प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
| [ज्ञेयवस्तुनि ज्ञानस्य अव्यभिचारो भवति] | |
|---|---|
| पदार्थेषु चैतन्यस्याव्यभिचाराद्यथा यथा यो यः पदार्थो विज्ञायते तथा तथा ज्ञायमानत्वादेव तस्य तस्य चैतनस्याव्यभिचारित्वम् ।<br><br>वस्तुतत्त्वं भवति किञ्चित्; न ज्ञायत इति चानुपपन्नम् । रूपं च दृश्यते न चास्ति चक्षुरिति यथा । व्यभिचरति तु ज्ञेयम्; न ज्ञानं व्यभिचरति कदाचिदपि ज्ञेयम् , ज्ञेयाभावेऽपि ज्ञेयान्तरे भावाज्ज्ञानस्य । न हि ज्ञानेऽसति ज्ञेयं नाम भवति कस्यचित् ; सुषुप्तेऽदर्शनात् ।<br><br>ज्ञानस्यापि सुषुप्तेऽभावाज्ज्ञेयवज्ज्ञानस्वरूपस्य व्यभिचार इति चेत् । | पदार्थोंमें चैतन्यका व्यभिचार (परिवर्तन) न होनेके कारण जो पदार्थ जिस-जिसप्रकार जाना जाता है उसके उस-उसप्रकार जाने जानेके कारण ही उस-उस पदार्थके चैतन्यका अन्यभिचार सिद्ध होता है।\ *<br><br>‘कोई वस्तुतत्त्व है तो सही किन्तु जाना नहीं जाता’ ऐसा कहना तो ‘रूप तो दिखलायी देता है परन्तु नेत्र नहीं है’ इस कथनके समान अयुक्त ही है। ज्ञेयका तो ज्ञानमें व्यभिचार होता है किन्तु ज्ञानका ज्ञेयमें कभी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि एक ज्ञेयका अभाव होनेपर भी ज्ञेयान्तरमें ज्ञानका सद्भाव रहता ही है; ज्ञानके अभावमें तो ज्ञेय किसीके लिये रहता ही नहीं, जैसा कि सुषुप्तिमें उनका अभाव देखा जाता है।<br><br>मध्यस्थ— सुषुप्तिमें तो ज्ञानका भी अभाव है; अतः उस समय ज्ञेयके समान ज्ञानके स्वरूपका भी व्यभिचार होता है? |
* जो पदार्थ जिस प्रकार जाना जाता है उसके ज्ञानके प्रकारभेदका कारण तो उपाधि है परन्तु उसमें ज्ञानत्व उस अव्यभिचारी चैतन्यका ही है जो सारी उपाधियोंकी ओटमें उनके अधिष्ठानरूपसे सर्वत्र अनुस्यूत है। इसीलिये यह कहा गया है कि जो पदार्थ जिस प्रकार भासता है उसके उसी प्रकार भासित होनेसे ही उस पदार्थके चैतन्यका अव्यभिचार सिद्ध होता है, क्योंकि यदि उसमें चैतन्यका व्यभिचार होता तो उसका ज्ञान ही नहीं हो सकता था।