भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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९०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
व्यतिरेकेणैव हि कला जायमानाः तिष्ठन्त्यः प्रलीयमानाश्च सर्वदा लक्ष्यन्ते ।अभिन्न रहकर ही सर्वदा उत्पन्न स्थित तथा लीन होती देखी जाती हैं।
अत एव भ्रान्ताः केचिद् <br> <sub>आत्मचैतन्ये विकल्पाः</sub> अग्निसंयोगाद्धृतमिव घटाद्याकारेण चैतन्यम् एव प्रतिक्षणं जायते नश्यतीति तन्निरोधे शून्यमिव सर्वमित्यपरे । घटादिविषयं चैतन्यं चेतयितुर्नित्यस्यात्मनोऽनित्यं जायते विनश्यतीत्यपरे । चैतन्यं भूतधर्म इति लौकायतिकः । अनपायोपजनधर्मकचैतन्यमात्मा एव नाम रूपाद्युपाधिधर्मैः प्रत्यवभासते “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” (बृ० उ० २।४।१२) इत्यादि श्रुतिभ्यः । स्वरूपव्यभिचारिषुइसीसे कुछ भ्रान्त पुरुषोंका मत है कि 'अग्निके संयोगसे घृतके समान चैतन्य ही प्रत्येक क्षणमें घट आदि आकारोंमें उत्पन्न और नष्ट हो रहा है।' इनसे भिन्न दूसरों (शून्यवादियों) का मत है कि 'इनका निरोध हो जानेपर सब कुछ शून्यमय हो जाता है।' तथा अन्य (नैयायिक) कहते हैं कि 'चेतयिता नित्य आत्माकी घटादिको विषय करनेवाली अनित्य चेतनता उत्पन्न और नष्ट होती रहती है' तथा लौकायतिकों (देहात्मवादियों) का कथन है कि 'चेतनता भूतोंका धर्म है'। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'प्रज्ञानं ब्रह्म' 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' 'विज्ञानघन एव' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति-नाशरूप धर्मसे रहित चेतन ही आत्मा है; वही नाम-रूप आदि औपाधिक धर्मोंसे युक्त भास रहा है। अपने स्वरूपसे व्यभिचारी (बदलनेवाले)