भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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७४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५ ]


बाह्यविषयेभ्य उपसंहृतकरणः समाहितचित्तो भक्त्यावेशित-ब्रह्मभाव ओंकारे, आत्मप्रत्यय-सन्तानाविच्छेदो भिन्नजातीय-प्रत्ययान्तराखिलीकृतो निर्वात-स्थदीपशिखासमोऽभिध्यानश-ब्दार्थः। सत्यब्रह्मचर्याहिंसापरि-ग्रहत्यागसंन्यासशौचसन्तोषा-मायावित्वाद्यनेकयमनियमानु-गृहीतः स एवं यावज्जीवव्रत-धारणः कतमं वाव, अनेके हि ज्ञानकर्मनिर्वर्त्या लोकास्तिष्ठन्ति तेषु तेनोङ्काराभिध्यानेन कतमं स लोकं जयति ॥ १ ॥लेता है?] इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर और चित्तको एकाग्र कर उसे भक्तिके द्वारा जिसमें ब्रह्मभाव-की प्रतिष्ठा की गयी है उस ओंकारमें इस प्रकार लगा देना कि आत्मप्रत्ययसन्ततिका विच्छेद न हो—भिन्न जातीय प्रतीतियोंसे उसमें बाधा न आवे तथा वह वायुहीन स्थानमें रक्खे हुए दीपक-की शिखाके समान स्थित हो जाय—ऐसा ध्यान ही ‘अभिध्यान’ शब्दका अर्थ है। सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, संन्यास, शौच, सन्तोष, निष्कपटता आदि अनेक यम-नियमोंसे सम्पन्न होकर यावज्जीवन ऐसा व्रत धारण करने-वालेको भला कौन-सा लोक प्राप्त होगा ? क्योंकि ज्ञान और कर्मसे प्राप्त होनेयोग्य तो बहुत-से लोक हैं; उनमें उस ओंकारचिन्तनद्वारा वह किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥

ओंकारोपासनासे प्राप्तव्य पर अथवा अपर ब्रह्म

तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥

उससे उस पिप्पलादने कहा—हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है। अतः विद्वान् इसीके आश्रयसे उनमेंसे किसी एक [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥