भारतकोश
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प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ९९
इति मनसापीच्छति वक्तुं मूढोऽपि किमुत प्रमाणभूता श्रुतिः ॥ २ ॥बात कहनेकी तो कोई मूढ पुरुष भी अपने मनसे भी इच्छा नहीं कर सकता, फिर प्रमाणभूता श्रुतिकी तो बात ही क्या है ? ॥ २ ॥
यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीत्युक्तं पुरुषविशेषणार्थं कलानां प्रभवः स चान्यार्थोऽपि श्रुतः केन क्रमेण स्यादित्यत इदमूच्यते—चेतनपूर्विका च सृष्टिरित्येवमर्थं च ।ऊपर 'जिसमें ये सोलह कलाएँ उत्पन्न होती हैं' यह बात पुरुषकी विशेषता बतलानेके लिये कही है। इस प्रकार अन्य अर्थ [ यानी पुरुषकी विशेषता बतलाने ] के लिये श्रवण किया हुआ वह कलाओंका प्रादुर्भाव किस क्रमसे हुआ होगा यह बतलानेके लिये तथा सृष्टि चेतनपूर्विका है—इस बातको भी प्रकट करनेके लिये अब इस प्रकार कहा जाता है—

ईक्षणपूर्वक सृष्टि

स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥

उसने विचार किया कि किसके उत्क्रमण करनेपर मैं भी उत्क्रमण कर जाऊँगा और किसके स्थित रहनेपर मैं स्थित रहूँगा ? ॥ ३ ॥

स पुरुषः षोडशकलः पृष्टो यो भारद्वाजेन ईक्षांचक्रे ईक्षणं दर्शनं चक्रे कृतवानित्यर्थः सृष्टिफलक्रमादिविषयम् । कथम् ?उस सोलह कलाओंवाले पुरुषने, जिसके विषयमें भारद्वाजने प्रश्न किया था, [ प्राणादिकी ] उत्पत्ति, [ उसके उत्क्रमण आदि ] फल और [ प्राणसे श्रद्धा आदि ] क्रमके विषयमें ईक्षण-दर्शन यानी विचार किया । किस प्रकार विचार
१००प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
(संस्कृत-भाष्य)(हिन्दी-अनुवाद)
इत्युच्यते कस्मिन्कर्तृविशेषे देहादुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि अहमेवं कस्मिन्वा शरीरे प्रतिष्ठिते अहं प्रतिष्ठास्यामि प्रतिष्ठितः स्यामित्यर्थः ।<br><br>नन्वात्माकर्ता प्रधानं कर्तृ, <br>(सूत्रे सांख्यानां प्रधानकर्तृत्वम्) अतः पुरुषार्थप्रयोजनम् उररीकृत्य प्रधानं प्रवर्तते महदाद्याकारेण । तत्रेदम् अनुपपन्नं पुरुषस्य स्वातन्त्र्येण ईक्षापूर्वकं कर्तृत्ववचनम्; सत्त्वादिगुणसाम्ये प्रधाने प्रमाणोपपन्ने सृष्टिकर्तरि सतीश्वरेच्छानुवर्तिषु वा परमाणुषु सत्स्वात्मनोऽप्येकत्वेन कर्तृत्वे साधनाभावादात्मन आत्मन्यनर्थकर्तृत्वानुपपत्तेश्च । न हि चेतनावान्बुद्धिपूर्वककार्यात्मनोऽनर्थं कुर्यात् । तस्मात्पुरुषार्थेन प्रयोजनेन ईक्षापूर्वकमिव नियतक्रमेण प्रवर्त-किया ? सो बतलाते हैं—‘किस विशेष कर्ताके शरीरसे उत्क्रमण करनेपर मैं भी उत्क्रमण कर जाऊँगा तथा इसी प्रकार शरीरमें किसके स्थित रहनेपर मैं भी स्थित रहूँगा’ [—यह निश्चय करनेके लिये उसने विचार किया] ।<br><br>पूर्व०—[ सांख्यमतानुसार ] आत्मा अकर्ता है और प्रधान सब कुछ करनेवाला है । अतः पुरुषके लिये उसके [भोग और अपवर्गरूप ] प्रयोजनको सामने रख प्रधान ही महदादिरूपसे प्रवृत्त होता है । इस प्रकार सत्त्वादि गुणोंके साम्यावस्थारूप एवं सृष्टिकर्ता प्रधानके प्रमाणतः सिद्ध होते हुए तथा [ नैयायिकके मतानुसार ] ईश्वरकी इच्छाका अनुवर्तन करनेवाले परमाणुओंके रहते हुए एकमात्र होनेके कारण आत्माके कर्तृत्वमें कोई साधन न होनेसे तथा उसका अपने ही लिये अनर्थकारित्व भी सिद्ध न हो सकनेके कारण पुरुषका जो स्वतन्त्रतासे ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व बतलाया गया है वह अयुक्त है; क्योंकि बुद्धिपूर्वक कर्म करनेवाला कोई भी चेतनायुक्त व्यक्ति अपना अनर्थ नहीं करेगा । अतः पुरुषके प्रयोजनसे मानो ईक्षापूर्वक नियमित क्रमसे प्रवृत्त हुए
प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०१

मानेऽचेतने प्रधाने चेतनवदुपचारोऽयं 'स ईक्षांचक्रे' इत्यादिः। यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये राजेति तद्वत् ।अचेतन प्रधानमें चेतनकी भाँति 'उसने विचार किया' इत्यादि प्रयोग औपचारिक है; जैसे राजाका सारा कार्य करनेवाले सेवकको भी 'राजा' कहा जाता है, उसीके समान इसे समझना चाहिये ।
न; आत्मनो भोक्तृत्ववत्कर्तृत्वोपपत्तेः। (सांख्यमत-निरसनम्) यथा सांख्यस्य चिन्मात्रस्यापरिणामिनोऽप्यात्मनो भोक्तृत्वं तद्वद्वेदवादिनामीक्षादिपूर्वकं जगत्कर्तृत्वमुपपन्नं श्रुतिप्रामाण्यात् ।**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि आत्माके भोक्तृत्वके समान उसका कर्तृत्व भी बन सकता है। जिस प्रकार सांख्यमतमें चिन्मात्र और अपरिणामी आत्माका भोक्तृत्व सम्भव है उसी प्रकार श्रुति-प्रमाणसे वेदवादियोंके मतमें उसका ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व भी बन सकता है।
तत्त्वान्तरपरिणाम आत्मनोऽनित्यत्वाशुद्धत्वानेकत्वनिमित्तो न चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया । अतः पुरुषस्य स्वात्मन्येव भोक्तृत्वे चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया न दोषाय। भवतां पुनर्वेदवादिनां सृष्टिकर्तृत्वे तत्त्वान्तरपरिणाम एवेत्यात्मनोऽनित्यत्वादिसर्वदोषप्रसङ्ग इति चेत् ।**पूर्व०—**आत्माका तत्त्वान्तर परिणाम ही उसके अनित्यत्व, अशुद्धत्व और अनेकत्वका कारण है, चिन्मात्र-स्वरूपका विकार नहीं। अतः पुरुषका अपनेमें ही भोक्तृत्व रहनेके कारण उसका चिन्मात्रस्वरूप विकार किसी प्रकारके दोषका कारण नहीं है । किन्तु आप वेदवादियोंके मतानुसार सृष्टिका कर्तृत्व माननेमें तो उसका तत्त्वान्तरपरिणाम ही मानना होगा और इससे आत्माके अनित्यत्व आदि सब प्रकारके दोषोंका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा ।
१०२प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
[आत्मनः कर्तृत्वादि-व्यवहारस्य औपाधिकत्वम्]
न; एकस्याप्यात्मनोऽविद्यायां विषयनामरूपोपाध्यनुपाधिकृतविशेषाभ्युपगमादविद्याकृतनामरूपोपाधिकृतो हि विशेषोऽभ्युपगम्यत आत्मनो बन्धमोक्षादिशास्त्रकृतसंव्यवहाराय परमार्थतोऽनुपाधिकृतं च तत्त्वमेकमेवाद्वितीयमुपादेयं सर्वतार्किकबुद्ध्यनवग्राह्यमभयं शिवम् इष्यते न तत्र कर्तृत्वं भोक्तृत्वं वा क्रियाकारकफलं च स्याद् अद्वैतत्वात्सर्वभावानाम् ।**सिद्धान्ती—**यह बात नहीं है, क्योंकि हम अविद्याविषयक नाम-रूपमय उपाधि तथा उसके अभावके कारण ही एकमात्र (निरुपाधिक) आत्माकी [औपाधिक] विशेषता मानते हैं। बन्ध-मोक्षादि शास्त्रके व्यवहारके लिये ही आत्माका अविद्याकृत नाम-रूप-उपाधिमूलक विशेष माना गया है; परमार्थतः तो अनुपाधिकृत एक अद्वितीय तत्त्व ही मानना चाहिये, जो सम्पूर्ण तार्किकोंकी बुद्धिका अविषय, अभय और शिवस्वरूप है। उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व अथवा क्रिया-कारक या फल कुछ भी नहीं है, क्योंकि सभी भाव अद्वैतरूप हैं।
सांख्यास्त्वविद्याध्यारोपितम् एव पुरुषे कर्तृत्वं क्रियाकारकं फलं चेति कल्पयित्वागमवाह्यत्वात्पुनस्ततस्त्रस्यन्तः परमार्थत एव भोक्तृत्वं पुरुषस्येच्छन्ति तत्त्वान्तरं च प्रधानं पुरुषात्परमार्थवस्तुभूतमेव कल्पयन्तोऽन्यतार्किककृतबुद्धिविषयाः सन्तो विहन्यन्ते ।परन्तु सांख्यवादी तो पुरुषमें पहले अविद्यारोपित क्रिया, कारक, कर्तृत्व और फलकी कल्पना कर फिर वेदबाह्य होनेके कारण उससे घबड़ाकर पुरुषका वास्तविक भोक्तृत्व मान बैठे हैं। तथा प्रधानको पुरुषसे भिन्न तत्त्वान्तरभूत परमार्थवस्तु मान लेनेके कारण अन्य तार्किकोंकी बुद्धिके विषय होकर अपने सिद्धान्त-से गिरा दिये जाते हैं।
प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०३

तथेतरे तार्किकाः सांख्यैः । इत्येवं परस्परविरुद्धार्थकल्पनात् आमिषार्थिन इव प्राणिनोऽन्यो-न्यविरुद्धमानार्थदर्शित्वादूदूरम् एवापकृष्यन्ते। अतस्तन्मतमनादृत्य वेदान्तार्थतत्त्वमेकत्वदर्शनं प्रति आदरवन्तो मुमुक्षवः स्युरिति ता-ार्किकमतदोषप्रदर्शनं किञ्चिदुच्यते अस्माभिर्न तु तार्किकव चात्पर्य्येण। <br><br> तथैतदत्रोक्तम्— <br><br> “विवदत्स्वेव निक्षिप्य <br> विरोधोद्भवकारणम् । <br> तैः संरक्षितसद्बुद्धिः <br> सुखं निर्वाति वेदवित् ॥” <br> इति । <br><br> किं च भोक्तृत्वकर्त्तृत्वयो-र्विक्रिययोर्विशेषाानुपपत्तिः । का नामासौ कर्तृत्वाज्जात्यन्तरभूता भोक्तृत्वविशिष्टा विक्रिया यतो भोक्तैव पुरुषः कल्प्यते न कर्ताइसी प्रकार दूसरे तार्किक सांख्य-वादियोंसे परास्त हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध अर्थकी कल्पना कर मांसलोलुप प्राणियोंके समान एक-दूसरेके विरोधी अर्थको ही देखने-वाले होनेसे परमार्थतत्त्वसे दूर ही हटा दिये जाते हैं। अतः मुमुक्षुलोग उनके मतका अनादर कर वेदान्तके तात्पर्यार्थ एकत्वदर्शनके प्रति आदर-युक्त हों—इसलिये ही हम तार्किकों-के मतका किञ्चित् दोष प्रदर्शित करते हैं, तार्किकोंके समान कुछ तत्परतासे नहीं । <br><br> तथा इस विषयमें ऐसा कहा गया है— <br><br> “[ भेद सत्य है—इस ] विरोध-की उत्पत्तिके कारणको विवाद करनेवालोंके ऊपर ही छोड़कर जिसने अपनी सद्बुद्धिको उनसे सुरक्षित रक्खा है वह वेदवेत्ता सुख-पूर्वक शान्तिको प्राप्त हो जाता है।” <br><br> इसके सिवा, भोक्तृत्व और कर्तृत्व इन दोनों विकारोंमें कोई अन्तर मानना भी उचित नहीं है । कर्तृत्वसे विजातीय यह भोक्तृत्व-विशिष्ट विकार है क्या ? जिससे कि पुरुष भोक्ता ही माना जाता
१६४प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६

प्रधानं तु कर्त्रेव न भोक्त्रीति ।है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं ?
नन्ूक्तं पुरुषश्चिन्मात्र एव स च स्वात्मस्थो विक्रियते भुञ्जानो न तत्त्वान्तरपरिणामेन । प्रधानं तु तत्त्वान्तरपरिणामेन विक्रियतेऽतोऽनेकमशुद्धम् अचेतनं चेत्यादिधर्मवत्तद्विपरीतः पुरुषः । <br><br> (सांख्यानां कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वरूपविवेचनम्)पूर्व०— यह पहले ही कहा जा चुका है कि पुरुष चिन्मात्र ही है और वह भोग करते समय अपने स्वरूपमें स्थित हुआ ही विकारोंको प्राप्त होता है—उसका विकार तत्त्वान्तरपरिणामके द्वारा नहीं होता । किन्तु प्रधान तत्त्वान्तर-परिणामके द्वारा विकृत होता है; अतः वह [ महत्तत्त्वादि-भेदसे ] अनेक, अशुद्ध और अचेतन आदि धर्मोंसे युक्त है, तथा पुरुष उससे विपरीत स्वभाववाला है ।
नासौ विशेषो वाङ्मात्रत्वात् । <br><br> (अस्य परिहारः) <br><br> प्राग्भोगोत्पत्तेः केवलचिन्मात्रस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वं नाम विशेषो भोगोत्पत्तिक़ाले चेज्जायते निवृत्ते च भोगे पुनस्तद्विशेषादपेतश्चिन्मात्र एव भवतीति चेन्महदाद्याकारेण च परिणम्य प्रधानं ततोऽपेत्य पुनः प्रधानं स्वरूपेणावतिष्ठत इत्यस्यां कल्पनायां न कश्चिद्विशेष इति वाङ्मात्रेण प्रधान-सिद्धान्ती— यह कोई विशेषता नहीं है, क्योंकि यह तो केवल शब्दमात्र है । यदि भोगोत्पत्तिके पूर्व केवल चिन्मात्ररूपसे स्थित पुरुषमें भोगकी उत्पत्तिके समय ही भोक्तृत्वरूप कोई विशेषता उत्पन्न होती है और भोगके निवृत्त होनेपर उस विशेषताके दूर हो जानेपर वह फिर चिन्मात्र ही रह जाता है तो प्रधान भी महत् आदिरूपसे परिणत होकर उनसे निवृत्त होनेपर फिर प्रधानरूपसे ही स्थित हो जाता है । अतः इस कल्पनामें कोई विशेषता नहीं है; इसलिये तुम्हारेद्वारा प्रधान और पुरुषके
प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०५
पुरुषयोर्विशिष्टविक्रिया कल्प्यते ।विशिष्ट विकारकी कल्पना केवल शब्दमात्रसे ही की गयी है ।
अथ भोगकालेऽपि चिन्मात्र एव प्राग्वत्पुरुष इति चेत् ।पूर्व०—ठीक है, परन्तु पुरुष भोगकालमें भी पूर्ववत् चिन्मात्र ही है।
न तर्हि परमार्थतो भोगः पुरुषस्य ।सिद्धान्ती—तब तो परमार्थतः पुरुषका भोग ही सिद्ध नहीं होता।
भोगकाले चिन्मात्रस्य विक्रिया परमार्थैव तेन भोगः पुरुषस्येति चेत् ।पूर्व०—परन्तु भोगकालमें जो चिन्मात्र पुरुषका विकार होता है वह वास्तविक ही होता है; इससे पुरुषका भोग सिद्ध होता है।
न; प्रधानस्यापि भोगकाले विक्रियावत्त्वाद्भोक्तृत्वप्रसङ्गः । चिन्मात्रस्यैव विक्रिया भोक्तृत्वम् इति चेदौष्ण्याद्यसाधारणधर्म-वतामग्न्यादीनामभोक्तृत्वे हेत्व-नुपपत्तिः ।सिद्धान्ती—नहीं, भोगकालमें तो प्रधान भी विकारयुक्त होता है, इससे उसके भी भोक्तृत्वका प्रसंग आ जायगा। यदि कहो कि भोक्तृत्व चिन्मात्रके ही विकारका नाम है तो उष्णता आदि असाधारण धर्मवाले अग्नि आदिके अभोक्तृत्वमें भी कोई कारण नहीं दिखलायी देता [क्योंकि जिस प्रकार चेतनता पुरुषका असाधारण धर्म है उसी प्रकार उष्णता आदि उनके असाधारण धर्म हैं]।
प्रधानपुरुषयोर्द्वयोर्युगपद्भो-क्तृत्वमिति चेत् ।मध्यस्थ—यदि प्रधान और पुरुष दोनोंका साथ-साथ भोक्तृत्व माना जाय तो ?
१०६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
न; प्रधानस्य पारार्थ्यानुपपत्तेः । न हि भोक्त्रोर्द्वयोरितरेतरगुणप्रधानभाव उपपद्यते प्रकाशयोरिवेतरेतरप्रकाशने ।<br><br>भोगधर्मवति सत्त्वाङ्गिनि चेतसि पुरुषस्य चैतन्यप्रतिबिम्बोदयोऽविक्रियस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वमिति चेत् ।<br><br>न; पुरुषस्य विशेषाभावे भोक्तृत्वकल्पनानर्थक्यात् । भोगरूपश्चेदनर्थः पुरुषस्य नास्ति सदा निर्विशेषत्वात्पुरुषस्य कस्य अपनयनार्थं मोक्षसाधनं शास्त्रं प्रणीयते । अविद्याध्यारोपितानर्थापनयनाय शास्त्रप्रणयनमिति चेत्परमार्थतः पुरुषो भोक्तैव न कर्ता प्रधानं कर्त्रेव न भोक्तृ परमार्थसद्वस्त्वन्तरं पुरुषाच्चेतीयं**सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इससे प्रधानका पारार्थ्य (अन्यके लिये होना) सिद्ध नहीं होगा। जिस प्रकार एक-दूसरेको प्रकाशित करनेमें दो प्रकाशोंका गौण-मुख्य भाव नहीं बन सकता उसी प्रकार दो भोक्ताओंका भी परस्पर गौण-मुख्य भाव नहीं हो सकता ।<br><br>**पूर्व०—**यदि ऐसा मानें कि 'भोगधर्मवान् सत्त्वगुणप्रधान चित्तमें जो चैतन्यके प्रतिबिम्बका उदय होना है वही अविकारी पुरुषका भोक्तृत्व है' तो ?<br><br>**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इससे तो पुरुषकी कोई विशेषता न होनेके कारण उसके भोक्तृत्वकी कल्पना ही व्यर्थ सिद्ध होती है। यदि सर्वदा निर्विशेष होनेके कारण पुरुषमें भोगरूप अनर्थ है ही नहीं तो मोक्षका साधनरूप शास्त्र किस [दोष] की निवृत्तिके लिये रचा गया है ? यदि कहो कि शास्त्ररचना तो अविद्यासे आरोपित अनर्थकी निवृत्तिके लिये है तो 'पुरुष परमार्थतः भोक्ता ही है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं और वह परमार्थतः पुरुषसे भिन्न कोई सद्वस्तु है'

प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७


कल्पनागमबाह्या व्यर्था निर्हेतुका चेति नादर्तव्या मुमुक्षुभिः।ऐसी कल्पना शास्त्रबाह्य, व्यर्थ और निर्हेतुका है; यह मुमुक्षुओंसे आदर की जानेयोग्य नहीं है ।
एकत्वेऽपि शास्त्रप्रणयनाद्यानर्थक्यमिति चेत् ।**मध्यस्थ—**परन्तु शास्त्ररचना आदिकी व्यर्थता तो एकत्व माननेमें भी है ।
न, अभावात् । सत्सु हि<br>(वेदान्तसिद्धान्ते शास्याभावात् शास्त्राभावः) शास्त्रप्रणेत्रादिषु तत्फलार्थिषु च शास्त्रस्य प्रणयनमनर्थकं सार्थकं वेति विकल्पना स्यात् । न ह्यात्मैकत्वे शास्त्रप्रणेत्रादयस्ततो भिन्नाः सन्ति तदभाव एवं विकल्पनैवानुपपन्ना ।**सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि उस समय तो उन (शास्त्रादि) का भी अभाव हो जाता है । शास्त्रप्रणेतादि तथा उनके फलेच्छुकोंके रहते हुए ही 'शास्त्ररचना सार्थक है अथवा निरर्थक'—ऐसा विकल्प हो सकता है । आत्माका एकत्व सिद्ध होनेपर तो शास्त्रप्रणेता आदि भी उस (आत्मतत्त्व) से भिन्न नहीं रहते; तथा उनका अभाव हो जानेपर तो इस प्रकारका विकल्प ही नहीं बन सकता ।
अभ्युपगत आत्मैकत्वे प्रमाणार्थश्चाभ्युपगतो भवता यदात्मैकत्वमभ्युपगच्छता तदभ्युपगमे च विकल्पानुपपत्तिमाह शास्त्रं "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यादि ।इसके सिवा आत्मैकत्वका निश्चय हो जानेपर जिस एकत्वका निश्चय करनेवाले तुमने उसके प्रतिपादक शास्त्रकी अर्थवत्ता भी स्वीकार की है, उस (एकत्व) का निश्चय हो जानेपर भी शास्त्र "जहाँ इसे सब कुछ आत्मरूप ही हो जाता है वहाँ किसके द्वारा किसे देखे ?" इत्यादिरूपसे विकल्पकी असम्भावना ही
१०८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
शास्त्रप्रणयनाद्युपपत्तिं चाहान्यत्र परमार्थवस्तुस्वरूपादविद्याविषये। "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) इत्यादि विस्तरतो वाजसनेयके। <br><br> अत्र च विभक्ते विद्याविद्ये परापरे इत्यादावेव शास्त्रस्य। अतो न तार्किकवादभटप्रवेशो वेदान्तराजप्रमाणबाहुगुप्त इहात्मैकत्वविषय इति। <br><br> एतेनाविद्याकृतनामरूपाद्युपाधिकृत्तानेकशक्तिसाधनकृतभेदवत्त्वादब्रह्मणः सृष्ट्यादिकर्तृत्वे साधनाद्यभावो दोषः प्रत्युक्तो वेदितव्यः परैरुक्त आत्मानर्थकर्तृत्वादिक्षेपश्च। <br><br> यस्तु दृष्टान्तो राज्ञः सर्वार्थकारिणि कर्तर्युपचाराद्राजा कर्तेति सोऽत्रानुपपन्नः "स ईक्षांचक्रे" इति श्रुतेर्मुख्यार्थबाध- <br> (दृष्टेः चेतनपूर्वकत्व-स्थापनम्)परमार्थवस्तुके स्वरूपसे अन्यत्र अविद्यासम्बन्धी विषयोंमें "जहाँ द्वैत-सा होता है" आदि बृहदारण्यक-श्रुतिमें शास्त्ररचना आदिकी उपपत्ति भी विस्तारसे बतलायी है। <br><br> यहाँ (अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद्में) तो शास्त्रके आरम्भमें ही परा और अपरारूप विद्या तथा अविद्याका विभाग किया है। अतः वेदान्त-रूपी राजाकी प्रमाणरूपिणी भुजाओंसे सुरक्षित इस आत्मैकत्व-राज्यमें तार्किक-वादरूप योद्धाओंका प्रवेश नहीं हो सकता। <br><br> इस प्रतिपादनसे ब्रह्मका सृष्टि आदिके कर्तृत्वमें साधनादिका अभावरूप दोष भी निरस्त हुआ समझना चाहिये, क्योंकि अविद्याकृत नाम-रूप आदि उपाधिके कारण ब्रह्म अनेक शक्ति और साधनजनित भेदोंसे युक्त है; तथा इसीसे हमारे विपक्षियोंका बतलाया हुआ आत्माका अपना ही अनर्थ-कर्तृत्वरूप दोष भी निवृत्त हो जाता है। <br><br> और तुमने जो यह दृष्टान्त दिया कि राजाका सारा कार्य करनेवाले सेवकमें ही 'राजा कर्ता है' ऐसा उपचार किया जाता है, सो यहाँ ठीक नहीं है, क्योंकि इससे "स ईक्षांचक्रे" इस प्रमाणभूता

प्रश्न. ६ !] शाङ्करभाष्यार्थ १०२


नात्प्रमाणभूतायाः । तत्र हि गौणी कल्पना शब्दस्य यत्र मुख्यार्थो न सम्भवति। इह त्वचेतनस्य मुक्तबद्धपुरुषविशेषापेक्षया कर्तृकर्मदेशकालनिमित्तापेक्षया च बन्धमोक्षादिफलार्था नियता पुरुषं प्रति प्रवृत्तिर्नोपपद्यते। यथोक्तसर्वज्ञेश्वरकर्तृत्वपक्षे तूपपन्ना ॥ ३ ॥श्रुतिका मुख्य अर्थ बाधित हो जाता है । जहाँ मुख्य अर्थ लेना सम्भव नहीं होता वहीं शब्दकी गौणी कल्पना की जाती है । इस प्रसंगमें तो मुक्त-बद्ध पुरुषविशेषकी अपेक्षासे तथा कर्ता, कर्म, देश, काल और निमित्तकी अपेक्षासे पुरुषके प्रति अचेतन प्रधानकी नियत प्रवृत्ति सम्भव नहीं है, पूर्वोक्त सर्वज्ञ ईश्वरको कर्ता माननेके पक्षमें तो वह उचित ही है ॥ ३ ॥

सृष्टिक्रम

ईश्वरेणैव सर्वाधिकारी प्राणः पुरुषेण सृज्यते । कथम् ?राजाके समान पुरुषने ही सर्वाधिकारी प्राणकी रचना की है; किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं—]

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः । अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥

उस पुरुषने प्राणको रचा; फिर प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्नको तथा अन्नसे वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म और लोकोंको एवं लोकोंमें नामको उत्पन्न किया ॥ ४ ॥

स पुरुष उक्तप्रकारेणेक्षित्वा प्राणं हिरण्यगर्भाख्यं सर्वप्राणि-उस पुरुषने उपर्युक्त प्रकारसे ईक्षणकर हिरण्यगर्भसंज्ञक समष्टि प्राणको अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंकी-
११०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
करणाधारमन्तरात्मानमसृजत सृष्टवान् । अतः प्राणाच्छ्रद्धां सर्वप्राणिनां शुभकर्मप्रवृत्तिहेतुभूताम् । ततः कर्मफलोपभोगसाधनाधिष्ठानानि कारणभूतानि महाभूतान्यसृजत ।<br><br>खं शब्दगुणम् , वायुं स्वेन स्पर्शेन कारणगुणेन च विशिष्टं द्विगुणम् । तथा ज्योतिः स्वेन रूपेण पूर्वाभ्यां च विशिष्टं त्रिगुणं शब्दस्पर्शाभ्याम् । तथापो रसेन गुणेनासाधारणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च चतुर्गुणाः। तथा गन्धगुणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च पञ्चगुणा पृथिवी । तथा तैरेव भूतैरारब्धमिन्द्रियं द्विप्रकारं बुद्धयर्थं कर्मार्थं च दशसंख्याकम् । तस्य चेश्वरमन्तःस्थं संशयसङ्कल्पलक्षणं मनः ।इन्द्रियोंके आधारस्वरूप अन्तरात्माको रचा । उस प्राणसे समस्त प्राणियोंकी प्रवृत्तिकी हेतुभूता श्रद्धाकी रचना की । और उससे कर्मफलोपभोगके साधन ( शरीर ) के अधिष्ठान अर्थात् कारणस्वरूप महाभूतोंकी सृष्टि की ।<br><br>सबसे पहले शब्दगुणविशिष्ट आकाशको रचा, फिर निजगुण स्पर्श और शब्दगुणसे युक्त होनेके कारण दो गुणवाले वायुको, तदनन्तर स्वकीय गुण रूप और पहले दो गुण शब्द-स्पर्शसे युक्त तीन गुणवाले तेजको, तथा अपने असाधारण गुण रसके सहित पूर्वगुणोंके अनुप्रवेशसे चार गुणवाले जलको और गन्धगुणके सहित पूर्वगुणोंके अनुप्रवेशसे पाँच गुणोंवाली पृथिवीको रचा । इसी प्रकार विषयोंके ज्ञान और कर्मके लिये उन भूतोंसे ही आरब्ध दश संख्यावाले दो प्रकारके इन्द्रियग्रामकी तथा उसके स्वामी सङ्कल्पविकल्पादिरूप अन्तःस्थित मनकी रचना की ।
प्रश्न ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११
एवं प्राणिनां कार्यं करणं च सृष्ट्वा तत्स्थित्यर्थं व्रीहियवादि-लक्षणमन्नम् । ततश्चान्नादद्य-मानाद्वीर्यं सामर्थ्यं बलं सर्वकर्म-प्रवृत्तिसाधनम् । तद्वीर्यवतां च प्राणिनां तपो विशुद्धिसाधनं सङ्कीर्यमाणानाम् । मन्त्रास्तपो-विशुद्धान्तर्बहिःकरणेभ्यः कर्म-साधनभूता ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गि-रसः । ततः कर्माग्निहोत्रादि-लक्षणम् । ततो लोकाः कर्मणां फलम् । तेषु च सृष्टानां प्राणिनां नाम च देवदत्तो यज्ञदत्त इत्यादि ।<br><br>एवमेताः कलाः प्राणिनाम् अविद्यादिदोषबीजापेक्षया सृष्टाः तैमिरिकदृष्टिसृष्टा इव द्विचन्द्र-मशकमक्षिकाद्याः स्वप्नदृक्सृष्टा इव च सर्वपदार्थाः पुनस्तस्मिन्नेव पुरुषे प्रलीयन्ते हित्वा नामरूपादि-विभागम् ॥ ४ ॥इस प्रकार प्राणियोंके कार्य (विषय) और करणों (इन्द्रियों) की रचना कर उनकी स्थितिके लिये उसने अन्न उत्पन्न किया। फिर उस खाये हुए अन्नसे सब प्रकारके कर्मोंकी प्रवृत्तिका साधनभूत वीर्य-सामर्थ्य यानी बल उत्पन्न किया। तदनन्तर वर्णसंकरताको प्राप्त होते हुए उन वीर्यवान् प्राणियोंकी शुद्धिके साधनभूत तपकी रचना की। फिर जिनके बाह्य और अन्तःकरणोंकी तपसे शुद्धि हो गयी है उन प्राणियोंके लिये कर्मके साधनभूत ऋक्, यजुः, साम और अथर्वाङ्गिरस मन्त्रोंकी रचना की और तत्पश्चात् अग्निहोत्रादि कर्म तथा कर्मोंके फलस्वरूप लोक निर्माण किये। फिर इस प्रकार रचे हुए उन लोकोंमें प्राणियोंके देवदत्त, यज्ञदत्त आदि नाम बनाये ।<br><br>इस प्रकार तिमिर-रोगीकी दृष्टिसे रचे हुए द्विचन्द्र, मशक (मच्छर) और मक्षिका आदि तथा स्वप्नद्रष्टाके बनाये हुए सब पदार्थोंके समान प्राणियोंके अविद्या आदि दोषरूप बीजकी अपेक्षासे रची हुई ये कलाएँ अपने नाम-रूप आदि विभागको त्यागकर उस पुरुषमें ही लीन हो जाती हैं ॥ ४ ॥

११२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६


नदीके दृष्टान्तसे सम्पूर्ण जगत्का पुरुषाश्रयत्वप्रतिपादन

कथम्— | किस प्रकार ?

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥

वह [दृष्टान्त] इस प्रकार है—जिस प्रकार समुद्रकी ओर बहती हुई ये नदियाँ समुद्रमें पहुँचकर अस्त हो जाती हैं, उनके नामरूप नष्ट हो जाते हैं, और वे 'समुद्र' ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं। इसी प्रकार इस सर्वद्रष्टाकी ये सोलह कलाएँ, जिनका अधिष्ठान पुरुष ही है, उस पुरुषको प्राप्त होकर लीन हो जाती हैं। उनके नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं और वे 'पुरुष' ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं। वह विद्वान् कलाहीन और अमर हो जाता है। इस सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ ५ ॥

स दृष्टान्तो यथा लोक इमा नद्यः स्यन्दमानाः स्रवन्त्यः समुद्रायणाः समुद्रोऽयनं गतिः आत्मभावो यासां ता समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्योपगम्यास्तं नामरूप-तिरस्कारं गच्छन्ति । तासांवह दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार लोकमें निरन्तर प्रवाहरूपसे बहनेवाली तथा समुद्र ही जिनका अयन—गति अर्थात् आत्मभाव है ऐसी ये समुद्रायण नदियाँ समुद्रको प्राप्त होकर अस्त—अदर्शन अर्थात् नाम-रूपके तिरस्कार (अभाव) को प्राप्त हो जाती हैं, तथा इस प्रकार अस्त

प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३


चास्तं गतानां भिद्येते विनश्यतो नामरूपे गङ्गायमुनेत्यादिलक्षणे । तदभेदे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते तद्वस्तूदकलक्षणम् ।<br><br>यथायं दृष्टान्तः, उक्तलक्षणस्य प्रकृतस्यास्य पुरुषस्य परिद्रष्टुः परि समन्ताद्दृष्टुर्दर्शनस्य कर्तुः स्वरूपभूतस्य यथार्कः स्वात्मप्रकाशस्य कर्ता सर्वतः तद्वदिमाः षोडश कलाः प्राणाद्या उक्ताः कलाः पुरुषायणा नदीनामिव समुद्रः पुरुषोऽयनमात्मभावगमनं यासां कलानां ताः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्य पुरुषात्मभावमुपगम्य तथैवास्तं गच्छन्ति। भिद्येते चासां नामरूपे कलानां प्राणाद्याख्या रूपं च यथास्वम्। भेदे च नामरूपयोर्यदनष्टं तत्त्वं पुरुष इत्येवं प्रोच्यते ब्रह्मविद्भिः।<br>  ८हुई उन नदियोंके वे गङ्गा-यमुना आदि नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं और उससे अभेद हो जानेके कारण वह जलमय पदार्थ भी 'समुद्र' ऐसा कहकर ही पुकारा जाता है ।<br><br>इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त परिद्रष्टा अर्थात् जिस प्रकार सूर्य सब ओर अपने स्वरूपभूत प्रकाशका कर्ता है उसी प्रकार परि—सब ओर द्रष्टा—दर्शनके कर्ता स्वरूपभूत इस प्रकृत (जिसका प्रकरण चल रहा है) पुरुषकी ये प्राण आदि उपर्युक्त सोलह कलाएँ, जिनका अयन—आत्मभावकी प्राप्तिका स्थान वह पुरुष ही है जैसा कि नदियोंका समुद्र, अतः जो पुरुषायण कहलाती हैं, उस पुरुषको प्राप्त होकर—पुरुषरूपसे स्थित होकर उसी प्रकार [जैसे कि समुद्रमें नदियाँ] लीन हो जाती हैं। तथा इन कलाओंके प्राणादिसंज्ञक नाम और अपने-अपने विभिन्न रूप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार नाम-रूपका नाश हो जानेपर भी जिसका नाश नहीं होता उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्ता 'पुरुष' ऐसा कहकर पुकारते हैं।
११४प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
य एवं विद्वान्गुरुणा प्रदर्शितकलाप्रलयमार्गः स एष विद्यया प्रविलापितास्वविद्याकामकर्मजनितासु प्राणादिकलास्वकलः, अविद्याकृतकलानिमित्तो हि मृत्युस्तदपगमेऽकलत्वादेवामृतो भवति तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः ॥ ५ ॥इस प्रकार जिसे गुरुने कलाओंके प्रलयका मार्ग दिखलाया है ऐसा जो पुरुष इस तत्त्वको जाननेवाला है, वह उस विद्याके द्वारा अविद्या, काम और कर्मजनित प्राणादि कलाओंके लोप कर दिये जानेपर निष्कल हो जाता है, और क्योंकि मृत्यु भी अविद्याकृत कलाओंके कारण ही होती है इसलिये उनकी निवृत्ति हो जानेपर वह निष्कल हो जानेके कारण अमर हो जाता है। इसी सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—॥ ५ ॥

मरण-दुःखकी निवृत्तिमें परमात्मज्ञानका उपयोग

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥

जिसमें रथकी नाभिमें अरोंके समान सब कलाएँ आश्रित हैं उस ज्ञातव्य पुरुषको तुम जानो, जिससे कि मृत्यु तुम्हें कष्ट न पहुँचा सके ॥ ६ ॥

अरा रथचक्रपरिवारा इव रथनाभौ रथचक्रस्य नाभौ यथा प्रवेशितास्तदाश्रया भवन्ति यथा तथेत्यर्थः; कलाः प्राणाद्या यस्मिन्पुरुषे प्रतिष्ठिता उत्पत्तिस्थितिलयकालेषुरथके पहियेके परिवाररूप अरोंके समान—अर्थात् जिस प्रकार वे रथके पहियेकी नाभिमें प्रविष्ट यानी उसके आश्रित रहते हैं उसी प्रकार जिस पुरुषमें प्राणादि कलाएँ अपनी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय स्थित रहती हैं, कलाओंके

प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५


तं पुरुषं कलानामात्मभूतं वेद्यं वेदनीयं पूर्णत्वात् पुरुषं पुरि शयनाद्वा वेद जानीयात्; यथा हे शिष्या मा वो युष्मान्मृत्युः परिव्यथा मा परिव्यथयतु । न चेद्विज्ञायेत पुरुषो मृत्युनिमित्तां व्यथामापन्ना दुःखिन एव यूयं स्थ । अतस्तन्मा भूद्युष्माकमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥आत्मभूत उस ज्ञातव्य पुरुषको, जो सर्वत्र पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है, जानो; जिससे कि हे शिष्यो ! तुम्हें मृत्यु सब ओरसे व्यथित न करें । यदि तुमने उस पुरुषको न जाना तो तुम मृत्युनिमित्तक व्यथाको प्राप्त होकर दुःखी ही होगे । अतः तुम्हें वह दुःख प्राप्त न हो, यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥

उपदेशका उपसंहार

तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥

तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि) ने कहा—'इस परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे अन्य और कुछ [ ज्ञातव्य ] नहीं है ॥७॥

तानेवमनुशिष्य शिष्यांस्तान् होवाच पिप्पलादः किलैतावदेव वेद्यं परं ब्रह्म वेद विजानाम्यहमेतत् । नातोऽस्मात्परमस्ति प्रकृष्टतरं वेदितव्यमित्येवमुक्तवाञ्छिष्याणामविदितशेषास्तित्वाशङ्कानिवृत्तये कृतार्थबुद्धिजननार्थं च ॥ ७ ॥उन शिष्योंको इस प्रकार शिक्षा दे पिप्पलाद मुनिने उनसे कहा—'उस वेद्य (ज्ञातव्य) परब्रह्मको मैं इतना ही जानता हूँ । इससे पर-उत्कृष्टतर और कोई वेद्य नहीं है । इस प्रकार 'अभी कुछ बिना जाना रह गया' ऐसी शिष्योंकी आशंकाकी निवृत्तिके लिये तथा उनमें कृतार्थबुद्धि उत्पन्न करनेके लिये पिप्पलादने उनसे कहा ॥७॥

११६ · प्रश्नोपनिषद् · [ प्रश्न ६


स्तुतिपूर्वक आचार्यकी वन्दना

ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥

तब उन्होंने उनकी पूजा करते हुए कहा—'आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने कि हमें अविद्याके दूसरे पारपर पहुँचा दिया है; आप परमर्षिको हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो ॥ ८ ॥

ततस्ते शिष्या गुरुणानु-तब गुरुसे उपदेश पाये हुए
शिष्टास्तं गुरुं कृतार्थाः सन्तोउन शिष्यों ने कृतार्थ हो, उस
विद्यानिष्क्रयमपश्यन्तः किंविद्यादानका कोई अन्य प्रतिकार
कृतवन्त इत्युच्यते—अर्चयन्तःन देखकर क्या किया सो बतलाते
पूजयन्तः पादयोः पुष्पाञ्जलि-हैं—उन्होंने गुरुजीका अर्चन
प्रकिरणेन प्रणिपातेन चअर्थात् चरणोंमें पुष्पाञ्जलिप्रदान
शिरसा । किमृचुरित्याह—त्वं हिएवं शिर झुकाकर प्रणाम करके
नोऽस्माकं पिता ब्रह्मशरीरस्यउनका पूजन करते हुए [कहा] ।
विद्यया जनयितृत्वान्नित्यस्या-क्या कहा, सो बतलाते हैं—
जरामरस्याभयस्य । यस्त्वमेव'विद्याके द्वारा हमारे नित्य,
अस्माकमविद्याया विपरीतज्ञानात्अजर, अमर एवं अभयरूप ब्रह्म-
जन्मजरामरणरोगदुःखादिग्रा-शरीरके जनयिता होनेके कारण
हादपारादविद्यामहोदधेर्विद्या-आप तो हमारे पिता हैं; जिन
प्लवेन परमपुनरावृत्तिलक्षणंआपने विद्यारूप नौकाके द्वारा
हमें विपरीत ज्ञानरूप अविद्यासे
अर्थात् जन्म, जरा, मरण, रोग
और दुःख आदि ग्राहोंके कारण
जो अपार है उस अविद्यारूप
समुद्रसे उस ओर महासागरके

मन्त्रप्रतीक-सूची (परिशिष्ट)

प्रश्न ६ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७


मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तार-परपारके समान अपुनरावृत्तिरूप
यस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान्मोक्षसंज्ञक दूसरे पारपर पहुँचा
प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपिदिया है; अतः आपका पितृत्व तो
हि पिता शरीरमात्रं जनयति ।अन्य ( जन्मदाता ) पिताकी अपेक्षा
तथापि स प्रपूज्यतमो लोकेभी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा
किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभय-पिता भी केवल शरीरको ही उत्पन्न
दातुरित्यभिप्रायः । नमः परम-करता है, तो भी वह लोकमें सबसे
ऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृ-अधिक पूजनीय होता है; फिर
भ्यो नमः परमऋषिभ्य इतिआत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले
द्विर्वचनमादरार्थम् ॥८॥आपके पूजनीयत्वके विषयमें तो
कहना ही क्या है ? अतः ब्रह्मविद्या-
सम्प्रदायके प्रवर्तक परमर्षिको
नमस्कार हो । यहाँ 'नमः परम-
ऋषिभ्यः' इसकी द्विरुक्ति आदर-
प्रदर्शनके लिये है ॥८॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥


इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

शान्तिपाठः

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्योऽरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!