प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 131 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 103
| प्रश्न ६ ]' | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गम्यते वैनाशिकैर्नित्यश्च तद्व्यतिरिक्तं चेज्ज्ञानं नित्यं कल्पितं स्यात्तदभावस्य च ज्ञानात्मकत्वादभावत्वं वाङ्मात्रमेव न परमार्थतोऽभावत्वमनित्यत्वं च ज्ञानस्य । न च नित्यस्य ज्ञानस्याभावनाममात्राध्यारोपे किञ्चिन्नश्छिद्रम् । | गया है । वैनाशिकोंने अभावको भी ज्ञेय और नित्य स्वीकार किया है। यदि ज्ञान उससे ( ज्ञेयसे ) अभिन्न है तो वह [ उनके मतमें भी ] नित्य मान लिया जाता है। तथा उसका अभाव भी ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसका अभावत्व नाममात्रको ही रहता है, वास्तवमें ज्ञानका अभावत्व एवं अनित्यत्व सिद्ध नहीं होता । नित्यज्ञानका केवल 'अभाव' नाम रख देनेसे ही हमारा कुछ बिगड़ नहीं जाता । |
| अथाभावो ज्ञेयोऽपि सन् ज्ञानव्यतिरिक्त इति चेत् । | **मध्यस्थ—**किन्तु यदि अभाव ज्ञेय होनेपर भी ज्ञानसे भिन्न माना जाय तो ? |
| न तर्हि ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावः । | **सिद्धान्ती—**तब तो ज्ञेयका अभाव होनेपर ज्ञानका अभाव हो ही नहीं सकता । |
| ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं न तु ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तमिति चेत् । | **मध्यस्थ—**परन्तु ज्ञेय ही ज्ञानसे भिन्न माना जाय, ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न न माना जाय तो ? |
| न; शब्दमात्रत्वाद्विशेषानुपपत्तेः । ज्ञेयज्ञानयोरेकत्वं चेदभ्युपगम्यते ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तं नेति तु शब्दमात्रमेतद्वह्निरग्निव्यतिरिक्तः | **सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि यह कथन केवल शब्दमात्र होनेसे इसमें कोई विशेषता नहीं है । यदि तुम ज्ञान और ज्ञेयकी अभिन्नता मानते हो तो 'ज्ञेय ज्ञानसे भिन्न है किन्तु ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न नहीं है' यह कथन इसी प्रकार केवल शब्दमात्र है जैसे यह मानना |