प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५ |
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| पुरुषयोर्विशिष्टविक्रिया कल्प्यते । | विशिष्ट विकारकी कल्पना केवल शब्दमात्रसे ही की गयी है । |
| अथ भोगकालेऽपि चिन्मात्र एव प्राग्वत्पुरुष इति चेत् । | पूर्व०—ठीक है, परन्तु पुरुष भोगकालमें भी पूर्ववत् चिन्मात्र ही है। |
| न तर्हि परमार्थतो भोगः पुरुषस्य । | सिद्धान्ती—तब तो परमार्थतः पुरुषका भोग ही सिद्ध नहीं होता। |
| भोगकाले चिन्मात्रस्य विक्रिया परमार्थैव तेन भोगः पुरुषस्येति चेत् । | पूर्व०—परन्तु भोगकालमें जो चिन्मात्र पुरुषका विकार होता है वह वास्तविक ही होता है; इससे पुरुषका भोग सिद्ध होता है। |
| न; प्रधानस्यापि भोगकाले विक्रियावत्त्वाद्भोक्तृत्वप्रसङ्गः । चिन्मात्रस्यैव विक्रिया भोक्तृत्वम् इति चेदौष्ण्याद्यसाधारणधर्म-वतामग्न्यादीनामभोक्तृत्वे हेत्व-नुपपत्तिः । | सिद्धान्ती—नहीं, भोगकालमें तो प्रधान भी विकारयुक्त होता है, इससे उसके भी भोक्तृत्वका प्रसंग आ जायगा। यदि कहो कि भोक्तृत्व चिन्मात्रके ही विकारका नाम है तो उष्णता आदि असाधारण धर्मवाले अग्नि आदिके अभोक्तृत्वमें भी कोई कारण नहीं दिखलायी देता [क्योंकि जिस प्रकार चेतनता पुरुषका असाधारण धर्म है उसी प्रकार उष्णता आदि उनके असाधारण धर्म हैं]। |
| प्रधानपुरुषयोर्द्वयोर्युगपद्भो-क्तृत्वमिति चेत् । | मध्यस्थ—यदि प्रधान और पुरुष दोनोंका साथ-साथ भोक्तृत्व माना जाय तो ? |