भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
प्रश्न ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
परमेवाक्षरं वक्ष्यमाणविशेषणं प्रतिपद्यत इत्येतदुच्यते । स यो ह वै तत्सर्वैषणाविनिर्मुक्तोऽच्छायं तमोवर्जितम्, अशरीरं नामरूपसर्वोपाधिशरीरवर्जितम्, अलोहितं लोहितादिसर्वगुणवर्जितम्, यत एवमतः शुभ्रं शुद्धम् , सर्वविशेषणरहितत्वादक्षरम् , सत्यं पुरुषाख्यम्, अप्राणम् अमनोगोचरम्, शिवं शान्तं सबाह्याभ्यन्तरमजं वेदयते विजानाति यस्तु सर्वत्यागी सोम्य स सर्वज्ञो न तेनाविदितं किंचित् सम्भवति । पूर्वमविद्ययाऽसर्वज्ञ आसीत्पुनर्विद्ययाविद्यापनये सर्वो भवति तदा । तत्तस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति उक्तार्थसंग्राहकः ॥ १० ॥उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि वह आगे बतलाये जानेवाले विशेषणोंसे युक्त पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । सम्पूर्ण एषणाओंसे छूटा हुआ जो अधिकारी उस अच्छाय—तमोहीन, अशरीर—नामरूपमय सम्पूर्ण औपाधिक शरीरोंसे रहित, अलोहित—लोहितादि सब प्रकारके गुणोंसे हीन, और ऐसा होनेके कारण ही जो शुभ्र—शुद्ध, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित होनेके कारण अक्षर, पुरुषसंज्ञक सत्य, अप्राण, मनका अविषय, शिव, शान्त और सबाह्याभ्यन्तर अज परब्रह्मको जानता है, तथा जो सबका त्याग करनेवाला है, हे सोम्य ! वह सर्वज्ञ हो जाता है—उससे कुछ भी अज्ञात नहीं रह सकता । वह अविद्यावश पहले असर्वज्ञ था, फिर विद्याद्वारा अविद्याके नष्ट हो जानेपर वही [ सर्वज्ञ और ] सर्वरूप हो जाता है । इस विषयमें उपर्युक्त अर्थका संग्रह करनेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है ॥ १० ॥

अक्षरब्रह्मके ज्ञानका फल

$\begin{aligned} विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः \ प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । \end{aligned}$

७२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४


तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य

स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

हे सोम्य ! जिस अक्षरमें समस्त देवोंके सहित विज्ञानात्मा प्राण और भूत सम्यक् प्रकारसे स्थित होते हैं उसे जो जानता है वह सर्वज्ञ सभीमें प्रवेश कर जाता है ॥ ११ ॥

| विज्ञानात्मा सह देवैश्चाग्न्या- | जिस अक्षरमें अग्नि आदि | | दिभिः प्राणाश्चक्षुरादयो भूतानि | देवोंके सहित विज्ञानात्मा तथा | | पृथिव्यादीनि संप्रतिष्ठन्ति | चक्षु आदि प्राण और पृथिवी आदि | | प्रविशन्ति यत्र यस्मिन्नक्षरे | भूत प्रतिष्ठित होते अर्थात् प्रवेश | | तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य | करते हैं, हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! | | प्रियदर्शन स सर्वज्ञः सर्वमेव | उस अक्षरको जो जानता है वह सर्वज्ञ | | आविवेशाविशतीत्यर्थः ॥ ११ ॥ | सभीमें आविष्ट अर्थात् प्रविष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
चतुर्थः प्रश्नः ॥ ४ ॥

पञ्चम प्रश्न (त्रिमात्र ओङ्कारोपासना व फल)

पञ्चम प्रश्न

सत्यकामका प्रश्न—ओङ्कारोपासकको किस लोककी प्राप्ति होती है?

अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥

तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे शिविपुत्र सत्यकामने पूछा—'भगवन् ! मनुष्योंमें जो पुरुष प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओंकारका चिन्तन करे, वह उस (ओंकारोपासना) से किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥

अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ; अथेदानों परापरब्रह्म-प्राप्तिसाधनत्वेनोङ्कारस्योपासन-विधित्सया प्रश्न आरभ्यते-तदनन्तर उन आचार्य पिप्पलादसे शिविके पुत्र सत्यकामने पूछा; अब इससे आगे पर और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिके साधन-स्वरूप ओंकारोपासनाका विधान करनेकी इच्छासे आगेका प्रश्न प्रारम्भ किया जाता है ।
स यः कश्चिद् वै भगवन् मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये तद् अद्भुतमिव प्रायणान्तं मरणान्तम्, यावज्जीवमित्येतत्, ओङ्कारमभिध्यायीताभिमुख्येन चिन्तयेत्,हे भगवन् ! मनुष्योंमें—मनुष्यजातिके बीच जो कोई आश्चर्यसदृश विरल पुरुष मरण-पर्यन्त--यावज्जीवन ओंकारका अभिध्यान अर्थात् मुख्यरूपसे चिन्तन करे

७४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५ ]


बाह्यविषयेभ्य उपसंहृतकरणः समाहितचित्तो भक्त्यावेशित-ब्रह्मभाव ओंकारे, आत्मप्रत्यय-सन्तानाविच्छेदो भिन्नजातीय-प्रत्ययान्तराखिलीकृतो निर्वात-स्थदीपशिखासमोऽभिध्यानश-ब्दार्थः। सत्यब्रह्मचर्याहिंसापरि-ग्रहत्यागसंन्यासशौचसन्तोषा-मायावित्वाद्यनेकयमनियमानु-गृहीतः स एवं यावज्जीवव्रत-धारणः कतमं वाव, अनेके हि ज्ञानकर्मनिर्वर्त्या लोकास्तिष्ठन्ति तेषु तेनोङ्काराभिध्यानेन कतमं स लोकं जयति ॥ १ ॥लेता है?] इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर और चित्तको एकाग्र कर उसे भक्तिके द्वारा जिसमें ब्रह्मभाव-की प्रतिष्ठा की गयी है उस ओंकारमें इस प्रकार लगा देना कि आत्मप्रत्ययसन्ततिका विच्छेद न हो—भिन्न जातीय प्रतीतियोंसे उसमें बाधा न आवे तथा वह वायुहीन स्थानमें रक्खे हुए दीपक-की शिखाके समान स्थित हो जाय—ऐसा ध्यान ही ‘अभिध्यान’ शब्दका अर्थ है। सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, संन्यास, शौच, सन्तोष, निष्कपटता आदि अनेक यम-नियमोंसे सम्पन्न होकर यावज्जीवन ऐसा व्रत धारण करने-वालेको भला कौन-सा लोक प्राप्त होगा ? क्योंकि ज्ञान और कर्मसे प्राप्त होनेयोग्य तो बहुत-से लोक हैं; उनमें उस ओंकारचिन्तनद्वारा वह किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥

ओंकारोपासनासे प्राप्तव्य पर अथवा अपर ब्रह्म

तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥

उससे उस पिप्पलादने कहा—हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है। अतः विद्वान् इसीके आश्रयसे उनमेंसे किसी एक [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥

प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७५

इति पृष्टवते तस्मै स होवाच पिप्पलादः—एतद्वै सत्यकाम ! एतद्ब्रह्म वै परं चापरं च ब्रह्म परं सत्यमक्षरं पुरुषाख्यमपरं च प्राणाख्यं प्रथमजं यत्तदोङ्कार एवोङ्कारात्मकमोङ्कारप्रतीकत्वात्। परं हि ब्रह्म शब्दाद्युपलक्षणानहं सर्वधर्मविशेषवर्जितमतो न शक्यम् अतीन्द्रियगोचरत्वात्केवलेन मनसावगाहितुम् । ओङ्कारे तु विष्ण्वादिप्रतिमास्थानीये भक्त्यावेशितब्रह्मभावे ध्यायिनां तत्प्रसीदति इत्येतदवगम्यते शास्त्रप्रामाण्यात् तथापरं च ब्रह्म । तस्मात्परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कार इत्युपचर्यते। तस्मादेवं विद्वानेतेनैवात्मप्राप्तिसाधनेनैवोङ्काराभिध्यानेन एकतरं परमपरं चान्वेति ब्रह्मानुगच्छति नेदिष्ठं ह्यालम्वनम् ओङ्कारो ब्रह्मणः ॥२॥इस प्रकार पूछनेवाले सत्यकामसे पिप्पलादने कहा — हे सत्यकाम ! यह पर और अपर ब्रह्म; पर अर्थात् सत्य अक्षर अथवा पुरुषसंज्ञक ब्रह्म तथा जो प्रथम विकाररूप प्राण नामक अपर ब्रह्म है वह ओंकार ही है; अर्थात् ओंकाररूप प्रतीकवाला होनेसे ओंकारस्वरूप ही है । परब्रह्म शब्दादिसे उपलक्षित होनेके अयोग्य और सब प्रकारके विशेष धर्मोंसे रहित है; अतः इन्द्रिय-गोचरतासे अतीत होनेके कारण केवल मनसे उसका अवगाहन नहीं किया जा सकता । किन्तु विष्णु आदिकी प्रतिमास्थानीय ओंकारमें जिसमें कि भक्तिके द्वारा ब्रह्म-भावकी स्थापना की गयी है, ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है—यह बात शास्त्र-प्रमाणसे जानी जाती है। इसी प्रकार अपर ब्रह्म भी [ॐकारमें ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है] । अतः पर और अपर ब्रह्म ओंकार ही है—ऐसा उपचारसे कहा जाता है । सुतरां, विद्वान् आत्मप्राप्तिके इस ओंकार-चिन्तनरूप साधनसे ही पर या अपर किसी एक ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि ओंकार ही ब्रह्म-का सबसे अधिक समीपवर्ती आलम्बन है ॥२॥
७६प्रश्नोपनिषद्[. प्रश्न ५

एकमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल

स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥

वह यदि एकमात्राविशिष्ट ॐकारका ध्यान करता है तो उसीसे बोधको प्राप्त कर तुरन्त ही संसारको प्राप्त हो जाता है । उसे ऋचाएँ मनुष्यलोकमें ले जाती हैं । वहाँ वह तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर महिमाका अनुभव करता है ॥ ३ ॥

स यद्यप्योङ्कारस्य सकलमात्राविभागज्ञो न भवति तथापि ओङ्काराभिध्यानप्रभावाद्विशिष्टामेव गतिं गच्छति; एतदेकदेशज्ञानवैगुण्यतयोङ्कारशरणः कर्मज्ञानोभयभ्रष्टो न दुर्गतिं गच्छति । किं तर्हि ? यद्यप्येवम् ओङ्कारमेवैकमात्राविभागज्ञ एव केवलोऽभिध्यायीतैकमात्रं सदा ध्यायीत स तेनैवैकमात्राविशिष्टोङ्काराभिध्यानेनैव संवेदितः सम्बोधितस्तूर्णं क्षिप्रमेव जगत्यां पृथिव्यामभिसम्पद्यते ।यद्यपि वह ओंकारकी समस्त मात्राओंका ज्ञाता नहीं होता; तो भी ओंकारके चिन्तनके प्रभावसे वह विशिष्ट गतिको ही प्राप्त होता है । अर्थात् ओंकारकी शरणमें प्राप्त हुआ पुरुष इसके एकांश ज्ञानरूप दोषसे कर्म और ज्ञान दोनोंसे भ्रष्ट होकर दुर्गति को प्राप्त नहीं होता । तो फिर क्या होता है ? वह इस प्रकार यदि ओंकारकी केवल एकमात्राका ज्ञाता होकर केवल एकमात्राविशिष्ट ओंकारका ही अभिध्यान यानी सर्वदा चिन्तन करता है तो वह उस एकमात्राविशिष्ट ओंकारके ध्यानसे ही संवेदित अर्थात् बोध प्राप्त कर तत्काल जगती यानी पृथिवीलोकमें प्राप्त हो जाता है ।

प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७


किम् ? मनुष्यलोकम् । अनेकानि हि जन्मानि जगत्त्यां सम्भवन्ति । तत्र तं साधकं जगत्त्यां मनुष्यलोकमेवर्च उपनयन्त उपनिगमयन्ति । ऋच ऋग्वेदस्वरूपा ह्योङ्कारस्य प्रथमैकमात्राभिध्याता । तेन स तत्र मनुष्यजन्मनि द्विजाग्र्यः संस्तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया च संपन्नो महिमानं विभूतिमनुभवति न वीतश्रद्धो यथेष्टचेष्टो भवति योगभ्रष्टः कदाचिदपि न दुर्गतिं गच्छति ॥ ३ ॥- [पृथिवीलोकमें] किसे प्राप्त होता है ? मनुष्यलोकको; क्योंकि संसारमें तो अनेक प्रकारके जन्म हो सकते हैं । उनमेंसे संसारमें उस साधकको ऋचाएँ मनुष्यलोकको ही ले जाती हैं, क्योंकि ओंकारकी ध्यान की हुई पहली एक मात्रा (अ) ऋग्वेदस्वरूपा है । इससे उस मनुष्यजन्ममें वह द्विजश्रेष्ठ होकर तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न हो महिमा यानी विभूतिका अनुभव करता है—श्रद्धाहीन होकर स्वेच्छाचारी नहीं होता । ऐसा योगभ्रष्ट कभी दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता ॥ ३ ॥

द्विमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल

अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥

और यदि वह द्विमात्राविशिष्ट ओंकारके चिन्तनद्वारा मनसे एकत्वको प्राप्त हो जाता है तो उसे यजुःश्रुतियाँ अन्तरिक्षस्थित सोमलोकमें ले जाती हैं । तदनन्तर सोमलोकमें विभूतिका अनुभव कर वह फिर लौट आता है ॥ ४ ॥

७८ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५


अथ पुनर्यदि द्विमात्राविभागज्ञो द्विमात्रेण विशिष्टमोङ्कारम् अभिध्यायीत स्वप्नात्मके मनसि मननीये यजुर्मये सोमदैवत्ये संपद्यत एकाग्रतयात्मभावं गच्छति स एवं सम्पन्नो मृतोऽन्तरिक्षम् अन्तरिक्षाधारं द्वितीयमात्रारूपं द्वितीयमात्रारूपैरेव यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकं सौम्यं जन्म प्रापयन्ति तं यजूंषीत्यर्थः। स तत्र विभूतिम् अनुभूय सोमलोके मनुष्यलोकं प्रति पुनरावर्तते ॥ ४ ॥और यदि वह दो मात्राओं (अ उ) के विभागका ज्ञाता होकर द्विमात्राविशिष्ट ओंकारका चिन्तन करता है तो वह सोम ही जिसका देवता है उस स्वप्नात्मक यजुर्वेदस्वरूप मननीय मनको प्राप्त होता है अर्थात् एकाग्रताद्वारा उसके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है [यानी उसे ही अपना-आप मानने लगता है]। इस अवस्थामें मृत्युको प्राप्त होनेपर वह अन्तरिक्षाधार द्वितीयमात्रास्वरूप सोमलोकमें द्वितीयमात्रारूप यजुःश्रुतियों द्वारा सोमलोकको ले जाया जाता है। अर्थात् यजुःश्रुतियाँ उसे सोमलोकसम्बन्धी जन्म प्राप्त कराती हैं। उस सोमलोकमें विभूतिका अनुभव कर वह फिर मनुष्यलोकमें लौट आता है ॥ ४ ॥

त्रिमात्राविशिष्ट ओङ्कारोपासनाका फल

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

प्रश्न ५.] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ॐ इस अक्षरद्वारा इस परम-पुरुषकी उपासना करता है वह तेजोमय सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सर्प जिस प्रकार केंचुलीसे निकल आता है उसी प्रकार वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सामश्रुतियोंद्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है और इस जीवनघनसे भी उत्कृष्ट हृदयस्थित परम पुरुषका साक्षात्कार करता है। इस सम्बन्धमें ये दो श्लोक हैं ॥ ५ ॥

यः पुनरेतमोङ्कारं त्रिमात्रेण <br><br> त्रिमात्राविषयविज्ञानविशिष्टेन <br><br> ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं सूर्या- <br><br> न्तर्गतं पुरुषं प्रतीकेनाभि- <br><br> ध्यायीत तेनाभिध्यानेन— <br><br> प्रतीकत्वेन ह्यालम्वनत्वं प्रकृतम् <br><br> ओङ्कारस्य परं चापरं च ब्रह्मेत्य- <br><br> भेदश्रुतेरोङ्कारमिति च द्वितीया- <br><br> नेकंशः श्रुता बाध्येतान्यथा <br><br> यद्यपि तृतीयाभिध्यानत्वेन करण- <br><br> त्वमुपपद्यते तथापि प्रकृतानु- <br><br> रोधात्त्रिमात्रं परं पुरुषमिति <br><br> द्वित्तीयैव परिणेया "त्यजेदेकंपरन्तु जो पुरुष इस तीन मात्राओंवाले—तीनमात्राविषयक विज्ञानसे युक्त ‘ॐ’ इस अक्षरात्मक प्रतीकरूपसे पर अर्थात् सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषका चिन्तन करता है वह उस चिन्तनके द्वारा ही ध्यान करता हुआ तृतीय मात्रारूप होकर तेजोमय सूर्यलोकमें स्थित हो जाता है। वह मृत्युके पश्चात् भी चन्द्रलोकादिके समान सूर्यलोकसे लौटकर नहीं आता, बल्कि सूर्यमें लीन हुआ ही स्थित रहता है। ‘परं चापरं च ब्रह्म’ इस अभेदश्रुतिद्वारा ओंकारका प्रतीकरूपसे आलम्बनत्व बतलाया गया है [ब्रह्मप्राप्तिमें उसका साधनत्व नहीं बतलाया गया]। अन्यथा बहुत-सी श्रुतियोंमें जो ‘ओंकारम्’ ऐसी द्वितीया विभक्ति आयी है, वह बाधित हो जायगी।
८०. प्रश्नोपनिषद् .[ प्रश्न ५
कुलस्यार्थे" (महा० उ० ३७।१७) इति न्यायेन । स तृतीयमात्रारूपस्तेजसि सूर्ये संपन्नो भवति ध्यायमानो मृतोऽपि सूर्यात्सोमलोकादिव न पुनरावर्तते किन्तु सूर्ये संपन्नमात्र एव ।यद्यपि 'ओमित्येतेन' इस पदमें तृतीया विभक्ति होनेके कारण इसका करणत्व (साधनत्व) मानना भी ठीक है तथापि 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' (कुलके हितके लिये एक व्यक्तिका त्याग कर देना चाहिये) इस न्यायसे प्रकरणके अनुसार इसे 'त्रिमात्रं परं पुरुषम्' इस प्रकार द्वितीया विभक्तिमें ही परिणत कर लेना चाहिये ।
यथा पादोदरः सर्पस्त्वचा विनिर्मुच्यते जीर्णत्वग्विनिर्मुक्तः स पुनर्नवो भवति । एवं ह वा एष यथा दृष्टान्तः स पाप्मना सर्पत्वक्स्थानीयेनाशुद्धिरूपेण विनिर्मुक्तः सामभिस्तृतीयमात्रारूपैरूर्ध्वमुन्नीयते ब्रह्मलोकं हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो लोकं सत्याख्यम् । स हिरण्यगर्भः सर्वेषां संसारिणां जीवानामात्मभूतः । स ह्यन्तरात्मा लिङ्गरूपेण सर्वभूतानां तस्मिन्हि लिङ्गात्मनि संहताः सर्वे जीवाः । तस्मात्स जीवघनः । स विद्वांस्त्रिमात्रोङ्काराभिज्ञ एतस्माज्जीवघनाद्धिरण्य-जिस प्रकार पादोदर—सर्प केंचुलीसे छूट जाता है, और वह जीर्ण त्वचासे छूटकर पुनः नवीन हो जाता है, उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, वह साधक सर्पकी केंचुलीरूप अशुद्धिमय पापसे मुक्त हो तृतीय मात्रारूप सामश्रुतियोंद्वारा ऊपरकी ओर ब्रह्मलोकको यानी हिरण्यगर्भ—ब्रह्माके सत्य नामक लोकको ले जाया जाता है । वह हिरण्यगर्भ सम्पूर्ण संसारी जीवोंका आत्मस्वरूप है । वही लिङ्गदेहरूपसे समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है । उस लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भमें ही समस्त जीव संहत हैं । अतः वह जीवघन है । वह त्रिमात्र ओंकार का ज्ञाता एवं ध्यान करनेवाला विद्वान् इस उत्तम जीवघनस्वरूप

प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


गर्भात्परात्परं परमात्मारूयं पुरुषमीक्षते पुरिशयं सर्वशरीरा- नुप्रविष्टं पश्यति ध्यायमानः । तदेतस्मिन्यथोक्तार्थप्रकाशकौ मन्त्रौ भवतः ॥ ५ ॥हिरण्यगर्भसे भी श्रेष्ठ तथा पुरिशय- सम्पूर्ण शरीरोंमें अनुप्रविष्ट परमात्मा- संज्ञक पुरुषको देखता है। इस उपर्युक्त अर्थको ही प्रकाशित करने- वाले ये दो श्लोक यानी मन्त्र हैं ॥ ५॥

ओङ्कारकी तीन मात्राओंकी विशेषता

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥

ओङ्कारकी तीनों मात्राएँ [पृथक्-पृथक् रहनेपर] मृत्युसे युक्त हैं। वे [ध्यान-क्रियामें] प्रयुक्त होती हैं और परस्पर सम्बद्ध तथा अनविप्रयुक्ता (जिनका विपरीत प्रयोग न किया गया हो—ऐसी) हैं। इस प्रकार बाह्य (जाग्रत्), आभ्यन्तर (सुषुप्ति) और मध्यम (स्वप्न-स्थानीय) क्रियाओंमें उनका सम्यक् प्रयोग किया जानेपर ज्ञाता पुरुष विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥

तिस्रस्त्रिसंख्याका अकारो-कारमकाराख्या ओङ्कारस्य मात्रा मृत्युमत्यो मृत्यु- र्यासां विद्यते ता मृत्युमंत्यो मृत्युगोचरादनतिक्रान्ता मृत्यु- गोचरा एवेत्यर्थः । ता आत्मनो <br>ओंकारकी अकार, उकार और मकार—ये तीन मात्राएँ मृत्युमती हैं। जिनकी मृत्यु विद्यमान है— जो मृत्युकी पहुँचसे परे नहीं हैं अर्थात् मृत्युकी विषयभूता ही हैं उन्हें मृत्युमती कहते हैं। ये आत्मा-
८२प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ५
ध्यानक्रियासु प्रयुक्ताः, किं चान्योन्यासक्ता इतरेतरसंबद्धाः, अनविप्रयुक्ता विशेषेणैकैकविषय एव प्रयुक्ता विप्रयुक्ताः, न तथा विप्रयुक्ता अविप्रयुक्ता नाविप्रयुक्ता अनविप्रयुक्ताः।की ध्यानक्रियाओंमें प्रयुक्त होती हैं; और अन्योन्यासक्त यानी एक-दूसरीसे सम्बद्ध हैं [ तथा ] वे 'अनविप्रयुक्ता' हैं—जो विशेषरूपसे एक विषयमें ही प्रयुक्त हों वे 'विप्रयुक्ता' कहलाती हैं, तथा जो विप्रयुक्ता न हों उन्हें 'अविप्रयुक्ता' कहते हैं और जो अविप्रयुक्ता नहीं हैं वे ही 'अनविप्रयुक्ता' कहलाती हैं।
किं तर्हि, विशेषेणैकस्मिन्ध्यानकाले तिसृषु क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थानपुरुषाभिध्यानलक्षणासु योगक्रियासु सम्यक्प्रयुक्तासु सम्यग्ध्यानकाले योजितासु न कम्पते न चलति ज्ञो योगी यथोक्तविभागज्ञ ओङ्कारस्य इत्यर्थः न तस्यैवंविदश्चलनमुपपद्यते । यस्माज्जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तपुरुषाः सह स्थानैर्मात्रात्रयरूपेणतो इससे क्या सिद्ध हुआ? इस प्रकार विशेषरूपसे एक ही बाह्य, आभ्यन्तर और मध्यम तीन क्रियाओंमें यानी ध्यानकालमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके अभिमानी [विश्व, तैजस और प्राज्ञ अथवा समष्टिरूपसे विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—इन तीनों ] पुरुषोंके अभिध्यानरूप योगक्रियाओंके सम्यक् प्रयोग किये जानेपर—सम्यग् ध्यानकालमें प्रोजित होनेपर ज्ञानी—योगी अर्थात् ओंकारकी मात्राओंके पूर्वोक्त विभागको जाननेवाला साधक विचलित नहीं होता। इस प्रकार जाननेवाले उस योगीका विचलित होना सिद्ध नहीं होता; क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके अभिमानी पुरुष अपने स्थानोंके सहित मात्रात्रयरूप ओंकार-

प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३


ओङ्कारात्मरूपेण दृष्टाः । स ह्येवं विद्वान्सर्वात्मभूत ओङ्कारमयः कुतो वा चलेत्कस्मिन्वा ॥ ६ ॥स्वरूपसे देखे जा चुके हैं । इस प्रकार सर्वात्मभूत और ओंकारस्वरूपताको प्राप्त हुआ वह विद्वान् कहाँसे और किसके प्रति विचलित होगा ? ॥ ६ ॥

ऋगादि वेद और ओङ्कारसे प्राप्त होनेवाले लोक

सर्वार्थसंग्रहार्थो द्वितीयो मन्त्रः—दूसरा मन्त्र उपर्युक्त सम्पूर्ण अर्थका संग्रह करनेके लिये है—

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं

सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते ।

तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्

यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥७॥

साधक ऋग्वेदद्वारा इस लोकको, यजुर्वेदद्वारा अन्तरिक्षको और सामवेदद्वारा उस लोकको प्राप्त होता है जिसे विज्ञजन जानते हैं । तथा उस ओंकाररूप आलम्बनके द्वारा ही विद्वान् उस लोकको प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है ॥ ७ ॥

ऋग्भिरेतं लोकं मनुष्योपलक्षितम् । यजुर्भिरन्तरिक्षं सोमाधिष्ठितम् । सामभिर्यत्तद्ब्रह्मलोकमिति तृतीयं कवयो मेधाविनो विद्यावन्त एव नाविद्वांसो वेदयन्ते ।ऋग्वेदद्वारा इस मनुष्योपलक्षित लोकको, यजुर्वेदद्वारा सोमाधिष्ठित अन्तरिक्षको और सामवेदद्वारा उस तृतीय ब्रह्मलोकको, जिसे कि कवि, मेधावी अर्थात् विद्वान्‌लोग ही जानते हैं—अविद्वान् नहीं;
८४'प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ५'
तं त्रिविधं लोकमोङ्कारेण साधनेनापरब्रह्मलक्षणमन्वेत्यनुगच्छति विद्वान् ।<br><br>तेनैवोङ्कारेण यत्तत्परं ब्रह्माक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं शान्तं विमुक्तं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिविशेषसर्वप्रपञ्चविवर्जितमत एव अजरं जरावर्जितममृतं मृत्युवर्जितमत एव यस्माज्जरादिक्रियारहितमतोऽभयम् , यस्मादेव अभयं तस्मात्परं निरतिशयम्; तदप्योङ्कारेणायतनेन गमनसाधनेनान्वेतीत्यर्थः । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ७ ॥इस क्रमसे ओंकाररूप साधनके द्वारा ही विद्वान् अपरब्रह्मस्वरूप इस त्रिविध लोकको प्राप्त हो जाता है अर्थात् इन तीनोंका अनुगमन करता है ।<br><br>उस ओंकारसे ही वह उस अक्षर सत्य और पुरुषसंज्ञक परब्रह्मको प्राप्त होता है जो शान्त अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि विशेषभावसे मुक्त तथा सब प्रकारके प्रपञ्चसे रहित है, इसीलिये जो अजर—जराशून्य अतः अमृत—मृत्युरहित है । क्योंकि वह जरा आदि विकारोंसे रहित है इसलिये अभयरूप है । और अभय होनेके कारण ही पर–निरतिशय है । तात्पर्य यह कि उसे भी वह ओंकाररूप आलम्बन यानी गमनसाधनके द्वारा ही प्राप्त होता है । मन्त्रके अन्तमें 'इति' शब्द वाक्यकी परिसमाप्तिके लिये है ॥७॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
पञ्चमः प्रश्नः ॥ ५ ॥

षष्ठ प्रश्न (षोडशकल पुरुष, सृष्टि व आचार्यवन्दना)

षष्ठ प्रश्न

सुकेशाका प्रश्न—सोलह कलाओंवाला पुरुष कौन है ?

अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन्हिर- ण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्ना- र्हाम्यनृतं वक्तुं स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥

तदनन्तर उन पिप्पलादाचार्यसे भरद्वाजके पुत्र सुकेशाने पूछा— "भगवन् ! कोसलदेशके राजकुमार हिरण्यनाभने मेरे पास आकर यह प्रश्न पूछा था—'भारद्वाज ! क्या तू सोलह कलाओंवाले पुरुषको जानता है ?' तब मैंने उस कुमारसे कहा—'मैं इसे नहीं जानता; यदि मैं इसे जानता होता तो तुझे क्यों न बतलाता ? जो पुरुष मिथ्याभाषण करता है वह सब ओरसे मूलसहित सूख जाता है; अतः मैं मिथ्याभाषण नहीं कर सकता।' तब वह चुपचाप रथपर चढ़कर चला गया । सो अब मैं आपसे उसके विषयमें पूछता हूँ कि वह पुरुष कहाँ है ?" ॥ १ ॥

अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । समस्तं जगत्कार्यकरणलक्षणं सह विज्ञानात्मना परस्मिन्नक्षरे सुषुप्तिकाले संप्र-तदनन्तर उन पिप्पलादाचार्यसे भरद्वाजके पुत्र सुकेशाने पूछा । पहले यह कहा जा चुका है कि सुषुप्तिकालमें विज्ञानात्माके सहित सम्पूर्ण कार्यकारणरूप जगत् अक्षर (अविनाशी) परम पुरुषमें लीन

८६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६


तिष्ठत इत्युक्तम्। सामर्थ्यात्प्रलयेऽपि तस्मिन्नेवाक्षरे सम्प्रतिष्ठते जगत्तत एवोत्पद्यत इति सिद्धं भवति। न ह्यकारणे कार्यस्य सम्प्रतिष्ठानमुपपद्यते।हो जाता है। इसी नियमके अनुसार यह भी सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें भी यह जगत् उस अक्षरमें ही स्थित होता है और फिर उसीसे उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि जो कारण नहीं है उसमें कार्यका लीन होना सम्भव नहीं है।
उक्तं च 'आत्मन एष प्राणो जायते' इति। जगतश्च यन्मूलं तत्परिज्ञानात्परं श्रेय इति सर्वोपनिषदां निश्चितोऽर्थः। अनन्तरं चोक्तं 'स सर्वज्ञः सर्वो भवति' इति। वक्तव्यं च क्व तर्हि तदक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं विज्ञेयमिति। तदर्थोऽयं प्रश्न आरभ्यते। वृत्तान्ताख्यानं च विज्ञानस्य दुर्लभत्वख्यापनेन तल्लब्ध्यर्थं मुमुक्षूणां यत्नविशेषोपादानार्थम्।इसके सिवा [ प्रश्न ३।३ में ] यह कहा भी है कि 'यह प्राण आत्मासे उत्पन्न होता है' तथा सम्पूर्ण उपनिषदोंका यह निश्चित अभिप्राय है कि 'जो जगत्‌का आदि कारण है उसके ज्ञानसे ही आत्यन्तिक कल्याण हो सकता है।' अभी [ प्रश्न ४।१० में ] यह कहा जा चुका है कि 'वह सर्वज्ञ और सर्वात्मक हो जाता है।' अतः अब यह बतलाना चाहिये कि 'उस पुरुषसंज्ञक सत्य और अक्षरको कहाँ जानना चाहिये?' इसीके लिये यह [ छठा ] प्रश्न आरम्भ किया जाता है। आख्यायिकाका उल्लेख इसलिये किया गया है कि जिससे विज्ञानकी दुर्लभता प्रदर्शित होनेसे मुमुक्षुलोग उसकी प्राप्तिके लिये विशेष प्रयत्न करें।

प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हे भगवन् हिरण्यनाभो नामतः कोसलायां भवः कौसल्यो राजपुत्रो जातितः क्षत्रियो माम् उपेत्योपगम्यैतद्वक्ष्यमाणं प्रश्नम् अपृच्छत । षोडशकलं षोडशसंख्याकाः कला अवयवा इव आत्मन्यविद्याध्यारोपितरूपा यस्मिन् पुरुषे सोऽयं षोडशकलस्तं षोडशकलं हे भारद्वाज पुरुषं वेत्थ विजानासि । तमहं राजपुत्रं कुमारं पृष्टवन्तमब्रवमुक्तवानस्मि नाहमिमं वेद यं त्वं पृच्छसीति ।<br><br>एवमुक्तवत्यपि मय्यज्ञानम् असंभावयन्तं तमज्ञाने कारणम् अवादिषम् । यदि कथञ्चिदहमिमं त्वया पृष्टं पुरुषमवेदिषं विदितवानस्मि कथमत्यन्तशिष्यगुणवतेऽर्थिने ते तुभ्यं नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि न ब्रूयामित्यर्थः । भूयोऽप्यप्रत्ययमिवालक्ष्य प्रत्याययितुमब्रवम् । समूलः सह मूलेन वा . . एषोऽन्यथा[ अत्र सुकेशाका प्रश्न आरम्भ होता है—] 'हे भगवन् ! कोसलपुरीमें उत्पन्न हुए हिरण्यनाभ नामक एक राजपुत्रने—जो जातिका क्षत्रिय था मेरे समीप आकर यह आगे कहा जानेवाला प्रश्न किया—'हे भारद्वाज ! क्या तू षोडशकल पुरुषको—जिस पुरुषमें, शरीरमें अवयवोंके समान, अविद्यावश सोलह कलाएँ आरोपित की गयी हों उसे षोडशकल पुरुष कहते हैं ऐसे उस सोलह कलाओंवाले पुरुषको क्या तू जानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उस राजकुमारसे मैंने कहा—'तुम जिसके विषयमें पूछते हो मैं उसे नहीं जानता ।'<br><br>ऐसा कहनेपर भी मुझमें अज्ञानकी सम्भावना न करनेवाले उस राजकुमारको मैंने अपने अज्ञानका कारण बतलाया—'यदि कहीं तेरे पूछे हुए इस पुरुषको मैं जानता तो तुझ अत्यन्त शिष्यगुणसम्पन्न प्रार्थीसे क्यों न कहता ? अर्थात् तुझे क्यों न बतलाता ?' फिर भी उसे अविश्वस्त-सा देख उसको विश्वास दिलानेके लिये मैंने कहा—'जो पुरुष अपने आत्माको अन्यथा करता हुआ अनृत—अयथार्थ
६८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
सन्तमात्मानमन्यथा कुर्वन्ननृतम् अयथाभूतार्थमभिवदति यः स परिशुष्यति शोषमुपैतीहलोकपरलोकाभ्यां विच्छिद्यते विनश्यति । यत एवं जाने तस्मान्नार्हाम्यहम् अनृतं वक्तुं मूढवत् ।<br><br>स राजपुत्र एवं प्रत्यायितः तूष्णीं व्रीडितो रथमारुह्य प्रवव्राज प्रगतवान्यथागतमेव । अतो न्यायत उपसन्नाय योग्याय जानता विद्या वक्तव्यैवानृतं च न वक्तव्यं सर्वास्वप्यवस्थासु इत्येतत्सिद्धं भवति । तं पुरुषं त्वा त्वां पृच्छामि मम हृदि विज्ञेयत्वेन शल्यमिव मे हृदि स्थितं क्वासौ वर्तते विज्ञेयः पुरुष इति ॥ १ ॥भाषण करता है वह समूल अर्थात् मूलके सहित सूख जाता है अर्थात् इस लोक और परलोक दोनोंसे ही विलग होकर नष्ट हो जाता है । मैं इस बातको जानता हूँ, इसलिये अज्ञानी पुरुषके समान मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ।<br><br>इस प्रकार विश्वास दिलाये जानेपर वह राजकुमार चुपचाप—संकुचित हो रथपर चढ़कर जहाँसे आया था वहीं चला गया । इससे यह सिद्ध होता है कि अपने समीप नियमपूर्वक आये हुए योग्य जिज्ञासुके प्रति विज्ञ पुरुषको विद्याका उपदेश करना ही चाहिये तथा सभी अवस्थाओंमें मिथ्या भाषण कभी न करना चाहिये । [सुकेशा कहता है—'हे भगवन् !] मेरे हृदयमें ज्ञातव्यरूपसे काँटेके समान खटकते हुए उस पुरुषके विषयमें मैं आपसे पूछता हूँ कि वह ज्ञातव्य पुरुष कहाँ रहता है ? ॥ १ ॥

पिप्पलादका उत्तर—वह पुरुष शरीरमें स्थित है ।

तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥

[प्रश्न ६] शाङ्करभाष्यार्थ ८९


: उससे आचार्य पिप्पलादने कहा—'हे सोम्य ! जिसमें इन सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है वह पुरुष इस शरीरके भीतर ही वर्तमान है ॥ २ ॥

तस्मै स होवाच । इहैवान्तः-शरीरे हृदयपुण्डरीकाकाशमध्ये हे सोम्य स पुरुषो न देशान्तरे विज्ञेयो यस्मिन्नेता उच्यमानाः षोडश कलाः प्राणाद्याः प्रभवन्ति उत्पद्यन्त इति षोडशकलाभिः उपाधिभूताभिः सकल इव निष्कलः पुरुषो लक्ष्यतेऽविद्ययेति तदुपाधिकलाध्यारोपापनयेन विद्यया स पुरुषः केवलो दर्शयितव्य इति कलानां तत्प्रभवत्वम् उच्यते। प्राणादीनामत्यन्तनिर्विशेषे ऽद्वये शुद्धे तत्त्वे न शक्योऽध्यारोपमन्तरेण प्रतिपाद्यप्रतिपादनादिव्यवहारः कर्तुमिति कलानां प्रभवस्थित्यप्यया आरोप्यन्ते अविद्याविषयाः । चैतन्या-उससे उस (पिप्पलादाचार्य) ने कहा—हे सोम्य ! उस पुरुषको यहीं—इस शरीरके भीतर हृदयपुण्डरीकाकाशमें ही जानना चाहिये—किसी अन्य देश (स्थान) में नहीं, जिस (पुरुष) में कि इन आगे कही जानेवाली प्राण आदि सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् जिससे ये उत्पन्न होती हैं। इन उपाधिभूत सोलह-कलाओंके कारण वह पुरुष कलाहीन होकर भी अविद्यावश कलावान्-सा दिखलायी देता है। उन औपाधिक कलाओंके अध्यारोपकी विद्यासे निवृत्ति करके उस पुरुषको शुद्ध दिखलाना है इसलिये प्राणादि कलाओंको उसीसे उत्पन्न होनेवाली कहा है, क्योंकि अत्यन्त निर्विशेष, अद्वय और विशुद्ध तत्त्वमें अध्यारोपके बिना प्रतिपाद्य-प्रतिपादन आदि कोई व्यवहार नहीं किया जा सकता । इसलिये उसमें कलाओंके अविद्याविषयक उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका आरोप किया जाता है, क्योंकि ये कलाएँ चैतन्यसे
९०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
व्यतिरेकेणैव हि कला जायमानाः तिष्ठन्त्यः प्रलीयमानाश्च सर्वदा लक्ष्यन्ते ।अभिन्न रहकर ही सर्वदा उत्पन्न स्थित तथा लीन होती देखी जाती हैं।
अत एव भ्रान्ताः केचिद् <br> <sub>आत्मचैतन्ये विकल्पाः</sub> अग्निसंयोगाद्धृतमिव घटाद्याकारेण चैतन्यम् एव प्रतिक्षणं जायते नश्यतीति तन्निरोधे शून्यमिव सर्वमित्यपरे । घटादिविषयं चैतन्यं चेतयितुर्नित्यस्यात्मनोऽनित्यं जायते विनश्यतीत्यपरे । चैतन्यं भूतधर्म इति लौकायतिकः । अनपायोपजनधर्मकचैतन्यमात्मा एव नाम रूपाद्युपाधिधर्मैः प्रत्यवभासते “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” (बृ० उ० २।४।१२) इत्यादि श्रुतिभ्यः । स्वरूपव्यभिचारिषुइसीसे कुछ भ्रान्त पुरुषोंका मत है कि 'अग्निके संयोगसे घृतके समान चैतन्य ही प्रत्येक क्षणमें घट आदि आकारोंमें उत्पन्न और नष्ट हो रहा है।' इनसे भिन्न दूसरों (शून्यवादियों) का मत है कि 'इनका निरोध हो जानेपर सब कुछ शून्यमय हो जाता है।' तथा अन्य (नैयायिक) कहते हैं कि 'चेतयिता नित्य आत्माकी घटादिको विषय करनेवाली अनित्य चेतनता उत्पन्न और नष्ट होती रहती है' तथा लौकायतिकों (देहात्मवादियों) का कथन है कि 'चेतनता भूतोंका धर्म है'। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'प्रज्ञानं ब्रह्म' 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' 'विज्ञानघन एव' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति-नाशरूप धर्मसे रहित चेतन ही आत्मा है; वही नाम-रूप आदि औपाधिक धर्मोंसे युक्त भास रहा है। अपने स्वरूपसे व्यभिचारी (बदलनेवाले)