प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०३ |
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| तथेतरे तार्किकाः सांख्यैः । इत्येवं परस्परविरुद्धार्थकल्पनात् आमिषार्थिन इव प्राणिनोऽन्यो-न्यविरुद्धमानार्थदर्शित्वादूदूरम् एवापकृष्यन्ते। अतस्तन्मतमनादृत्य वेदान्तार्थतत्त्वमेकत्वदर्शनं प्रति आदरवन्तो मुमुक्षवः स्युरिति ता-ार्किकमतदोषप्रदर्शनं किञ्चिदुच्यते अस्माभिर्न तु तार्किकव चात्पर्य्येण। <br><br> तथैतदत्रोक्तम्— <br><br> “विवदत्स्वेव निक्षिप्य <br> विरोधोद्भवकारणम् । <br> तैः संरक्षितसद्बुद्धिः <br> सुखं निर्वाति वेदवित् ॥” <br> इति । <br><br> किं च भोक्तृत्वकर्त्तृत्वयो-र्विक्रिययोर्विशेषाानुपपत्तिः । का नामासौ कर्तृत्वाज्जात्यन्तरभूता भोक्तृत्वविशिष्टा विक्रिया यतो भोक्तैव पुरुषः कल्प्यते न कर्ता | इसी प्रकार दूसरे तार्किक सांख्य-वादियोंसे परास्त हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध अर्थकी कल्पना कर मांसलोलुप प्राणियोंके समान एक-दूसरेके विरोधी अर्थको ही देखने-वाले होनेसे परमार्थतत्त्वसे दूर ही हटा दिये जाते हैं। अतः मुमुक्षुलोग उनके मतका अनादर कर वेदान्तके तात्पर्यार्थ एकत्वदर्शनके प्रति आदर-युक्त हों—इसलिये ही हम तार्किकों-के मतका किञ्चित् दोष प्रदर्शित करते हैं, तार्किकोंके समान कुछ तत्परतासे नहीं । <br><br> तथा इस विषयमें ऐसा कहा गया है— <br><br> “[ भेद सत्य है—इस ] विरोध-की उत्पत्तिके कारणको विवाद करनेवालोंके ऊपर ही छोड़कर जिसने अपनी सद्बुद्धिको उनसे सुरक्षित रक्खा है वह वेदवेत्ता सुख-पूर्वक शान्तिको प्राप्त हो जाता है।” <br><br> इसके सिवा, भोक्तृत्व और कर्तृत्व इन दोनों विकारोंमें कोई अन्तर मानना भी उचित नहीं है । कर्तृत्वसे विजातीय यह भोक्तृत्व-विशिष्ट विकार है क्या ? जिससे कि पुरुष भोक्ता ही माना जाता |