भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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९२प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६

ज्ञेयावभासकस्य ज्ञानस्या-<br>(सुषुप्तौ ज्ञानसद्भाव-स्थापनम्) लोकवज्ज्ञेयाभिव्यञ्जक-त्वात्स्वव्यङ्ग्याभाव-आलोकाभावानुपपत्ति-वत्सुषुप्ते विज्ञानाभावानुपपत्तेः । न ह्यन्धकारे चक्षुषा रूपानुपलब्धौ चक्षुषोऽभावः शक्यः कल्पयितुं वैनाशिकेन ।**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं ! ज्ञेयका अवभासक ज्ञान प्रकाशके समान ज्ञेयकी अभिव्यक्तिका कारण है; अतः प्रकाश्य वस्तुओंके अभावमें जिस प्रकार प्रकाशका अभाव नहीं माना जाता उसी प्रकार सुषुप्तिमें वस्तुओंकी प्रतीति न होनेसे विज्ञानका अभाव मानना ठीक नहीं । अन्धकारमें रूपकी उपलब्धि न होनेपर वैनाशिक (क्षणिक विज्ञानवादी) भी नेत्रके अभावकी कल्पना नहीं कर सकता ।
वैनाशिको ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावं कल्पयत्येवेति चेत् ।**मध्यस्थ—**परन्तु वैनाशिक तो ज्ञेयके अभावमें ज्ञानके अभावकी कल्पना करता ही है ।
(वैनाशिकमत-समीक्षा) येन तदभावं कल्पयेत्तस्याभावः केन कल्प्यत इति वक्तव्यं वैनाशिकेन, तदभावस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञानाभावे तदनुपपत्तेः ।**सिद्धान्ती—**उस वैनाशिकको यह बतलाना चाहिये कि जिस (ज्ञान) से ज्ञेयके अभावकी कल्पना की जाती है उसका अभाव किससे कल्पना किया जाता है ? क्योंकि उस (ज्ञान) का अभाव भी ज्ञेयरूप होनेके कारण बिना ज्ञानके सिद्ध नहीं हो सकता ।
ज्ञानस्य ज्ञेयाव्यतिरिक्तत्वाज्ज्ञेयाभावे ज्ञानाभाव इति चेत् ।**मध्यस्थ—**ज्ञान ज्ञेयसे अभिन्न है, इसलिये ज्ञेयके अभावमें ज्ञानका भी अभाव हो जाता है—ऐसा मानें तो ?
न; अभावस्यापि ज्ञेयत्वाभ्युपगमादभावोऽपि ज्ञेयोऽभ्युप-**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अभाव भी ज्ञेयरूप माना