प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
पृष्ठ 83, कुल 131 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 83
पञ्चम प्रश्न
सत्यकामका प्रश्न—ओङ्कारोपासकको किस लोककी प्राप्ति होती है?
अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे शिविपुत्र सत्यकामने पूछा—'भगवन् ! मनुष्योंमें जो पुरुष प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओंकारका चिन्तन करे, वह उस (ओंकारोपासना) से किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥
| अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ; अथेदानों परापरब्रह्म-प्राप्तिसाधनत्वेनोङ्कारस्योपासन-विधित्सया प्रश्न आरभ्यते- | तदनन्तर उन आचार्य पिप्पलादसे शिविके पुत्र सत्यकामने पूछा; अब इससे आगे पर और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिके साधन-स्वरूप ओंकारोपासनाका विधान करनेकी इच्छासे आगेका प्रश्न प्रारम्भ किया जाता है । |
| स यः कश्चिद् वै भगवन् मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये तद् अद्भुतमिव प्रायणान्तं मरणान्तम्, यावज्जीवमित्येतत्, ओङ्कारमभिध्यायीताभिमुख्येन चिन्तयेत्, | हे भगवन् ! मनुष्योंमें—मनुष्यजातिके बीच जो कोई आश्चर्यसदृश विरल पुरुष मरण-पर्यन्त--यावज्जीवन ओंकारका अभिध्यान अर्थात् मुख्यरूपसे चिन्तन करे |