प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |
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| परमेवाक्षरं वक्ष्यमाणविशेषणं प्रतिपद्यत इत्येतदुच्यते । स यो ह वै तत्सर्वैषणाविनिर्मुक्तोऽच्छायं तमोवर्जितम्, अशरीरं नामरूपसर्वोपाधिशरीरवर्जितम्, अलोहितं लोहितादिसर्वगुणवर्जितम्, यत एवमतः शुभ्रं शुद्धम् , सर्वविशेषणरहितत्वादक्षरम् , सत्यं पुरुषाख्यम्, अप्राणम् अमनोगोचरम्, शिवं शान्तं सबाह्याभ्यन्तरमजं वेदयते विजानाति यस्तु सर्वत्यागी सोम्य स सर्वज्ञो न तेनाविदितं किंचित् सम्भवति । पूर्वमविद्ययाऽसर्वज्ञ आसीत्पुनर्विद्ययाविद्यापनये सर्वो भवति तदा । तत्तस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति उक्तार्थसंग्राहकः ॥ १० ॥ | उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि वह आगे बतलाये जानेवाले विशेषणोंसे युक्त पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । सम्पूर्ण एषणाओंसे छूटा हुआ जो अधिकारी उस अच्छाय—तमोहीन, अशरीर—नामरूपमय सम्पूर्ण औपाधिक शरीरोंसे रहित, अलोहित—लोहितादि सब प्रकारके गुणोंसे हीन, और ऐसा होनेके कारण ही जो शुभ्र—शुद्ध, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित होनेके कारण अक्षर, पुरुषसंज्ञक सत्य, अप्राण, मनका अविषय, शिव, शान्त और सबाह्याभ्यन्तर अज परब्रह्मको जानता है, तथा जो सबका त्याग करनेवाला है, हे सोम्य ! वह सर्वज्ञ हो जाता है—उससे कुछ भी अज्ञात नहीं रह सकता । वह अविद्यावश पहले असर्वज्ञ था, फिर विद्याद्वारा अविद्याके नष्ट हो जानेपर वही [ सर्वज्ञ और ] सर्वरूप हो जाता है । इस विषयमें उपर्युक्त अर्थका संग्रह करनेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है ॥ १० ॥ |
अक्षरब्रह्मके ज्ञानका फल
$\begin{aligned} विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः \ प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । \end{aligned}$