प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ४: |
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| कर्ता विज्ञानात्मा विज्ञानं विज्ञायतेऽनेनेति करणभूतं बुद्ध्यादीदं तु विजानातीति विज्ञानं कर्तृकारकरूपं तदात्मा तत्स्वभावो विज्ञातृस्वभाव इत्यर्थः । पुरुषः कार्यकरणसंघातोक्तोपाधिपूर्णत्वात्पुरुषः । स च जलसूर्यकादिप्रतिबिम्बस्य सूर्यादिप्रवेशवज्जगदाधारशेषे परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठ ॥ ९ ॥ | वाला, कर्ता, विज्ञानात्मा—जिनसे जाना जाता है वह बुद्धि आदि ज्ञानके साधनस्वरूप हैं; किन्तु यह आत्मा तो उन्हें जानता है इसलिये यह कर्ता कारकरूप विज्ञान है । यह तद्रूप—वैसे स्वभाववाला अर्थात् विज्ञातृस्वभाव है । तथा कार्यकरणसंघातरूप उपाधिमें पूर्ण होनेके कारण यह पुरुष है । जलमें दिखायी देनेवाला सूर्यका प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जलरूप उपाधिके नष्ट हो जानेपर सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार यह द्रष्टा, श्रोता आदिरूपसे बतलाया गया पुरुष जगत्के आधारभूत पर अक्षर आत्मामें सम्यक्रूपसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥ | | तदेकत्वविदः फलमाह— | [ अक्षरब्रह्मके साथ ] उस विज्ञानात्माका एकत्व जाननेवालेको जो फल मिलता है, वह बतलाते हैं— |
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥
हे सोम्य ! इस छायाहीन, अशरीरी, अलोहित, शुभ्र अक्षरको जो पुरुष जानता है वह पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है । इस सम्बन्धमें यह श्लोक (मन्त्र) है ॥ १० ॥