प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| ९६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
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| समान एवायं दोष इति चेत् । | पूर्व०—यह दोष* तो तुम्हारे पक्षमें भी ऐसा ही है।* |
| न ज्ञानस्यैकत्वोपपत्तेः ।<br><br>(ज्ञानावभासस्य औपाधिकम् अनेकत्वम्) सर्वदेशकालपुरुषाद्यवस्थमेकमेव ज्ञानं नामरूपाद्यनेकोपाधिभेदात् सवित्रादिजलादिप्रतिबिम्बवद् अनेकधावभासत इति । नासौ दोषः । तथा चेहेदमुच्यते । | सिद्धान्ती—नहीं, ज्ञानका एकत्व सिद्ध हो जानेके कारण [हमारे मतमें ऐसा कोई दोष नहीं आ सकता; हम तो मानते हैं कि] सम्पूर्ण देश, काल और पुरुष आदि अवस्थाओंमें, जलादिमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान एक ही ज्ञान अनेक प्रकारसे भासित हो रहा है। अतः [हमारे मतमें] यह दोष नहीं है। इसीसे यहाँ यह [कलाओंके प्रादुर्भावकी] बात कही गयी है। |
| ननु श्रुतेरिहैवान्तःशरीरे परिच्छिन्नः कुण्डबदरवत्पुरुष इति । | पूर्व०—परन्तु इस श्रुतिके अनुसार तो पुरुष, कूँडेमें बेरके समान इस शरीरमें ही परिच्छिन्न है। |
| न, प्राणादिकलाकारणत्वात् । न हि शरीरमात्रपरिच्छिन्नस्य प्राणश्रद्धादीनां कलानां कारणत्वं प्रतिपत्तुं शक्नुयात् । कलाकार्यत्वाच्च शरीरस्य । न हि पुरुषकार्याणां कलानां कार्यं<br><br>(आत्मनः अपरिच्छिन्नत्व-निरूपणम्) | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि पुरुष प्राणादि कलाओंका कारण है; और जो शरीरमात्रसे परिच्छिन्न होगा उसे प्राण एवं श्रद्धादिकलाओंके कारण-रूपसे कोई नहीं जान सकता, क्योंकि शरीर तो उन कलाओंका ही कार्य है। पुरुषकी कार्यरूप कलाओंका कार्य होकर शरीर |
* क्योंकि ज्ञानको किसीका ज्ञेय न माननेसे उसका व्यवहार ही सिद्ध नहीं हो सकता।