भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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१६४प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६

प्रधानं तु कर्त्रेव न भोक्त्रीति ।है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं ?
नन्ूक्तं पुरुषश्चिन्मात्र एव स च स्वात्मस्थो विक्रियते भुञ्जानो न तत्त्वान्तरपरिणामेन । प्रधानं तु तत्त्वान्तरपरिणामेन विक्रियतेऽतोऽनेकमशुद्धम् अचेतनं चेत्यादिधर्मवत्तद्विपरीतः पुरुषः । <br><br> (सांख्यानां कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वरूपविवेचनम्)पूर्व०— यह पहले ही कहा जा चुका है कि पुरुष चिन्मात्र ही है और वह भोग करते समय अपने स्वरूपमें स्थित हुआ ही विकारोंको प्राप्त होता है—उसका विकार तत्त्वान्तरपरिणामके द्वारा नहीं होता । किन्तु प्रधान तत्त्वान्तर-परिणामके द्वारा विकृत होता है; अतः वह [ महत्तत्त्वादि-भेदसे ] अनेक, अशुद्ध और अचेतन आदि धर्मोंसे युक्त है, तथा पुरुष उससे विपरीत स्वभाववाला है ।
नासौ विशेषो वाङ्मात्रत्वात् । <br><br> (अस्य परिहारः) <br><br> प्राग्भोगोत्पत्तेः केवलचिन्मात्रस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वं नाम विशेषो भोगोत्पत्तिक़ाले चेज्जायते निवृत्ते च भोगे पुनस्तद्विशेषादपेतश्चिन्मात्र एव भवतीति चेन्महदाद्याकारेण च परिणम्य प्रधानं ततोऽपेत्य पुनः प्रधानं स्वरूपेणावतिष्ठत इत्यस्यां कल्पनायां न कश्चिद्विशेष इति वाङ्मात्रेण प्रधान-सिद्धान्ती— यह कोई विशेषता नहीं है, क्योंकि यह तो केवल शब्दमात्र है । यदि भोगोत्पत्तिके पूर्व केवल चिन्मात्ररूपसे स्थित पुरुषमें भोगकी उत्पत्तिके समय ही भोक्तृत्वरूप कोई विशेषता उत्पन्न होती है और भोगके निवृत्त होनेपर उस विशेषताके दूर हो जानेपर वह फिर चिन्मात्र ही रह जाता है तो प्रधान भी महत् आदिरूपसे परिणत होकर उनसे निवृत्त होनेपर फिर प्रधानरूपसे ही स्थित हो जाता है । अतः इस कल्पनामें कोई विशेषता नहीं है; इसलिये तुम्हारेद्वारा प्रधान और पुरुषके