हो रहा है।' इनसे भिन्न दूसरों (शून्यवादियों) का मत है कि 'इनका निरोध हो जानेपर सब कुछ शून्यमय हो जाता है।' तथा अन्य (नैयायिक) कहते हैं कि 'चेतयिता नित्य आत्माकी घटादिको विषय करनेवाली अनित्य चेतनता उत्पन्न और नष्ट होती रहती है' तथा लौकायतिकों (देहात्मवादियों) का कथन है कि 'चेतनता भूतोंका धर्म है'। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'प्रज्ञानं ब्रह्म' 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' 'विज्ञानघन एव' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति-नाशरूप धर्मसे रहित चेतन ही आत्मा है; वही नाम-रूप आदि औपाधिक धर्मोंसे युक्त भास रहा है। अपने स्वरूपसे व्यभिचारी (बदलनेवाले) |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
| [ज्ञेयवस्तुनि ज्ञानस्य अव्यभिचारो भवति] | |
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| पदार्थेषु चैतन्यस्याव्यभिचाराद्यथा यथा यो यः पदार्थो विज्ञायते तथा तथा ज्ञायमानत्वादेव तस्य तस्य चैतनस्याव्यभिचारित्वम् ।<br><br>वस्तुतत्त्वं भवति किञ्चित्; न ज्ञायत इति चानुपपन्नम् । रूपं च दृश्यते न चास्ति चक्षुरिति यथा । व्यभिचरति तु ज्ञेयम्; न ज्ञानं व्यभिचरति कदाचिदपि ज्ञेयम् , ज्ञेयाभावेऽपि ज्ञेयान्तरे भावाज्ज्ञानस्य । न हि ज्ञानेऽसति ज्ञेयं नाम भवति कस्यचित् ; सुषुप्तेऽदर्शनात् ।<br><br>ज्ञानस्यापि सुषुप्तेऽभावाज्ज्ञेयवज्ज्ञानस्वरूपस्य व्यभिचार इति चेत् । | पदार्थोंमें चैतन्यका व्यभिचार (परिवर्तन) न होनेके कारण जो पदार्थ जिस-जिसप्रकार जाना जाता है उसके उस-उसप्रकार जाने जानेके कारण ही उस-उस पदार्थके चैतन्यका अन्यभिचार सिद्ध होता है।\ *<br><br>‘कोई वस्तुतत्त्व है तो सही किन्तु जाना नहीं जाता’ ऐसा कहना तो ‘रूप तो दिखलायी देता है परन्तु नेत्र नहीं है’ इस कथनके समान अयुक्त ही है। ज्ञेयका तो ज्ञानमें व्यभिचार होता है किन्तु ज्ञानका ज्ञेयमें कभी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि एक ज्ञेयका अभाव होनेपर भी ज्ञेयान्तरमें ज्ञानका सद्भाव रहता ही है; ज्ञानके अभावमें तो ज्ञेय किसीके लिये रहता ही नहीं, जैसा कि सुषुप्तिमें उनका अभाव देखा जाता है।<br><br>मध्यस्थ— सुषुप्तिमें तो ज्ञानका भी अभाव है; अतः उस समय ज्ञेयके समान ज्ञानके स्वरूपका भी व्यभिचार होता है? |
* जो पदार्थ जिस प्रकार जाना जाता है उसके ज्ञानके प्रकारभेदका कारण तो उपाधि है परन्तु उसमें ज्ञानत्व उस अव्यभिचारी चैतन्यका ही है जो सारी उपाधियोंकी ओटमें उनके अधिष्ठानरूपसे सर्वत्र अनुस्यूत है। इसीलिये यह कहा गया है कि जो पदार्थ जिस प्रकार भासता है उसके उसी प्रकार भासित होनेसे ही उस पदार्थके चैतन्यका अव्यभिचार सिद्ध होता है, क्योंकि यदि उसमें चैतन्यका व्यभिचार होता तो उसका ज्ञान ही नहीं हो सकता था।
| ९२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| ज्ञेयावभासकस्य ज्ञानस्या-<br>(सुषुप्तौ ज्ञानसद्भाव-स्थापनम्) लोकवज्ज्ञेयाभिव्यञ्जक-त्वात्स्वव्यङ्ग्याभाव-आलोकाभावानुपपत्ति-वत्सुषुप्ते विज्ञानाभावानुपपत्तेः । न ह्यन्धकारे चक्षुषा रूपानुपलब्धौ चक्षुषोऽभावः शक्यः कल्पयितुं वैनाशिकेन । | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं ! ज्ञेयका अवभासक ज्ञान प्रकाशके समान ज्ञेयकी अभिव्यक्तिका कारण है; अतः प्रकाश्य वस्तुओंके अभावमें जिस प्रकार प्रकाशका अभाव नहीं माना जाता उसी प्रकार सुषुप्तिमें वस्तुओंकी प्रतीति न होनेसे विज्ञानका अभाव मानना ठीक नहीं । अन्धकारमें रूपकी उपलब्धि न होनेपर वैनाशिक (क्षणिक विज्ञानवादी) भी नेत्रके अभावकी कल्पना नहीं कर सकता । |
| वैनाशिको ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावं कल्पयत्येवेति चेत् । | **मध्यस्थ—**परन्तु वैनाशिक तो ज्ञेयके अभावमें ज्ञानके अभावकी कल्पना करता ही है । |
| (वैनाशिकमत-समीक्षा) येन तदभावं कल्पयेत्तस्याभावः केन कल्प्यत इति वक्तव्यं वैनाशिकेन, तदभावस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञानाभावे तदनुपपत्तेः । | **सिद्धान्ती—**उस वैनाशिकको यह बतलाना चाहिये कि जिस (ज्ञान) से ज्ञेयके अभावकी कल्पना की जाती है उसका अभाव किससे कल्पना किया जाता है ? क्योंकि उस (ज्ञान) का अभाव भी ज्ञेयरूप होनेके कारण बिना ज्ञानके सिद्ध नहीं हो सकता । |
| ज्ञानस्य ज्ञेयाव्यतिरिक्तत्वाज्ज्ञेयाभावे ज्ञानाभाव इति चेत् । | **मध्यस्थ—**ज्ञान ज्ञेयसे अभिन्न है, इसलिये ज्ञेयके अभावमें ज्ञानका भी अभाव हो जाता है—ऐसा मानें तो ? |
| न; अभावस्यापि ज्ञेयत्वाभ्युपगमादभावोऽपि ज्ञेयोऽभ्युप- | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अभाव भी ज्ञेयरूप माना |
| प्रश्न ६ ]' | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गम्यते वैनाशिकैर्नित्यश्च तद्व्यतिरिक्तं चेज्ज्ञानं नित्यं कल्पितं स्यात्तदभावस्य च ज्ञानात्मकत्वादभावत्वं वाङ्मात्रमेव न परमार्थतोऽभावत्वमनित्यत्वं च ज्ञानस्य । न च नित्यस्य ज्ञानस्याभावनाममात्राध्यारोपे किञ्चिन्नश्छिद्रम् । | गया है । वैनाशिकोंने अभावको भी ज्ञेय और नित्य स्वीकार किया है। यदि ज्ञान उससे ( ज्ञेयसे ) अभिन्न है तो वह [ उनके मतमें भी ] नित्य मान लिया जाता है। तथा उसका अभाव भी ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसका अभावत्व नाममात्रको ही रहता है, वास्तवमें ज्ञानका अभावत्व एवं अनित्यत्व सिद्ध नहीं होता । नित्यज्ञानका केवल 'अभाव' नाम रख देनेसे ही हमारा कुछ बिगड़ नहीं जाता । |
| अथाभावो ज्ञेयोऽपि सन् ज्ञानव्यतिरिक्त इति चेत् । | **मध्यस्थ—**किन्तु यदि अभाव ज्ञेय होनेपर भी ज्ञानसे भिन्न माना जाय तो ? |
| न तर्हि ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावः । | **सिद्धान्ती—**तब तो ज्ञेयका अभाव होनेपर ज्ञानका अभाव हो ही नहीं सकता । |
| ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं न तु ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तमिति चेत् । | **मध्यस्थ—**परन्तु ज्ञेय ही ज्ञानसे भिन्न माना जाय, ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न न माना जाय तो ? |
| न; शब्दमात्रत्वाद्विशेषानुपपत्तेः । ज्ञेयज्ञानयोरेकत्वं चेदभ्युपगम्यते ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तं नेति तु शब्दमात्रमेतद्वह्निरग्निव्यतिरिक्तः | **सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि यह कथन केवल शब्दमात्र होनेसे इसमें कोई विशेषता नहीं है । यदि तुम ज्ञान और ज्ञेयकी अभिन्नता मानते हो तो 'ज्ञेय ज्ञानसे भिन्न है किन्तु ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न नहीं है' यह कथन इसी प्रकार केवल शब्दमात्र है जैसे यह मानना |
९४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६
| अग्निर्न वह्निव्यतिरिक्त इति यद्वदभ्युपगम्यते । ज्ञेयव्यतिरेके तु ज्ञानस्य ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावा-नुपपत्तिः सिद्धा । | कि 'वह्नि अग्निसे भिन्न हैं, परन्तु अग्नि वह्निसे भिन्न नहीं है । अतः यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान ज्ञेयसे व्यतिरिक्त होनेके कारण ज्ञेयका अभाव होनेपर ज्ञानका अभाव नहीं माना जा सकता । |
| ज्ञेयाभावेऽदर्शनादभावो ज्ञानस्येति चेत् ? | मध्यस्थ—परन्तु ज्ञेयका अभाव हो जानेपर तो प्रतीत न होनेके कारण ज्ञानका भी अभाव हो जाता है ? |
| न सुषुप्ते ज्ञप्त्यभ्युपगमात् । वैनाशिकैरभ्युपगम्यते हि सुषुप्ते-ऽपि ज्ञानास्तित्वम् । | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिमें ज्ञप्तिका अस्तित्व माना गया है—वैनाशिकोंने सुषुप्तिमें भी विज्ञानका अस्तित्व स्वीकार किया ही है । |
| तत्रापि ज्ञेयत्वमभ्युपगम्यते ज्ञानस्य स्वेनैवेति चेत् । | मध्यस्थ—परन्तु उस अवस्थामें भी ज्ञानका ज्ञेयत्व स्वयं अपनेसे (ज्ञानसे) ही माना जाता है ।* |
| न, भेदस्य सिद्धत्वात् । सिद्धं ह्यभावविज्ञेयविषयस्य ज्ञानस्य अभावज्ञेयव्यतिरेकाज्ज्ञेयज्ञानयोः अन्यत्वम् । न हि तत्सिद्धं मृत-मिवोज्जीवयितुं पुनरन्यथा कर्तुं शक्यते वैनाशिकशतैरपि । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन (ज्ञान और ज्ञेय) का भेद सिद्ध हो ही चुका है । अभाव-रूप विज्ञेयविषयक ज्ञान अभावरूप ज्ञेयसे भिन्न होनेके कारण ज्ञेय और ज्ञानकी भिन्नता पहले सिद्ध हो चुकी है । उस सिद्ध हुई बातको, मृतकको पुनः जीवित करनेके समान, सैकड़ों वैनाशिक भी अन्यथा नहीं कर सकते । |
* अर्थात् ज्ञान ज्ञानका ही ज्ञेय माना गया है ।
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९५ |
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| ज्ञानस्य ज्ञेयत्वमेवेति तदप्यन्येन<br><br>तदप्यन्येनेति त्वत्पक्षेऽतिप्रसङ्ग<br><br>इति चेत् । | पूर्व०—ज्ञानको किसी अन्य ज्ञेयकी अपेक्षा है—यदि ऐसा मानें तो तेरे पक्षमें ‘वह ज्ञान किसी अन्यका ज्ञेय है और वह किसी अन्यका’ ऐसा माननेसे अनवस्था-दोष होगा । |
|---|---|
| न, तद्विभागोपपत्तेः सर्वस्य ।<br><br>यदा हि सर्वं ज्ञेयं कस्यचित्तदा<br><br>तद्व्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञानमेवेति<br><br>द्वितीयो विभाग एवाभ्युपगम्यते<br><br>अवैनाशिकैर्न तृतीयस्तद्विषय<br><br>इत्यनवस्थानुपपत्तिः । | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुओंका [ ज्ञान और ज्ञेयरूपसे ] विभाग किया जा सकता है। जब कि सब वस्तुएँ किसी एकहीकी ज्ञेय हैं तो उनसे भिन्न [ उनका प्रकाशक ] ज्ञान तो ज्ञान ही रहता है। यह वैनाशिकोंसे इतर मतावलम्बियोंने दूसरा ही विभाग माना है। इस विषयमें कोई तीसरा विभाग नहीं माना गया । अतः उनके मतमें अनवस्था नहीं आ सकती । |
| ज्ञानस्य स्वेनैवाविज्ञेयत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति चेत् । | पूर्व०—यदि ज्ञानको अपनेसे ही ज्ञेय न माना जायगा तो उसके सर्वज्ञत्वकी हानि होगी । |
| सोऽपि दोषस्तस्यैवास्तु किं तन्निबर्हणेनास्माकम् । अनवस्थादोषश्च ज्ञानस्य ज्ञेयत्वाभ्युपगमात् । अवश्यं च वैनाशिकानां ज्ञानं ज्ञेयं स्वात्मना चाविज्ञेयत्वेनानवस्थानिवार्या । | सिद्धान्ती—यह दोष भी उस (वैनाशिक) का ही हो सकता है; हमें उसे रोकनेकी क्या आवश्यकता है ? अनवस्था-दोष भी ज्ञानका ज्ञेयत्व माननेसे ही है। वैनाशिकोंके मतमें ज्ञान ज्ञेय तो अवश्य ही है; अतः अपना ही ज्ञेय न हो सकनेके कारण उसकी अनवस्था भी अनिवार्य ही है । |
| ९६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
|---|---|
| समान एवायं दोष इति चेत् । | पूर्व०—यह दोष* तो तुम्हारे पक्षमें भी ऐसा ही है।* |
| न ज्ञानस्यैकत्वोपपत्तेः ।<br><br>(ज्ञानावभासस्य औपाधिकम् अनेकत्वम्) सर्वदेशकालपुरुषाद्यवस्थमेकमेव ज्ञानं नामरूपाद्यनेकोपाधिभेदात् सवित्रादिजलादिप्रतिबिम्बवद् अनेकधावभासत इति । नासौ दोषः । तथा चेहेदमुच्यते । | सिद्धान्ती—नहीं, ज्ञानका एकत्व सिद्ध हो जानेके कारण [हमारे मतमें ऐसा कोई दोष नहीं आ सकता; हम तो मानते हैं कि] सम्पूर्ण देश, काल और पुरुष आदि अवस्थाओंमें, जलादिमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान एक ही ज्ञान अनेक प्रकारसे भासित हो रहा है। अतः [हमारे मतमें] यह दोष नहीं है। इसीसे यहाँ यह [कलाओंके प्रादुर्भावकी] बात कही गयी है। |
| ननु श्रुतेरिहैवान्तःशरीरे परिच्छिन्नः कुण्डबदरवत्पुरुष इति । | पूर्व०—परन्तु इस श्रुतिके अनुसार तो पुरुष, कूँडेमें बेरके समान इस शरीरमें ही परिच्छिन्न है। |
| न, प्राणादिकलाकारणत्वात् । न हि शरीरमात्रपरिच्छिन्नस्य प्राणश्रद्धादीनां कलानां कारणत्वं प्रतिपत्तुं शक्नुयात् । कलाकार्यत्वाच्च शरीरस्य । न हि पुरुषकार्याणां कलानां कार्यं<br><br>(आत्मनः अपरिच्छिन्नत्व-निरूपणम्) | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि पुरुष प्राणादि कलाओंका कारण है; और जो शरीरमात्रसे परिच्छिन्न होगा उसे प्राण एवं श्रद्धादिकलाओंके कारण-रूपसे कोई नहीं जान सकता, क्योंकि शरीर तो उन कलाओंका ही कार्य है। पुरुषकी कार्यरूप कलाओंका कार्य होकर शरीर |
* क्योंकि ज्ञानको किसीका ज्ञेय न माननेसे उसका व्यवहार ही सिद्ध नहीं हो सकता।
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| सच्छरीरं कारणकारणं स्वस्य पुरुषं कुण्डवदरमिवाभ्यन्तरीकुर्यात् । | अपने कारणके कारण पुरुषको, कूँडेमें बेरके समान, अपने भीतर नहीं कर सकता । |
| बीजवृक्षादिवत्स्यादिति चेत्।<br>यथा बीजकार्यं वृक्षस्तत्कार्यं च फलं स्वकारणकारणं बीजम् अभ्यन्तरीकरोत्याम्रादि तद्वत् पुरुषमभ्यन्तरीकुर्याच्छरीरं स्वकारणकारणमपीति चेत् । | पूर्व ०—यदि बीज और वृक्षादिके समान ऐसा हो सकता हो तो ?<br>जिस प्रकार बीजका कार्य वृक्ष है और उसका कार्य आम्रादि फल अपने कारणके कारण बीजको अपने भीतर कर लेता है उसी प्रकार अपने कारणका कारण होनेपर भी शरीर पुरुषको अपने भीतर कर लेगा—ऐसा मानें तो ? |
| न; अन्यत्वात्सावयवत्वाच्च ।<br>दृष्टान्ते कारणबीजाद्वृक्षफलसंवृत्तान्यन्यान्येव बीजानि दार्ष्टान्तिके तु स्वकारणकारणभूतः स एव पुरुषः शरीरेऽभ्यन्तरीकृतः श्रूयते। बीजवृक्षादीनां सावयवत्वाच्च स्यादाधाराधेयत्वं निरवयवश्च पुरुषः सावयवाश्च कलाः शरीरं च । एतेनाकाशस्यापि शरीराधारत्वमनुपपन्नं | सिद्धान्ती—[ पूर्वबीजसे ] अन्य और सावयव होनेके कारण यह दृष्टान्त ठीक नही है । दृष्टान्तमें कारणरूप बीजसे वृक्षके फलसे ढँके हुए बीज भिन्न ही हैं, किन्तु दार्ष्टान्तमें तो अपने कारणका कारणरूप वही पुरुष शरीरके भीतर हुआ सुना जाता है। इसके सिवा सावयव होनेके कारण भी बीज और वृक्षादिमें परस्पर आधार-आधेयभाव हो सकता है । किन्तु इधर पुरुष तो निरवयव है तथा कलाएँ और शरीर सावयव हैं । इससे तो शरीर आकाशका भी आधार नहीं बन सकता, फिर |
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| ९८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| किमुताकाशकारणस्य पुरुषस्य तस्मादसमानो दृष्टान्तः। | आकाशके भी कारणस्वरूप पुरुषकी तो बात ही क्या है। इसलिये यह दृष्टान्त विषम है। |
| किं दृष्टान्तेन वचनात्स्यादिति चेत्। | **मध्यस्थ—**दृष्टान्तसे क्या है ? श्रुतिके वचनसे तो ऐसा ही होना चाहिये। |
| न; वचनस्याकारकत्वात्। न हि वचनं वस्तुनोऽन्यथाकरणे व्याप्रियते। किं तर्हि? यथाभूतार्थावद्योतने। तस्मादन्तःशरीर इत्येतद्वचनमण्डस्यान्तर्व्योमेतिवच्च द्रष्टव्यम्। | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वचन कुछ करनेवाला नहीं है। किसी वस्तुको कुछ-का-कुछ कर देनेके लिये वचन प्रवृत्त नहीं हुआ करता। तो फिर वह क्या करता है? वह तो ज्यों-की-त्यों वस्तु दिखलानेमें ही प्रवृत्त होता है। अतः 'अन्तःशरीरे' इस वचनको 'अण्डेके भीतर आकाश' इस कथनके समान ही समझना चाहिये। |
| उपलब्धिनिमित्तत्वाच्च, दर्शनश्रवणमननविज्ञानादिलिङ्गैः अन्तःशरीरे परिच्छिन्न इव ह्युपलभ्यते पुरुष उपलभ्यते चात उच्यतेऽन्तःशरीरे सोम्य स पुरुष इति। न पुनराकाशकारणः सन्कुण्डबदरवच्छरीरपरिच्छिन्न | इसके सिवा उपलब्धिका कारण होनेसे भी [ ऐसा कहा गया है ]। दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान (जानना) आदि लिङ्गोंसे पुरुष शरीरके भीतर परिच्छिन्न-सा दिखलायी देता है, तथा इस (शरीर) में ही उसकी उपलब्धि भी होती है। इसीलिये यह कहा गया है कि 'हे सोम्य! वह पुरुष इस शरीरके भीतर है।' नहीं तो, आकाशका भी कारण होकर वह कूँडेमें बेरके समान शरीरमें परिच्छिन्न है—ऐसी |