प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
| गर्भात्परात्परं परमात्मारूयं पुरुषमीक्षते पुरिशयं सर्वशरीरा- नुप्रविष्टं पश्यति ध्यायमानः । तदेतस्मिन्यथोक्तार्थप्रकाशकौ मन्त्रौ भवतः ॥ ५ ॥ | हिरण्यगर्भसे भी श्रेष्ठ तथा पुरिशय- सम्पूर्ण शरीरोंमें अनुप्रविष्ट परमात्मा- संज्ञक पुरुषको देखता है। इस उपर्युक्त अर्थको ही प्रकाशित करने- वाले ये दो श्लोक यानी मन्त्र हैं ॥ ५॥ |
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ओङ्कारकी तीन मात्राओंकी विशेषता
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
ओङ्कारकी तीनों मात्राएँ [पृथक्-पृथक् रहनेपर] मृत्युसे युक्त हैं। वे [ध्यान-क्रियामें] प्रयुक्त होती हैं और परस्पर सम्बद्ध तथा अनविप्रयुक्ता (जिनका विपरीत प्रयोग न किया गया हो—ऐसी) हैं। इस प्रकार बाह्य (जाग्रत्), आभ्यन्तर (सुषुप्ति) और मध्यम (स्वप्न-स्थानीय) क्रियाओंमें उनका सम्यक् प्रयोग किया जानेपर ज्ञाता पुरुष विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥
| तिस्रस्त्रिसंख्याका अकारो-कारमकाराख्या ओङ्कारस्य मात्रा मृत्युमत्यो मृत्यु- र्यासां विद्यते ता मृत्युमंत्यो मृत्युगोचरादनतिक्रान्ता मृत्यु- गोचरा एवेत्यर्थः । ता आत्मनो <br> ६ | ओंकारकी अकार, उकार और मकार—ये तीन मात्राएँ मृत्युमती हैं। जिनकी मृत्यु विद्यमान है— जो मृत्युकी पहुँचसे परे नहीं हैं अर्थात् मृत्युकी विषयभूता ही हैं उन्हें मृत्युमती कहते हैं। ये आत्मा- |
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