प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| ८० | . प्रश्नोपनिषद् . | [ प्रश्न ५ |
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| कुलस्यार्थे" (महा० उ० ३७।१७) इति न्यायेन । स तृतीयमात्रारूपस्तेजसि सूर्ये संपन्नो भवति ध्यायमानो मृतोऽपि सूर्यात्सोमलोकादिव न पुनरावर्तते किन्तु सूर्ये संपन्नमात्र एव । | यद्यपि 'ओमित्येतेन' इस पदमें तृतीया विभक्ति होनेके कारण इसका करणत्व (साधनत्व) मानना भी ठीक है तथापि 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' (कुलके हितके लिये एक व्यक्तिका त्याग कर देना चाहिये) इस न्यायसे प्रकरणके अनुसार इसे 'त्रिमात्रं परं पुरुषम्' इस प्रकार द्वितीया विभक्तिमें ही परिणत कर लेना चाहिये । |
| यथा पादोदरः सर्पस्त्वचा विनिर्मुच्यते जीर्णत्वग्विनिर्मुक्तः स पुनर्नवो भवति । एवं ह वा एष यथा दृष्टान्तः स पाप्मना सर्पत्वक्स्थानीयेनाशुद्धिरूपेण विनिर्मुक्तः सामभिस्तृतीयमात्रारूपैरूर्ध्वमुन्नीयते ब्रह्मलोकं हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो लोकं सत्याख्यम् । स हिरण्यगर्भः सर्वेषां संसारिणां जीवानामात्मभूतः । स ह्यन्तरात्मा लिङ्गरूपेण सर्वभूतानां तस्मिन्हि लिङ्गात्मनि संहताः सर्वे जीवाः । तस्मात्स जीवघनः । स विद्वांस्त्रिमात्रोङ्काराभिज्ञ एतस्माज्जीवघनाद्धिरण्य- | जिस प्रकार पादोदर—सर्प केंचुलीसे छूट जाता है, और वह जीर्ण त्वचासे छूटकर पुनः नवीन हो जाता है, उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, वह साधक सर्पकी केंचुलीरूप अशुद्धिमय पापसे मुक्त हो तृतीय मात्रारूप सामश्रुतियोंद्वारा ऊपरकी ओर ब्रह्मलोकको यानी हिरण्यगर्भ—ब्रह्माके सत्य नामक लोकको ले जाया जाता है । वह हिरण्यगर्भ सम्पूर्ण संसारी जीवोंका आत्मस्वरूप है । वही लिङ्गदेहरूपसे समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है । उस लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भमें ही समस्त जीव संहत हैं । अतः वह जीवघन है । वह त्रिमात्र ओंकार का ज्ञाता एवं ध्यान करनेवाला विद्वान् इस उत्तम जीवघनस्वरूप |