प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| ८४ | 'प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ५' |
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| तं त्रिविधं लोकमोङ्कारेण साधनेनापरब्रह्मलक्षणमन्वेत्यनुगच्छति विद्वान् ।<br><br>तेनैवोङ्कारेण यत्तत्परं ब्रह्माक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं शान्तं विमुक्तं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिविशेषसर्वप्रपञ्चविवर्जितमत एव अजरं जरावर्जितममृतं मृत्युवर्जितमत एव यस्माज्जरादिक्रियारहितमतोऽभयम् , यस्मादेव अभयं तस्मात्परं निरतिशयम्; तदप्योङ्कारेणायतनेन गमनसाधनेनान्वेतीत्यर्थः । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ७ ॥ | इस क्रमसे ओंकाररूप साधनके द्वारा ही विद्वान् अपरब्रह्मस्वरूप इस त्रिविध लोकको प्राप्त हो जाता है अर्थात् इन तीनोंका अनुगमन करता है ।<br><br>उस ओंकारसे ही वह उस अक्षर सत्य और पुरुषसंज्ञक परब्रह्मको प्राप्त होता है जो शान्त अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि विशेषभावसे मुक्त तथा सब प्रकारके प्रपञ्चसे रहित है, इसीलिये जो अजर—जराशून्य अतः अमृत—मृत्युरहित है । क्योंकि वह जरा आदि विकारोंसे रहित है इसलिये अभयरूप है । और अभय होनेके कारण ही पर–निरतिशय है । तात्पर्य यह कि उसे भी वह ओंकाररूप आलम्बन यानी गमनसाधनके द्वारा ही प्राप्त होता है । मन्त्रके अन्तमें 'इति' शब्द वाक्यकी परिसमाप्तिके लिये है ॥७॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
पञ्चमः प्रश्नः ॥ ५ ॥