प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न ४ ] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६९
| तद्विषयः, तेजश्च त्वगिन्द्रियव्यतिरेकेण प्रकाशविशिष्टा या त्वक्तया निर्भास्यो विषयो विद्योतयितव्यम्, प्राणश्च सूत्रं यदाचक्षते तेन विधारयितव्यं संग्रथनीयं सर्वं हि कार्यकारणजातं पारार्थ्येन संहतं नामरूपात्मकमेतावदेव ॥८॥ | तेज यानी त्वगिन्द्रियसे भिन्न प्रकाशविशिष्ट त्वचा और विद्योतयितव्य—उससे प्रकाशित होनेवाला विषय [ चर्म ] तथा प्राण जिसे सूत्रात्मक कहते हैं और उससे धारणं किये जानेयोग्य अर्थात् ग्रथित होनेयोग्य [ यह सब सुषुप्तिके समय आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है, क्योंकि ] पर—आत्माके लिये संहत हुआ नामरूपात्मक सम्पूर्ण कार्य-कारण-जात इतना ही है ॥ ८ ॥ |
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| अतः परं यदात्मरूपं जलसूर्यकादिवद्भोक्तृत्वकर्तृत्वेन इह अनुप्रविष्टम्— | इससे परे जो आत्मस्वरूप जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान इस शरीरमें कर्ता-भोक्तारूपसे अनुप्रविष्ट है— |
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सुषुप्तिमें जीवकी परमात्मप्राप्ति
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥
यही द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता (मनन करनेवाला), बोद्धा और कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष है। वह पर अक्षर आत्मामें सम्यक्प्रकारसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता | यही देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, |
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| घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा | चखनेवाला, मनन करनेवाला, जानने- |