भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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१०६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
न; प्रधानस्य पारार्थ्यानुपपत्तेः । न हि भोक्त्रोर्द्वयोरितरेतरगुणप्रधानभाव उपपद्यते प्रकाशयोरिवेतरेतरप्रकाशने ।<br><br>भोगधर्मवति सत्त्वाङ्गिनि चेतसि पुरुषस्य चैतन्यप्रतिबिम्बोदयोऽविक्रियस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वमिति चेत् ।<br><br>न; पुरुषस्य विशेषाभावे भोक्तृत्वकल्पनानर्थक्यात् । भोगरूपश्चेदनर्थः पुरुषस्य नास्ति सदा निर्विशेषत्वात्पुरुषस्य कस्य अपनयनार्थं मोक्षसाधनं शास्त्रं प्रणीयते । अविद्याध्यारोपितानर्थापनयनाय शास्त्रप्रणयनमिति चेत्परमार्थतः पुरुषो भोक्तैव न कर्ता प्रधानं कर्त्रेव न भोक्तृ परमार्थसद्वस्त्वन्तरं पुरुषाच्चेतीयं**सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इससे प्रधानका पारार्थ्य (अन्यके लिये होना) सिद्ध नहीं होगा। जिस प्रकार एक-दूसरेको प्रकाशित करनेमें दो प्रकाशोंका गौण-मुख्य भाव नहीं बन सकता उसी प्रकार दो भोक्ताओंका भी परस्पर गौण-मुख्य भाव नहीं हो सकता ।<br><br>**पूर्व०—**यदि ऐसा मानें कि 'भोगधर्मवान् सत्त्वगुणप्रधान चित्तमें जो चैतन्यके प्रतिबिम्बका उदय होना है वही अविकारी पुरुषका भोक्तृत्व है' तो ?<br><br>**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इससे तो पुरुषकी कोई विशेषता न होनेके कारण उसके भोक्तृत्वकी कल्पना ही व्यर्थ सिद्ध होती है। यदि सर्वदा निर्विशेष होनेके कारण पुरुषमें भोगरूप अनर्थ है ही नहीं तो मोक्षका साधनरूप शास्त्र किस [दोष] की निवृत्तिके लिये रचा गया है ? यदि कहो कि शास्त्ररचना तो अविद्यासे आरोपित अनर्थकी निवृत्तिके लिये है तो 'पुरुष परमार्थतः भोक्ता ही है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं और वह परमार्थतः पुरुषसे भिन्न कोई सद्वस्तु है'