BharatKosha
Back to the archive

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages
Page 142Permalink

वानस=वानप्रस्थ । बाल-खिल्य=एक प्रकार के ऋषि, पुराणों के अनुसार ह्मा के रोम से उत्पन्न ऋषि-समूह, जिनके शरीर का आकार अँगुठे के रावर है, इस समूह में ६० हजार ऋषियों की गणना है और ये सब के सब बड़े तेजस्वी है । नैमिषीय=निमिषारण्य वासी । चिन्तितमात्रोपस्थित- विपन्नैः=सोचने मात्र से आने वाले और मर जाने वाले । अभिवर्धयन्ति= सम्पन्न करते हैं । तर्पिता.=सन्तुष्ट बने । सुतफल=पुत्रजन्म के प्रयोजन को । हित्वा=नष्ट करके । जरां=बुढ़ापे को । खम्=स्वर्ग मे । उपयान्ति=चले जाते हैं । दीप्यमानाः=तेज से चमकते हुए । समुपयान्ति=प्राप्त करते हैं । आवर्तिभिः= जन्म मरण के चक्र वाले । विषयैः=भोग विलास की वस्तुओ से । बलात् = जबर्दस्ती । ध्रियन्ते = खीचे जाते है । आपृच्छ=विदा ले लो । पुत्रकृतकान् = पुत्र तुल्य पाले जाने वाले । विन्ध्यं=विन्ध्य पर्वत से । सखी =सखियां बनी । दयिता =प्रिय (स्त्रीलिंग, द्वितीया, बहुवचन) । लताः =वल्लरियों से । वत्स्यामि = निवास करू गा । हिमवद्गिरिकाननेषु=हिमालय के वनों मे । दीप्तंः इव = प्रज्वलित हुई के समान । ओषधिवनं =वनस्पतियो के वन वाले । उपरंजितेषु=प्रकाशमान । अतिमनोरथेन=मानुषी सीमा के पार वाली अभि- लाषा से । दृश्यन्ते=देखे जाते है । सौवर्णान्=काचनपार्श्व नामक । दर्शयिष्यति =दिखाएगा । भिन्न =विदीर्ण हुआ । क्रौञ्चत्वम्=क्रौंच पर्वत तुल्य दशा को (एक बार परशुराम और कार्तिकेय दोनो महादेव से अस्त्र वेद का सविधि अध्ययन कर रहे थे । इनमें विद्या के तारतम्य का संघर्ष उपस्थित हुआ। महादेव ने परीक्षा के लिए तय किया कि जो इस पर्वत को वाणों द्वारा भेद देगा, उसे प्राथम्य प्राप्त होगा । परशुराम ने ऐसा ही किया ।) अवलेपः= शूरवीरता का गर्व । विद्युत्सम्पात =बिजली की चमक । इहस्थम्=यही विद्यमान । वृद्धि =प्रभाव । दिष्ट्या=सौभाग्य से (अव्यय) । वर्धते=विजयते । अर्हति = योग्य है । ब्रूहि=कहो । अन्वय—उभयस्य सान्निध्यम् अस्ति, एतत् यदि साधयिष्यति । तपसि श्रान्ते धनुः वा धनुषि श्रान्तेः । (६) अन्वय—तैः तर्पिताः पितरः सुतफलं लभन्ते, हि दीप्यमानाः जरां हित्वा खम् उपयान्ति । सुरैः तुल्यं विमान वासं समुपयान्ति च आवर्तिभिः विषयैः बलात् न ध्रियन्ते । (१०)

Page 143Permalink

( 152 ) अन्वय-पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमान् विन्ध्यं वनं तव दयिता. मखी लताः च आपृच्छ । दीप्तैः इव ओषधिवनैः उपरजितेपु तेपु हिमवद्गिरि काननेषु वत्स्यामि । (११) अन्वय-हिमवान् तान् सौवर्णान् मृगान् मे दर्शयिष्यति, वा मद्बाण- वेगेन भिन्नः क्रौञ्चत्वम् गमिष्यति । (१२) अन्वय-यदि इह स्वयम् आगतः, एतानि तातस्य भाग्यानि । हि एषः पूजायाम् अर्हति । मैथिलि, लक्ष्मण ब्रूहि । (१३) हिन्दी अर्थ रावण-आपने सभी वेद-शास्त्रो को छोट कर श्राद्धकल्प में विशेष उत्कण्ठा प्रकट की है। ऐसा क्यो ? राम-श्रीमन्, पिता से विहीन होने के कारण अभी इसी का ज्ञान अपेक्षित है। रावण-आप संकोच मत करें। आप पूछिए। राम-भगवन्, पिण्डदान के समय पितरों को किससे तृप्त करूॅ ? - रावण-जो कुछ श्रद्धा से दिया जाए, वह श्राद्ध कहलाता है । राम-भगवन्, अनादर से दी गई वस्तु तो परित्यक्त होती है। मेरा प्रश्न विशेष वस्तु के विषय में है। रावण-सुनो, घासो में कुश, ओषधियों में तिल, शाको में मटर, मछलियों मे मगरमच्छ, पक्षियो में वार्ध्रीणस, पशुओ में गाय या गैंडा। ये सारी चीजें मनुष्यो के लिए कही गई है । राम-भगवन् "वा" शब्द से लगता है कि कुछ और वस्तु भी शेष बची है। रावण-हाँ है, किन्तु उसे तो कोई प्रतापी व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है। राम-भगवन्, यही तो मेरा निश्चय है। इस कार्य को पूरा करने के लिए दोनो साधन मेरे पास हैं। यदि तप असफल हुआ तो धनुष और धनुष के असफल होने पर तप। (६) रावण-हैं। किन्तु उनका निवास हिमालय पर है। राम-हिमालय पर। अच्छा इसके आगे। रावण-उनका नाम कांचनपाश्र्व नामक हिरण है। वे हिमालय की मातवी चोटी पर माक्षात् महादेव के मस्तक से गिरने वानी गंगा का जल

Page 144Permalink

( 153 ) पीते हैं। उनकी पीठ वैदूर्य मणि की भाँति श्याम वर्ण की है। वे वायु के समान शीघ्रगामी है। वैखानस, बालखिल्य तथा नैमिषा- रण्य मे रहने वाले ऋषि गण ध्यान मात्र से ही उन्हे बुला कर श्राद्ध कर्म करते है। उनसे तर्पित होकर पितर गण पुत्र के फल को प्राप्त करते हैं। फिर प्रकाशमान कान्ति वाले वृद्धावस्था को त्याग कर सीधे स्वर्ग चले जाते हैं। वहाँ वे देवताओं के साथ विमान में रहते हैं और आवा- गमन की वासना से बलपूर्वक खींचे नहीं जाते। (१०) राम—सीते, अपने पुत्र के समान पाले-पोसे गए हरिणों और वृक्षों से, विन्ध्य पर्वत तथा इसके वन से, अपनी प्रिय सखियों के समान लताओं से तुम विदा ले लो। मैं अब यहां से जाकर चमकने वाली जड़ी बूटियों से भासित हिमालय पर निवास करूंगा। अतः वहा जाना है। (११) सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा। रावण—राम, अधिक मनोरथ मत बढ़ाओ। वे हिरण मनुष्यों को न दिखाई देते हैं। राम—भगवान्, क्या वे हिमालय पर रहते हैं ? रावण—और क्या ? राम—तो फिर आप देखिए— या तो हिमालय उन कांचन मृगों को लाकर मेरे सामने उपस्थित करेगा अथवा मेरे बाणों द्वारा विदीर्ण होकर क्रौञ्च पर्वत की दशा को प्राप्त करेगा। (१२) रावण—(स्वगत) अहो, इसका घमण्ड तो सहा नही जाता (प्रकट) अरे, बिजली की चमक सी दिखाई दे रही है। हे राम, तुम्हारे यही रहने पर भी हिमालय तुम्हारा आदर कर रहा है। यह कांचनपार्श्व मृग है। राम—यह तो आपका प्रभाव है।

Page 145Permalink

( 156 ) राम-- तब तो मैं ही जाऊँगा । सीता-आर्यपुत्र, मैं क्या करूँगी ? राम-भगवान् (इस संन्यासी) की सेवा । सोता-जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । ( राम निकल जाते हैं ) रावण--अरे, यह राम अभी तो मेरे लिए अर्घ्य लेकर आ रहे थे और ये अब बिना पूजा किए ही दौड़ते हुए हरिण को देखकर उस पर धनुष चढ़ा रहे हैं । अहा, कैसी असीम शक्ति, कैसा असीम पराक्रम, कैसा असीम धैर्य और कैसा असीम वेग है । "राम" इन थोड़े से अक्षरों से मानो उचित रूप मे ही यह पूरा संसार व्याप्त हो रहा है । (१४) यह हरिण एक ही छलांग मे वाण के निशाने से बाहर होकर घने वन में घुस गया । सीता-(अपने मन मे) यहां पर पतिदेव के अभाव मे मुझे भय लग रहा है । रावण-(अपने मन मे) राम को छल-कपट से दूर करने पर मैं इस आश्रम से अकेली रोती हुई बाला सीता को मन्त्र के उच्चारण से शून्य आहुति की भांति हरण करता हूँ । (१५) सीता-तो फिर पर्णशाला में प्रवेश करती हूँ । (जाना चाहती है) रावण-(अपना रूप धारण करके) सीते ठहरो, ठहरो । सीता-(डर कर) यह अब कौन है ? रावण-क्या तू नहीं जानती ? युद्ध में जिसने दानवों और देवताओं को परास्त किया, जिसने इन्द्र आदि को जीता, जिसने शूर्पणखा की नासिका भंग को देखा, जिसने खर और दूषण भाइयों का मारा जाना सुना, वही मैं रावण इस समय गर्व से दुष्ट बुद्धि एवं अतुलनीय शक्ति वाले राम को माया से ठग कर हे विशाल नेत्रों वाली सीते, तुम्हे हर कर ले जाने के लिए उपस्थित हुआ हूँ । (१६) (5) मूल सीता--हं रावणो नाम । (प्रतिष्ठते) रावणः--आः ! रावणस्य चक्षुर्विषयमागता क्व यस्यासि ? सीता--आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व । परित्रायस्व ।

Page 146Permalink

(157) रावणः—सीत ! श्रूयतां मत्पराक्रमः । भग्नः शक्रः कम्पितो वित्तनाथः कृष्टः सोमो मर्दितः सूर्यपुत्रः ।— धिग् भोः स्वर्गं भीतदेवैर्निविष्टं धन्या भूमिर्वर्तते यत्र सीता ॥ (१७) सीता—आर्यपुत्रे !—परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व परित्रायस्व माम् । रावणः— रामं वा शरणमुपेहि लक्ष्मणं वा स्वर्गस्थं दशरथमेव वा नरेन्द्रम् । किं वा स्यात् कुपुरुषसंश्रितैर्वचोभि र्न व्याघ्रं मृगशिशवः प्रधर्षयन्ति ॥ (१८) सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व परित्रायस्व माम् । रावणः—विलपसि किमिदं विशालनेत्रे विगणय मा च यथा तवार्यपुत्रम् । विपुलबलयुतो ममैव योद्धुं ससुरगणोऽप्यसमर्थ एव रामः ॥ (१६) सीता—(सरोषम्) शप्तोऽसि । रावणः—अहह ! अहो पतिव्रतायास्तेजः । योऽहमुत्पतितौ वेगान्न दग्धः सूर्यरश्मिभिः । अस्या परिमितैर्दग्धः शप्तोऽसीत्यभिरक्षरैः !। (२०) सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । रावणः—(सीतां गृहीत्वा) भो भोः । जनस्थानवासिनस्तपस्विनः शृण्वन्तु भवन्तः । बलादेष दशग्रीवः सीतामादाय गच्छति । क्षात्रधर्मे यदि स्निग्धः यिङ्कुम् रामः पराक्रम ॥ (२१) सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व । परित्रायस्व रावणः—(परिक्रामन् विलोक्य) अये ! स्वपक्षपवनोत्क्षेपक्षुभितव षण्डश्चण्डचञ्चुरभिधावत्येष जटायुः । आः ! तिष्ठेदानीम्

Page 147Permalink

( 160 ) सीता—आर्य पुत्र, बचाओ, बचाओ । हे लक्ष्मण, मुझे बचाओ, बचाओ । रावण—हे दीर्घ नेत्रों वाली सीते, इस तरह क्यों विलाप कर रही हो ? जिस प्रकार तुम्हारे पतिदेव हैं, मुझे भी वैसे ही समझो । यह राम मुझसे लड़ने मे असमर्थ है, भले ही बहुत अधिक शक्ति से युक्त एवं देवताओ के समूह के साथ ही क्यों न हो । (१६) सीता—(क्रोध में) मैं तुझे शाप देती हूं । रावण—अहा हा, वाह रे पतिव्रता का तेज । जो मैं आकाश मे चलते समय सूर्य की किरणो से भी नही जलता, वह इसके "मै शाप देती हूँ" इन थोडे से अक्षरो से कैसे जलूँगा । (२०) सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो । रावण—(सीता को लेकर) अरे रे, जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप लोग सुनें । यह रावण सीता को बलपूर्वक लेकर जा रहा है । यदि राम को क्षात्र धर्म पर कुछ आस्था हो, तो वह अपना पराक्रम प्रकट करें । (२१) सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो । रावण—(घूमते हुए देख कर) अरे, अपने पंखो की तेज वायु से सारे वनवृक्षों को कम्पित कर देने वाला ओर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी तरफ ही दौट रहा है । अरे, जरा ठहर तो, मैं अपने हाथो मे तीखी तलवार को निकाल कर तेरे पंखो को काटता हूँ ओर तुझे खून से भिगो कर यमलोक भेजता हूँ । (२२) (दोनो का प्रस्थान) पाँचवाँ अंक समाप्त

Page 148Permalink

षष्ठ अङ्क (१) मूल (ततः प्रविशतो वृद्धतापसौ) उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः ! प्रथमः—इयं हि नीलोत्पलदामवर्चसा, मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना । निशाचरेन्द्रेण निशार्धचारिणा मृगीव सीता परिभूय नीयते ॥ (१) द्वितीयः—एषा खलु तत्रभवती वैदेही, विचेष्टमानेव भुजङ्गमाङ्गना विधूयमानेव च पुष्पिता लता । प्रसह्य पापेन दशाननेन सा तपोवनात् सिद्धिरिवापनीयते ॥ (२) उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः । प्रथमः—(ऊर्ध्वमवलोक्य) अये वचनसमकाल एव दशरथस्यानृण्यं कर्तुम् “मयि स्थिते क्व यास्यसी” ति रावणमाहूयान्तरिक्ष- मुत्पतितो जटायुः । द्वितीयः—एष रोषादुद्वृत्तनयनः प्रतिनिवृत्तो रावणः । प्रथमः—एष रावणः । द्वितीयः—एष जटायुः । उभौ—हन्तैतदन्तरिक्षे प्रवृत्तं युद्धम् । प्रथमः—काश्यप ! काश्यप ! पश्य क्रव्यादीश्वरस्य सामर्थ्यम् । पक्षाभ्यां परिभूय वीर्यविषयं द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णमचलः संवेष्टनं चेष्टते ।

Page 149Permalink

तीक्ष्णैरायसकण्टकैरिव नखैर्भीमान्तरं वक्षसो वज्राग्रैरिव दार्यमाणविषमाच्छैलाच्छिला पाट्यते ॥ (३) द्वितीयः—हन्त ! सक्रुद्धेन रावणेनासिना क्रव्यादीश्वरः स दक्षिणां- संदेशे हतः । उभौ—हा धिक् । पतितोऽत्रभवान् जटायुः । प्रथमः—भोः कष्टम् । एष खलु तत्रभवान् जटायुः । कृत्वा स्ववीर्यसदृशं परमं प्रयत्नं क्रीडामयूरमिव शत्रुमुचिन्तयित्वा । दीप्तं निशाचरपतेरवधूय तेजो नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इवावसन्नः ॥ (४) उभौ—स्वर्ग्योऽयमस्तु । प्रथमः—काश्यप ! आगम्यताम् । इमं वृत्तान्तं तत्रभवते राघवाय निवेदयिष्यावः । द्वितीयः—बाढम् । प्रथमः कल्पः । (निष्क्रान्तौ) (विष्कम्भः) शब्दार्थ—परित्रायता = सीता की रक्षा करो । भवन्त = हे जन- स्थान के रहने वालो । नीलोत्पलदामवर्चसा = नील कमलों की माला के समान तेज वाला । मृणालशुक्ला = कमल तन्तु के समान श्वेत । उज्ज्वल- दंष्ट्रहासिना = हँसते समय चमकीले दाँतो वाला । निशाचरेन्द्रेण = रावण के द्वारा । निशार्धचारिणा = चोर के द्वारा । मृगीव - हरिणी की भाँति । परिभूय -- दुःख देकर । नीयते = ले जाई जा रही है । विचेष्टमाना = छट- पटाती हुई । भुजङ्गमाङ्गना = सर्पिणी । विधूयमाना = काँपती हुई । पुष्पिता = खिली हुई । प्रसह्य = बलपूर्वक । पापेन = बुरा कार्य करने वाले । दशाननेन = रावण के द्वारा । सिद्धिः = तपस्या की फल सम्पत्ति । अपनीयते = अपहरण की जा रही है । वचनसमकाले = बोलने के साथ ही । आनृण्यम् = मित्रता का बदला । कर्तुम् = चुकाने के लिए । यास्यसि = जाओगे ।

Page 150Permalink

प्राहूय = आवाहन करके अर्थात् बुला कर । अन्तरिक्ष = आकाश में । उत्पतितः = उड़ गया । रोषात् = क्रोध से । उद्वृत्तनयन. = आँखें निकाल कर । प्रतिनिवृत्तः = वापस लौटा । जटायुः = गिद्ध, सम्पाति का भाई । प्रवृत्त = प्रारम्भ हो गया । काश्यप = एक वृद्ध तापस का नाम । क्रव्यादीश्व- रस्य = क्रव्याद = कच्चे मास को खाने वाला, उसका ईश्वर = स्वामी अर्थात् जटायु के । सामर्थ्यम् = शक्ति । पक्षाभ्यां = दोनो पक्षों से । परिभूय = मार कर । वीर्यविषयं = अपने पराक्रम के लक्ष्य को । द्वन्द्वं = रावण से । प्रति- व्यूहते = युद्ध कर रहा है । तुण्डाभ्या = दोनों चोचो से । सुनिघृष्टतीक्ष्णम् = अच्छी तरह घिसी होने से तीखी बनी । अचल. = धीर । संवेष्टनं = भली पकड़ के साथ । चेष्टते = प्रयास कर रहा है। तीक्ष्णैः = तीखे । आयसकण्टकैः = लौह निर्मित कीले । भीमान्तर = भयंकर अन्त स्थित मास आदि । वक्षसः = छाती से । वज्राग्रैः = वज्र की नोक के तुल्य । दार्यमाणविषमात् = फाडने से अन्दर की वस्तु के प्रत्यक्ष हो जाने से भीषण । शैलात् = पर्वत से । शिला = पत्थर के समान । पाट्यते = तोड कर ले रहा है । असिना = तलवार से । दक्षिणासदेशे = दाहिने कन्धे की ओर । हतः = मार डाला । पतितः = गिर पड़ा । स्ववीर्यसदृश = अपनी शक्ति के अनुसार । परमं = उत्तम । क्रीडामयूरं = खेलने के मोर की तरह । अचिन्तयित्वा = नही गिन कर । दीप्तं = भली प्रकार से प्रज्वलित । निशाचरपतेः = रावण के । अव- धूय = तिरस्कार करके । तेज. = पराक्रम को । नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इव = हाथी द्वारा तोडे गए जंगल के वृक्ष के समान । अवसन्नः = नष्ट हो गया । स्वर्ग्यः = स्वर्ग के योग्य । वृत्तान्त = समाचार को । बाढम् = उचित । प्रथमः मुख्य । कल्प. = प्रस्ताव । अन्वय—नीलोत्पलदामवर्चसा मृणालशुक्ला उज्ज्वलदंष्ट्रहासिना निशार्धधारिणा निशाचरेन्द्रेण इयं सीता मृगी इव परिभूय नीयते हि । (१) अन्वय—विचेष्टमाना भुजगमांगना इव च विधूयमाना पुष्पिता लता इव सा सिद्धिः इव पापेन दशाननेन तपोवनात् प्रसह्य नीयते । (२) अन्वय—(अयम्) पक्षाभ्या परिभूय वीर्यविषय द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते, अचलः तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णम् संवेष्टनं चेष्टते, आयसकण्टकैः इव तीक्ष्णैः

Page 151Permalink

( 164 ) नखैः वक्षसः भीमान्तर वज्राग्रैः दार्यमाणविष्मृात् शैलात् शिला पाट्यते । (३) अन्वय-(एषः) शत्रुम् क्रीडामयूरम् इव अचिन्तयित्वा । स्ववीर्यस परमं प्रयत्न कृत्वा, निशाचरपतेः दीप्त तेजः अवधूय नागेन्द्रभग्नवनवृक्षः अवसन्नः । (४) हिन्दी अर्थ (इसके बाद दो वृद्ध तपस्वी प्रवेश करते है) दोनो—आप लोग बचाइए, बचाइए । पहला—यह सीता रावण के द्वारा बलपूर्वक हरी जा रही है, जैसे सिंह के द्वारा कोई हरिणी हो । यह रावण नील कमलों की माला के समान श्याम वर्ण का है । हँसने के समय कमल तन्तु की तरह श्वेत दन्त पंक्ति वाला है एव आधी रात को विचरण करने वाला है । (१) दूसरा—यह देवी सीता, छटपटाती हुई नागिन की तरह, कांपती हुई पुष्पलता की तरह, पापी (२) दशानन रावण के द्वारा तपोवन से तपस्या की फल सिद्धि की तरह जबर्दस्ती ले जाई जा रही है । (२) दोनों—आप लोग बचाइए, बचाइए । पहला—(ऊपर देख कर) अरे, हमारे पुकारते ही यह जटायु दशरथ से उऋण होने के लिए "मेरे रहते तू कहाँ जायेगा" इस तरह रावण को ललकार आकाश मे उड़ा । दूसरा—यह रावण क्रोध से आंखें निकाल कर वापस लौटा । पहला—यह रावण है । दूसरा—यह जटायु है । दोनों—हाय, आकाश मे ही युद्ध छिद गया । पहला—काश्यप, काश्यप, गृध्रराज जटायु के पराक्रम को देखो । यह अपने पखो से रावण पर प्रहार करता हुआ उससे वीरतापूर्वक द्वन्द्व युद्ध कर रहा है । खूब डट कर अपने तीखे चंचु युगल द्वारा उसे काट खाने की चेष्टा कर रहा है। वह लौह कण्टक युक्त नखो से रावण की छाती पर भयानक तथा विस्तृत घाव इस तरह पैदा कर

Page 152Permalink

रहा है, मानो वज्र की नोकों द्वारा कठोर शिला फाड़ी जा रही हो । (३)

  • अरे, क्रोधित रावण ने जटायु के दाहिने कन्धे पर तलवार का प्रहार कर दिया ।
  • हाय, धिक्कार है । यहं जटायु तो गिर पड़ा । ला - अरे, बड़ा दुख है । यह पूज्य जटायु 'सचमुच में—अपने पराक्रम के समान पूरी तरह से प्रयास करके, खिलौने के बने मोर के समान शत्रु रावण की परवाह न करके, राक्षसराज की प्रचण्ड शक्ति को दबा कर उसी प्रकार समाप्त हो गया है, जैसे किसी गजराज के द्वारा उत्पादित कोई वन वृक्ष उखाड़ कर फेंका गयां हो । (४) दोनों—इसे स्वर्ग प्राप्त हो । पहला—काश्यप, आओ । ये समाचार श्री राम को दे । दूसरा—अच्छा । यह तो पहला काम है । (दोनों निकल जाते है) (विष्कम्भक समाप्त हुआ) (2) मूल (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः) काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ? (प्रविश्य) प्रतिहारी—आर्य ! ग्रहं विजया । किं क्रियताम् ? काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यता निवेद्यता भरतकुमाराय- "एष खलु रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान् सुमन्त्र" इति । प्रतिहारी—आर्य ! अपि कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ? काञ्चुकीयः—भवति ! न जाने । हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम् दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥ (५) प्रतिहारी—आर्य ! एतच्छ्रुत्वा पर्याकुलमिव मे हृदयम् । काञ्चुकीयः—भवति ! किमिदानीं स्थिता ? शीघ्रं निवेद्यताम् । प्रतिहारी—आर्य ! इयं निवेदयामि । (निष्क्रान्त)
Page 153Permalink

( 166 ) काञ्चुकीयः— (विलोक्य) अये ! अयमत्रभवान् भरतकुमारः सुमन्त्रागमनजनितकुतूहलहृदयश्चीरवलकलवसनश्चित्रजटा- पुञ्जरितोत्तमाङ्ग इत एवाभिवर्तते । य एषः- प्रख्यातसद्गुणगणः प्रतिपक्षकाल स्तिग्मांशुवंशतिलकस्त्रिदशेन्द्रकल्पः । आज्ञावगादखिलभूपरिरक्षणस्थः श्रीमानुदारकलभेभसमानयानः ॥ (६) (ततः प्रविशति भरतः प्रतिहारी च) भरतः-—विजये ! एवमुपगतस्तत्रभवान् सुमन्त्रः ? गत्वा तु पूर्वमयमार्थनिरीक्षणार्थम् लब्धप्रसादशपथे मयि सन्निवृत्ते । दृष्ट्वा किमागत इहात्रभवान् सुमन्त्रो रामं प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् ॥ (७) काञ्चुकीयः-- (उपगम्य) जयतु कुमारः । भरतः—अथ कस्मिन् प्रदेशे वर्तते तत्रभवान् सुमन्त्रः ! काञ्चुकीय.—असौ काञ्चनतोरणद्वारे । भरतः—तेन हि शीघ्रं प्रवेश्यताम् । काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति कुमार. । (निष्क्रान्तः) शब्दार्थ-कांचन=सुवर्णरचित । तोरणद्वारं=बाहर का दरवाजा । अशून्यं कुरुते=सूने से रहित कर रहा है अर्थात् विद्यमान है । प्रतिहारी= द्वारपालिका । विजया=द्वारपालिका का नाम । क्रियताम्=किया जाए । निवेद्यतां=निवेदन करो । रामदर्शनार्थम्=राम से मिलने के लिए । जनस्थानं= स्थान का नाम । प्रतिनिवृत्तः=वापस लौटे हैं । प्रस्थितः=गए हुए । कृतार्थः= सफल मनोरथ वाले । अपि=क्या (अपि जब वाक्य के प्रारम्भ मे प्रयुक्त होता है, तो प्रश्न वाचक हो जाता है) । भवति=हे देवी । जाने=जानता हूँ । शोषितमाननं = सूखे मुह वाले । आकुलम्=व्यग्र । जनितं=उत्पन्न । कुतूहल= उत्कण्ठा । चीरवलकलवसनं=वृक्ष की त्वचा के वस्त्र पहनने वाले । चित्र= नाना प्रकार की । जटापुञ्ज=जटाओ का समूह । पुञ्जरितोत्तमाङ्गः=पीले रंग के शिर वाले । इत एव=इधर ही । अभिवर्तते=आ रहे है । प्रख्यातसद्गुण

Page 154Permalink

( 167 ) ...गणः = सुप्रसिद्ध अच्छे गुणों का समूह । प्रतिपक्षकालः = शत्रुओं के लिए मृत्यु । तिग्मांशुवंशतिलकः = सूर्य वंश का भूषण भूत । त्रिदशेन्द्रकल्पः = इन्द्र से कुछ कम । आज्ञावशात् = राम के आदेश के अनुरोध से । अखिलभूपरि- रक्षणस्थः = सारी भूमि के पालन के अधिकार में स्थित । श्रीमान् = प्रशस्त लक्ष्मी वाले । उदारकलभेभसमानयानः = प्रशस्त ३० वर्ष के हाथी के समान गति वाले । उपगतः = आ गए हैं । लब्धप्रसादशपथे = पादुका रूप कृपा और १४ वर्ष बाद राज्य ले लूँगा रूपी सौगन्ध को ग्रहण करने वाले । मयि संनिवृत्ते = मेरे राम के पास से लौटने पर । प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् = प्रजा के नेत्र और बुद्धि के लिए सुन्दर बने (राम को) । अन्वय—अधुना हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननम् आगतं सुमन्त्र दृष्ट्वा एवं मे मनः आकुलम् आसीत् (५) अन्वय—प्रख्यातसद्गुणगणः प्रतिपक्षकालः तिग्मांशुवंशतिलकः त्रिद- शेन्द्रकल्पः आज्ञावशात् अखिलभूपरिरक्षणस्थः श्रीमान् उदारकलभेभसमान- यानः (भरतोऽस्ति) । (६) अन्वय—लब्धप्रसादशपथे मयि संनिवृत्ते अयम्, अत्रभवान् सुमन्त्रः पूर्वम् आर्यनिरीक्षणार्थम् गत्वा प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् 'रामं' दृष्ट्वा इह आगतः किम् । (७) हिन्दी अर्थ (कंचुकी का प्रवेश) काञ्चुकीय—अरे, यहा कौन है ? काञ्चन तोरण द्वार पर कौन उपस्थित है ? (प्रवेश करके) प्रतिहारी—आर्य, मैं विजया हूँ । क्या किया जाए ? काञ्चुकीय—विजये, कुमार भरत से कहो कि राम से मिलने के लिए जनस्थान गए हुए श्री सुमन्त्र वापस लौट आए हैं । प्रतिहारी—आर्य, क्या तात सुमन्त्र सफल मनोरथ होकर आए हैं । काञ्चुकीय—हे देवी, मुझे पता नहीं । अभी आए हुए सुमन्त्र को देख कर मेरा मन व्याकुल हो रहा है । उनका मुख हृदय मे विद्यमान दुःख रूपी अग्नि से सूखा हुआ है । (५)

Page 155Permalink

प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/blank) है, इसमें कोई पाठ (text) दिखाई नहीं दे रहा है। कृपया सही अथवा स्पष्ट चित्र पुनः साझा करें।

Page 156Permalink

[Page 169]

श्रुत इह स च मैथिलीप्रणाशो गुण इव बह्वपराद्धमायुषा मे ॥ (८) प्रतिहारी-(सुमन्त्रमुद्दिश्य) एत्वेत्वार्यः । एष भर्ता । उपसर्पत्वार्यः सुमन्त्रः-(उपसृत्य) जयतु कुमारः । भरतः-तात ! अपि दृष्टस्त्वया लोकाविष्कृतपितृस्नेहः । अपि दृष्टं द्विधाभूतमरुन्धतीचारित्रम् । अपि दृष्ट त्वया निष्कारणा- वहितवनवासं सौभ्रात्रम् । (सुमन्त्रः सचिन्तस्तिष्ठति) प्रतिहारी-भर्तृदारकः खल्वार्यम् पृच्छति । सुमन्त्रः-भवति ! किं माम् ? भरतः-(स्वगतम्) अतिमहान् खल्वायासः । सन्तापाद् भ्रष्ट- हृदयः । (प्रकाशम्) अपि मार्गात् प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान् ? सुमन्त्रः-कुमार ! त्वन्नियोगाद् रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः कथमहमन्तरा प्रतिनिवर्तिष्ये । भरतः-किन्नु खलु क्रोधेन वा लज्जया वात्मानं न दर्शयन्ति ? सुमन्त्रः-कुमार ! कुतः क्रोधो विनीतानां लज्जा वा कृतचेतसाम् । मया दृष्टं तु तच्छून्यं तैर्विहीनं तपोवनम् ॥ (९) भरतः अथ क्व गता इति श्रुताः । सुमन्त्रः-अस्ति किल किष्किन्धा नाम वनौकसां निवासः । तत्र गता इति श्रुताः । भरतः-हन्त ! अविज्ञातपुरुषविशेषाः खलु वानराः दुःखिता प्रति- वसन्ति । सुमन्त्रः-कुमार ! (तिर्यग्योनयोऽप्युपकृतमवगच्छन्ति ।) भरतः-तात ! कथमिव । सुमन्त्रः-सुग्रीवो भ्रंशितो राज्याद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन वालिना । हृतदारो वसञ्शैले तुल्यदुःखेन मोक्षितः ॥ (१०) भरतः-तात ! कथं तुल्यदुःखेन नाम ?

Page 157Permalink

( 170 )

सुमन्त्रः—(आत्मगतम्) हन्त ! सर्वमुक्तमेव मया । (प्रकाशम्) कुमार ! न खलु किञ्चित् । ऐश्वर्यभ्रंशतुल्या समाभिप्रेता । भरतः—तात ! किं गूहसे ? स्वर्गं गतेन महाराजपादमूलेन शापितः स्याः, यदि सत्यं न ब्रूयाः । सुमन्त्रः—का गतिः । श्रूयताम् । वैरं मुनिजनस्यार्थे रक्षसा महता कृतम् । सीता मायामुपाश्रित्य रावणेन ततो हृता ॥ (११) शब्दार्थ—नरपतिनिधनं = दशरथ की मृत्यु । मया = मुझ सुमन्त्र के द्वारा । अनुभूतं = प्रत्यक्ष की गई । नृपतिसुतव्यसनं = राम का वनवास जन्य दुःख । श्रुतः = ज्ञात हुआ । इह = इस उम्र में । स = वह प्रसिद्ध । मैथिलीप्रणाशः = सीता का हरण । उद्दिश्य = लक्ष्य करके । एतु = आयो भर्ता = स्वामी भरत । उपसर्पतु = समीप में आयो । लोकाविष्कृतपितृस्नेहः = संसार में पिता की भक्ति को प्रकट करने वाले राम । द्विधाभूतम् = दूसरे रूप में स्थित । अरुन्धतीचा- रित्रम् = वसिष्ठ की पत्नी का पातिव्रत्य अर्थात् सीता । निष्कारणविहितवन- वासं = बिना कारण के वनवास भोगने वाले । सौभ्रात्रम् = भाई का स्नेह अर्थात् लक्ष्मण । सचिन्त. = चिन्ता युक्त । भर्तृदारकः = राजकुमार भरत । अतिमहान् = अत्यधिक । आयामः = खेद । सन्तापात् = शोक से । भ्रष्टहृदयः = चंचल चित्त वाले । प्रतिनिवृत्तः = वापस आ गए । नियोगात् = आज्ञा से । अन्तरा = बीच से ही । विनीतानां = नम्र व्यक्तियों को । कृतचेतसां = सुसंस्कृत चित्त वालों को । तच्छून्यं = तत् + शून्यं = उनसे रिक्त । विहीन = विरहित । श्रुताः = सुना है । किष्किंधा = नगरी का नाम वालि-सुग्रीव की राजधानी । वनौकसां = वानरों का । निवासः = आवास स्थान । अविज्ञातपुरुषविशेषाः = मनुष्यों के तारतम्य को न जानने वाले । दुःखिताः = पीड़ित । तिर्यग्योनयः = कीट आदि पशु । उपकृतं = उपकार को । अवगच्छति = समझते हैं । भ्रंशितः राज्यात् = राज लक्ष्मी से अपहृत हुआ । ज्येष्ठेन = बड़े । हृतदारः = पत्नी का अपहरण हो जाने वाला । वसञ्छैले = वसन् + शैले = पर्वत पर रहते हुए । तुल्यदुःखेन = समान कष्ट से । मोक्षितः = छुड़ा दिया गया । अभिप्रेता = कहने का आशय । गूहसे = छिपा रहे हो । शापितः स्याः = तुमको सौगन्ध है । ब्रूयाः

Page 158Permalink

( 171 ) =तुमने कहा। गतिः=अवस्था। अर्थे=लिए। महता रक्षसा=बलवान् राक्षस रावण के साथ। मायां=कपट को। उपाश्रित्य=ग्रहणं करके। ततः=इसके बाद। हृता=चुराई गई। अन्वय—मया नरपतिनिधनम् अनुभूतम्। मया एव नृपतिसुतव्यसनं दृष्टम्। च इह सः मैथिलीप्रणाशः श्रुतः। मे आयुषा गुण इव बहु अपराद्धम्। (८) अन्वय—विनीतानां क्रोधः कुतः। वा कृतचेतसां लज्जा। मया तैः विहीनम् तत् शून्यं तु तपोवनं दृष्टम्। (६) अन्वय—ज्येष्ठेन भ्रात्रा वालिना राज्यात् भ्रंशित. हतदारः शैले वसन् सुग्रीवः तुल्यदुःखेन मोक्षितः। (१०) अन्वय—मुनिजनस्य अर्थे महता रक्षसा वैरं कृतम्, ततः रावणेन मायां उपाश्रित्य सीता हृता। (११) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुमन्त्र और प्रतिहारी का प्रवेश) सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) अरे, बड़ा दुःख है। मैने राजा दशरथ की मृत्यु का अनुभव किया। मैंने ही राम का वनवास भी देखा। अब यही पर सीता का अपहरण भी सुन लिया है। मेरी लम्बी आयु ने गुण के बदले अपराध ही अधिक किए। (८) प्रतिहारी— (सुमन्त्र को लक्ष्य करके) आर्य, आइए, आइए। ये स्वामी है। इनके समीप जाइए। सुमन्त्र—(पास जाकर) राजकुमार की जय हो। भरत—तात, क्या आपने राम को देखा जिन्होंने संसार में पितृभक्ति प्रकट की है। क्या आपने सीता को देखा, जिस मे पतिव्रता अरुन्धती का दूसरा चरित्र प्राप्त होता है। क्या आपने लक्ष्मण को देखा, जिसने अपने भाई के स्नेह से बिना किसी कारण के वनवास को ग्रहण किया है। (सुमन्त्र चिन्ताग्रस्त से खड़े रहते है) प्रतिहारी—राजकुमार आप से ही पूछ रहे हैं। सुमन्त्र—हे देवी, क्या मुझ से?

Page 159Permalink

( 172 )

भरत—(मन में) सचमुच में महान् दुःख है। पीड़ा के कारण इनका हृदय स्थिर नहीं है। (प्रकट में) क्या आप बीच में से ही लौट आए? सुमन्त्र—राजकुमार, आपके आदेश से मैं राम के दर्शन के लिए जनस्थान गया हुआ बीच से ही कैसे लौट आता? भरत—कहीं वे लोग क्रोध और संकोच के कारण अपने को छिपा कर तो नहीं रहते? सुमन्त्र—राजकुमार, विनयी जनों को क्रोध कहाँ और निर्मल अन्तःकरण में लज्जा का प्रवेश कहाँ? किन्तु जब मैंने तपोवन देखा, तब वह उन लोगों से रहित तथा सूनसान था। (६) भरत—तो फिर वे कहाँ चले गए, कुछ सुना। सुमन्त्र—किष्किन्धा नामक नगर वानरों का निवास स्थान है। वहाँ चले गए, ऐसा सुना है। भरत—हाय, वानरों का तो मनुष्यों से परिचय नहीं होता। वहाँ वे कष्ट से रहते होंगे। सुमन्त्र—कुमार, पशु-पक्षी भी उपकार मानते हैं। भरत—तात, किस प्रकार? सुमन्त्र—सुग्रीव नाम के एक वानर को उसके बड़े भाई बाली ने राज्यच्युत कर दिया था और उसकी स्त्री भी छीन ली थी। पर्वत पर रहने वाले उस सुग्रीव को 'उसके समान दुःख वाले' राम ने कष्टमुक्त कर दिया। (१०) भरत—तात, 'उसके समान दुःख वाले' का आशय क्या है? सुमन्त्र—(मन में) हाय, मैंने तो सब कुछ कह दिया। (सबके सामने) कुमार, कुछ नहीं। मेरा आशय राज्य नहीं प्राप्त होने की समानता से है। भरत—तात, क्यों छिपा रहे हैं? यदि सच बात नहीं बताई तो आपको स्वर्गवासी महाराज दशरथ के चरणों की शपथ है। सुमन्त्र—क्या उपाय है? सुनो, मुनियों की रक्षा के कारण बलवान् राक्षसों से शत्रुता हो गई थी।

Page 160Permalink

( 173 ) इसी कारण रावण ने कपट वेश धारण करके सीता का हरण कर लिया। (११) (४) मूल भरतः—कथं हृतेति? (मोहमुपगतः) सुमन्त्रः—समाश्वसिहि, समाश्वसिहि। भरतः—(पुनः समाश्वस्य) भोः! कष्टम्। पित्रा च वान्धवजनेन च विप्रयुक्तो दुःखं महत् समनुभूय वनप्रदेशे। भार्यावियोगमुपलस्य पुनर्ममार्यो जीमूतचन्द्र इव खे प्रभया वियुक्तः॥ (१२) भोः! किमिदानीं करिष्ये? भवतु, दृष्टम्। अनुगच्छतु मां तातः। सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति कुमारः। (उभौ परिक्रामतः) सुमन्त्रः—कुमार! न खलु न खलु गन्तव्यम्। देवीनां चतुश्शालमिदम्। भरतः—अत्रैव मे कार्यम्। भोः! क इह प्रतिहारे? (प्रविश्य) प्रतिहारी—जयतु भर्तृदारकः। विजया खल्वहम्। भरतः—विजये! ममागमनं निवेदयात्रभवत्यै। प्रतिहारी—कतमस्यै भट्टिन्यै निवेदयामि। भरतः—या मां राजानमिच्छति। प्रतिहारी—(आत्मगतम्) हं किन्नु खलु भवेत्? (प्रकाशम्) भर्तः! तथा। (ततः प्रविशति कैकेयी प्रतिहारी च) कैकेयी—विजये! मां प्रेक्षितुं भरत आगतः। प्रतिहारी—भट्टिनि! तथा। भर्तृदारकस्य रामस्य सकाशात् तात- सुमन्त्र आगतः। तेन सह भर्तृदारको भरतो भट्टिनीं प्रेक्षितुमिच्छति किल। कैकेयी—(स्वगतम्) केन खलूद्घातेन मामुपालप्स्यते भरतः? प्रतिहारी—भट्टिनि! किं प्रविशतु भर्तृदारकः?

Page 161Permalink

( 176 ) प्रतिहारी—(मन में) अरे, अब क्या होगा ? (प्रकट में) स्वामी, अच्छा । (इसके बाद कैकेयी और प्रतिहारी का आगमन) कैकेयी—विजये, क्या भरत मुझसे मिलने आया है ? प्रतिहारी—महारानी, हा राजकुमार राम के पास से तात सुमन्त्र आए हैं . उनके साथ राजकुमार भरत ने महारानी ने मिलने की इच्छा प्रकट की है । कैकेयी—(मन में) न जाने किस बात पर भरत ताडना देगा । प्रतिहारी—महारानी, क्या राजकुमार आ जाएं ? कैकेयी—जाओ । उन्हें भेज दो । प्रतिहारी—महारानी, ठीक है । (घूम कर ओर पास जाकर) राजकुमार की जय हो । आप प्रवेश कीजिए । भरत—विजये, क्या सूचना दे दी ? प्रतिहारी—हाँ । भरत—तो फिर हम दोनों प्रवेश करे । (प्रवेश करते हैं) कैकेयी—पुत्र, विजया ने कहा है कि राम के पास से सुमन्त्र आए हैं ? भरत—आपको मैं इससे भी अच्छी सूचना दे रहा हूँ । कैकेयी—पुत्र, तब तो क्या कौसल्या और सुमित्रा को भी बुला लें ? भरत—नही, उन्हें नहीं सुनाना चाहिए । कैकेयी—(मन मे) अरे, पता नहीं क्या बात है । (प्रकट में) पुत्र, कहो तो । भरत—सुनो, जो अपने राज्य का परित्याग करके तुम्हारी आज्ञा से वन में गए थे, उनकी पत्नी सीता का अपहरण हो गया है । अब तो तुम्हारी इच्छा पूरी हुई । (१३) कैकेयी—अहो ! भरत—हाय, दुःख है कि तुम्हारी जैसी बहू को पाकर अत्यन्त पराक्रमी और सम्मान वाले इक्ष्वाकु वंश के लोगों को अपनी स्त्री के अपहरण को भी देखना पडा । (१४)