भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ९५

ज्ञानस्य ज्ञेयत्वमेवेति तदप्यन्येन<br><br>तदप्यन्येनेति त्वत्पक्षेऽतिप्रसङ्ग<br><br>इति चेत् ।पूर्व०—ज्ञानको किसी अन्य ज्ञेयकी अपेक्षा है—यदि ऐसा मानें तो तेरे पक्षमें ‘वह ज्ञान किसी अन्यका ज्ञेय है और वह किसी अन्यका’ ऐसा माननेसे अनवस्था-दोष होगा ।
न, तद्विभागोपपत्तेः सर्वस्य ।<br><br>यदा हि सर्वं ज्ञेयं कस्यचित्तदा<br><br>तद्व्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञानमेवेति<br><br>द्वितीयो विभाग एवाभ्युपगम्यते<br><br>अवैनाशिकैर्न तृतीयस्तद्विषय<br><br>इत्यनवस्थानुपपत्तिः ।सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुओंका [ ज्ञान और ज्ञेयरूपसे ] विभाग किया जा सकता है। जब कि सब वस्तुएँ किसी एकहीकी ज्ञेय हैं तो उनसे भिन्न [ उनका प्रकाशक ] ज्ञान तो ज्ञान ही रहता है। यह वैनाशिकोंसे इतर मतावलम्बियोंने दूसरा ही विभाग माना है। इस विषयमें कोई तीसरा विभाग नहीं माना गया । अतः उनके मतमें अनवस्था नहीं आ सकती ।
ज्ञानस्य स्वेनैवाविज्ञेयत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति चेत् ।पूर्व०—यदि ज्ञानको अपनेसे ही ज्ञेय न माना जायगा तो उसके सर्वज्ञत्वकी हानि होगी ।
सोऽपि दोषस्तस्यैवास्तु किं तन्निबर्हणेनास्माकम् । अनवस्थादोषश्च ज्ञानस्य ज्ञेयत्वाभ्युपगमात् । अवश्यं च वैनाशिकानां ज्ञानं ज्ञेयं स्वात्मना चाविज्ञेयत्वेनानवस्थानिवार्या ।सिद्धान्ती—यह दोष भी उस (वैनाशिक) का ही हो सकता है; हमें उसे रोकनेकी क्या आवश्यकता है ? अनवस्था-दोष भी ज्ञानका ज्ञेयत्व माननेसे ही है। वैनाशिकोंके मतमें ज्ञान ज्ञेय तो अवश्य ही है; अतः अपना ही ज्ञेय न हो सकनेके कारण उसकी अनवस्था भी अनिवार्य ही है ।