BharatKosha
Back to the archive

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages
Page 26Permalink

( २३ ) (३) भरत [हस्तलिखित: निर्लोभी] (१) महाकवि भास ने भरत का एक आकर्षक चरित्र उपस्थित किया है, जो पश्चात्ताप के दुःख की आँच से निखरा है। उसका व्यक्तित्व एक प्रबल सङ्कल्प शक्ति पर आधारित है। परिस्थितियों के कारण भरत के जीवन मे इतने उतार-चढ़ाव आते है कि वह बहता जाता है। (२) अपने मन मे मधुर कल्पनाएँ संजोए हुए भरत ननिहाल से लौटता है, किन्तु अयोध्या के निकट प्रतिमा गृह मे विद्यमान दशरथ की मूर्ति को देखकर उसे नियति का क्रूर अट्टहास सुनाई देता है। वह कैकयी को बुरा-भला कह कर राम को लाने जनस्थान दौड़ता है, पर असफल रहता है। (३) भरत का त्याग वास्तव मे स्तुत्य है, जो परिवार के विघटन को आगे नहीं बढ़ने देता। वस्तुतः विश्व के इतिहास में ऐसा चरित्र दुर्लभ है, जो अपने को प्राप्त वैभव को इस प्रकार ठुकरा दे। व्यवहार मे तो हम दूसरी ही प्रकार की बातो को पाते है, जो भरत के आचरण से विलोम हैं। (४) कैकयी के हृदय में अपने पुत्र भरत को राज्य दिलाने की विशे- षाधिकार की भावना थी। किन्तु भरत ने उसे अपने भ्रातृत्व की वेदी पर चढ़ा दिया। भरत का यह विचार अपने क्षणिक भावावेश पर नही, अपितु अन्तर्व्यथा से उत्पन्न श्रद्धा व निष्ठा की ज्वाला मे तपा हुआ था। तभी तो राम कहते हैं कि "जो यश मैंने दीर्घ काल मे पाया, भरत ने वह अति शीघ्र संचित कर लिया।” (4.26) (५) राम के प्रति भरत की निरतिशय भावुकता श्रद्धामूलक थी। भरत के समर्पण, चिन्तन, साधन एवं जीवन मे भी राम ही थे। लक्ष्मण ने इस तथ्य को अच्छी तरह समझ कर प्रकट किया है— "अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः। संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति॥" (4.11) (४) लक्ष्मण (१) रामकथा के अन्तर्गत लक्ष्मण का चरित्र कठोरता एवं क्रोध से परिपूर्ण उपलब्ध होता है। किन्तु उसे कोमल, स्वाभाविक और सरल रीति से अभिव्यक्त कर नाटककार ने सांस्कृतिक चेतना का विकास किया है। (२) लक्ष्मण के चरित्र में त्याग, भ्रातृप्रेम, आत्मविश्वास, वीरता

Page 27Permalink

एवं उत्साह का एक समन्वित परिपाक है। उसका जीवन उच्छृंखल न। हुए भी अत्यन्त उग्र है। उसका आचरण शिष्ट संकल्प, समुचित दृढ़ता । भक्तिपूर्ण शक्ति का प्रदर्शन है। फिर भी कभी-कभी वह उद्धत बन जाता (3) जब लक्ष्मण को पता चलता है कि राम के अभिषेक में कैक ने टाँग अड़ाई है, तो वे रमार से समो युवतियो को समाप्त कर देने : घोषणा करता है। इस प्रकार उसमे वीरता है, किन्तु अमर्यादित । लक्ष्म की वीरता में सन्तुलन का अभाव है। उसको इस प्रकार उद्धत बनने लिए उसका भ्रातृप्रेम ही बाध्य करता है। (4) लक्ष्मण का धैर्य भयकर से भयंकर विपत्ति मे भी वहिर्नि वस्तुओं की अपेक्षा आन्तरिक निगूढ़ताओं से अधिक मिला हुआ है। तभी त राम के समझाने पर वह कहता है कि आपने मेरा आशय नही समझा आपको राज्य से च्युत किया गया, इस कारण मुझे दुःख नहीं है, किन्तु मे क्रोध का कारण यह है कि आपको 14 वर्ष तक वन मे रहना पडेगा। (5) इस प्रकार समग्र हृदय, आशा और आश्वासन, शक्ति औ सकल्प, प्रेम और प्रार्थना से जीवन और यौवन को कर्त्तव्य की बलि वेदी पर चढाने वाले लक्ष्मण अपने अग्रज राम का परम भक्त है। (5) दशरथ (1) राजा दशरथ एक स्नेही पिता है । सन्तान का स्नेह उनके जीवन का सम्बल है । वृद्धावस्था मे उत्पन्न अपने चारो पुत्रो मे से राम उनको प्राणों से भी अधिक प्रिय है। तभी तो राम के वन चले जाने पर दशरथ पुत्र वियोग में व्याकुल होकर गिरते हैं, उठते है और हाय-हाय की रट लगाते हैं । (2) यही पुत्र वियोग उनके सामने साक्षात् मृत्यु बन कर खडा हो जाता है। राम के अभाव मे उनके प्राण जलहीन मछली की तरह छटपटाते है। इसके सामने दशरथ का सासारिक स्नेह टूटता जाता है। वे अपने कष्ट से घबरा कर कहीं भाग नहीं पाते और दुःख का यह अस्तित्व उनमें एक विचित्र परिवर्तन ला देता है । (3) दशरथ की यह पीड़ा और भी अधिक घनी हो जाती है। वे अपनी प्राणाधिक प्रिय पत्नी कैकेयी के लिए भी सोचते हैं कि यदि वह वन मे

Page 28Permalink

( 25 ) ५ प्रतिज्ञा पालक व्याघ्री बन जाती तो अच्छा रहता (2.8)। इस प्रकार राजा दशरथ के चरित्र मे अपूर्व पुत्र प्रेम ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। (4) कौसल्या के यह कहने पर कि 'मै वही अभागिन हूँ" दशरथ तड़प उठते है। वे कहते है- "नही, नही कौसल्ये, तुम धन्य हो । तुमने तो, राम को गर्भ मे धारण किया है। अभागा तो मैं हूँ, जो अग्नि के समान असह्य इस दुःख को न सह सकता हूँ तथा न दूर कर सकता हूँ।" (5) इस प्रकार दशरथ अपने पुत्र वियोग में ही प्राणों को छोड देते है । उनकी मृत्यु मे अन्ध मुनि पुत्र का वध भी कारण माना गया है, जो उन्हें शाप के रूप मे प्राप्त हुआ था। एक पराक्रमी सम्राट का इस प्रकार का अन्त भाग्य की बलवत्ता और प्राणी की असहाय स्थिति को प्रकट करता है । (6) कौसल्या प्रतिमा की कौसल्या त्याग, तपस्या और अनुराग की प्रतिमूर्ति है। वह कैकेयी अथवा भरत से रुष्ट या क्षुब्ध नही होती। वह तो भरत को देखते ही अपने आशीष से उसे स्नान करा देती है—"जात, निस्सन्तापो भव ।" अपनी जननी कैकेयी की अवहेलना करने वाले भरत को भी वह उपदेश देते हुए कहती है कि "तुम तो सदाचार का पालन करने वाले हो, फिर अपनी माँ की वन्दना क्यो नही करते ।" इस नाटक की कौसल्या आदर्श की प्रति- मूर्ति है। उसका पारिवारिक स्नेह अर्थात, पुत्र प्रेम तथा पति प्रेम अपूर्व एवं उच्चकोटि का है। वह कमल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर है। कैकेयी के कुचक्र के कारण राम का अभिषेक रुका तथा इसका अप्रिय व कठोर आघात कौसल्या को लगा। पहले तो वह तिलमिला उठती है, पर शीघ्र ही संभल जाती है। इसीलिए तो वह दुःखी और सन्तप्त महाराज दशरथ को अति गम्भीर तथा शान्त भाव से सान्त्वना देती है। वह यद्यपि महाराज से कैकेयी के विरुद्ध पता नही क्या-क्या कहने वाली थी, किन्तु स्वयं दशरथ की दशा देखकर इतना ही कह सकी—"महाराज, धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए।" : इस प्रकार भास द्वारा प्रस्तुत राम जननी कौसल्या सेवा, त्याग, ममता, करुणा, क्षमा आदि नारी हृदय की सभी उदात्त वृत्तियों का प्रतीक है। (7) कैकेयी भास द्वारा प्रस्तुत किया गया कैकेयी का चरित्र सर्वथा नवीन रूप में

Page 29Permalink

( 26 )

प्राप्त होता है। कुमार भरत के सम्पर्क मे उसका हृदय पश्चात्ताप के आँसुओ से घुल कर सर्वथा स्वच्छ और निर्मल हो गया है। पहले तो प्रतिहारी से यह जान कर कि भरत उससे मिलने आया है, वह घबरा जाती है कि भरत, पता नही किस बात का उलाहना दे बैठें। किन्तु वह शीघ्र ही संभल जाती है और भरत के सामने राजा दशरथ को दिए अन्धमुनि के शाप का रहस्योद्- घाटन करती है। वस्तुतः कैकेयी उदात्तचरिता है। उसने राम के लिए वन- वास का वर इसलिए माँगा था कि उन्हें ऋषि के द्वारा दिए गए शाप से मुक्ति मिले। इस तथ्य को वह भरत के सामने उचित अवसर पर अर्थात् सीता हरण के बाद स्पष्ट कर देती है। कैकेयी के चरित्र मे भावनाओ की गम्भीरता और विविधता का जैसा आदर्श दृढ रूप में प्रकट किया गया है, वैसा इतनी कुशलता के साथ किसी अन्य राम काव्य में उपलब्ध नही होता। प्रतिमा नाटक की कैकेयी स्वतन्त्र व्यक्तित्व के पूर्ण जीवन से श्रोतप्रोत है। इसमें सजीवता और स्वाभाविकता है। यह पात्र करुणा से भरा है। वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त होने पर इसके सम्मुख भरत भी नतमस्तक हो जाता है। रामायण की कैकेयी की तुलना में यह बहुत ही अच्छे रूप मे प्रस्तुत की गई है।

Page 30Permalink

( 27 ) प्रतिमा नाटक के पद्यों की सूची इस नाटक मे कुल 7 अंक तथा 157 पद्य है। क्रमानुसार इनकी सूची इस प्रकार है—1 अंक-31 पद्य, 2 अंक-21 पद्य, 3 अंक-24 पद्य, 4 अंक-28 पद्य, 5 अंक-22 पद्य, 6 अंक-16 पद्य तथा 7 अंक-15 पद्य। अकारादि क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है— नम्बर पद्य के प्रथम शब्द अंक नंबर पद्य नंबर 'अ' के 20 पद्य—

  1. अंगं मे स्पृश 2 18
  2. अक्षोभ्यः क्षोभितः 1 17
  3. अत्र रामश्च सीता 4 4
  4. अद्य खल्ववगच्छामि 4 12
  5. अद्यैव यास्यामि 7 14
  6. अधिगत-नृप-शब्द 7 12
  7. अनपत्या वयं 2 8
  8. अनुचरति शशांकं 1 25
  9. अन्वास्यमानश्चिर 3 15
  10. अपि सुगुण ममापि 4 21
  11. अय ते दयितो 4 11
  12. अयं सैन्येन महता 7 5
  13. अयं हि पतित : 3 14 14 अयममरपतेः सखा 2 21
  14. अयशांसि यदि लोभः 3 21
  15. अयोध्यामटवीभूता 3 10
  16. असुर-समर-दक्षे 4 10
  17. अह पश्चात् प्रवेक्ष्यामि 4 15
  18. अहं हि दुःखम् 2 9
  19. अहो बलमहो 5 14 'आ' के 4 पद्य—
  20. आदर्श वल्कलानीव 1 9
Page 31Permalink

( 28 ) 22. आपृच्छ पुत्रकृतकान् 5 11 23. आरब्धे पटहे 1 5 24. आशावन्तः पुरे 4 28 'इ' के 7 पद्य — 25. इद गृह् तत् 3 13 26. इद तत् स्त्रीमयं 4 14 27. इदानीं भूमिपालेन 1 4 28. इय स्वय गच्छतु 4 13 29. इय हि नीलोत्पल 6 1 30. इयमेका पृथिव्या 5 8 31. इह स्थास्यामि देहेन 4 19 'उ' का 1 पद्य— 32 उभयस्यास्ति सान्निध्य 5 9 'ए' के 3 पद्य— 33. एतदार्याभिषेकेण 7 13 34. एते ते देवताना० 3 7 35. एते भृत्या. स्वानि 2 13 'क' के 10 पद्य— 36. कमप्यर्थम् चिरम् 2 17 37. कर्णाौ त्वरा 1 8 38. कस्यासौ मद्वशतरः 4 6 39. कामं दैवतमित्येव 3 5 40. काले खल्वागता 3 12 41. कुतः क्रोधो विनीतानाम् 6 9 42. कृतान्त-शल्याभिहते 5 4 43. कृत्वा रव वीर्यसदृश 6 4 44. क्रमप्राप्ते हृते 1 19 45. क्व ते ज्येष्ठो रामः 2 14

Page 32Permalink

( 29 ) 'ग' के 6 पद्य— 46. गच्छति तुष्टिं खलु 5 5 47. गतो रामः प्रियं 2 20 48. गत्वा तु पूर्वमय० 6 7 49. गत्वा पूर्वम् स्वसैन्यै० 4 17 50. गुरोर्मे पाद 1 27 51. गोपहीना यथा गावो 3 23 'घ' का 1 पद्य— 52. घनः स्पष्टो धीरः 4 7 'च' के 2 पद्य— 53. चरति पुलिनेषु 1 2 54. चीरमात्रोत्तरीयाणाम् 1 31 'छ' का 1 पद्य— 55. छत्र सव्यजनं 1 3 'ज' का 1 पद्य— 56 जय नरवर जेयः 7 1 'त' के 14 पद्य— 57. तं स्मृत्वा शुल्कदोषं 3 11 58. तत्र यास्यामि यत्रासौ 3 24 59. तपः सग्राम कवच 1 28 60. तवैव पुत्रः 2 9 61. तातस्यैतानि 5 13 62. ताते धनुर्नमयि० 1 22 63. तीर्थोदकेन मुनिभिः 1 9 64. तेनोक्त रुदित 6 15 65. तैस्तर्पिताः सुतफलं 5 10 66. तैस्तैः प्रवृद्ध-विषयै० 7 6 67. त्यक्त्वा ता गुरुणा 5 1

Page 33Permalink

( 30 ) 68. त्यक्त्वा स्नेहं 3 18 69. त्रैलोक्यं दग्धुकामेव 1 21 70. त्वया राज्यैषिण्या 3 22 'द' के 2 पद्य— 71. द्रुमा धावन्तीव 3 2 72. दैत्येन्द्र-मान-मथनस्य 4 2 'ध' का 1 पद्य— 73. धन्याः खलु वने 2 12 'न' के 7 पद्य— 74. नरपति निधन 4 18 75. नरपतिनिधनं मया 6 8 76. नागेन्द्रा दिवसा 2 2 77. नारीणा पुरुषाणां 1 11 78. नियतमनियतात्मा 5 7 79. निघृणश्च कृतघ्नश्च 4 5 80 निर्योगाद् भूषणान् 1 26 'प' के 10 पद्य— 81. पक्षाभ्या परिभूय 6 3 82. प्रतत्युत्थाय 2 3 83 पादोपभुक्ते तव 4 25 84. पतितमिव शिरः 3 3 85. पित्रा च बान्धवजनेन 6 12 86. पितुर्नियोगादह० 4 20 87. पितुः प्राणपरित्याग 3 4 88. पितुर्मे औरसः 3 19 89. पितुर्मे को व्याधिः 3 1 90. प्रख्यात-सद्गुण-गणः 6 'फ का 1 पद्य— 91. फलानि दृष्ट्वा दर्भेषु

Page 34Permalink

( 31 ) 'ब' का 1 पद्य— 92. बलादेव दशग्रीवः 5 21 'भ' के 3 पद्य— 93. भग्नः शक्रः 5 17 94. भरतो वा भवेद् 1 20 95. भ्रमति सलिल 5 2 'म' के 8 पद्य— 96. मंगलार्थेऽनया 1 24 97. मद्‌भुजाकृष्ट 5 22 98. मम मातुः प्रियं 4 3 99. मम मातुश्च 3 16 100. मायया ऽ पहृते रामे 5 15 101 मा स्वय मन्यु 1 10 102. मुखमनुपम 4 8 103. मेरुश्चलन्निव 2 1 'य' के 12 पद्य— 104. य चिन्तयामि नृपतिं 4 22 105. यत्कृते महति 1 23 106. यत्सत्य परितोषितो 4 23 107. यथा रामश्च 7 15 108. यदि न सहसे 1 18 109. यस्याः शक्रसमो 1 13 110. य. स्वराज्यं परित्यज्य 6 -13 111. यावद् भविष्यति 4 24 112. युद्धे यन सुराः 5 16 113. येन प्राणाश्च राज्य 3 8 114. योऽस्या. करः 5 3 115. यो ऽहमुत्पतितो 5 20

Page 35Permalink

( 32 ) 'र' के 6 पद्य— 116. रघोश्चतुर्थो 4 9 117. राज्ये त्वामभिषिच्य 2 19 118. रामं वा शरणमुपेहि 5 18 119. रामलक्ष्मणयोर्मध्ये 2 15 120. रामेणापि परित्यक्तो 2 5 121. रेणु. समुत्पतति 7 4 . 'व' के 11 पद्य - 122. वक्तव्यं किंचिदस्मासु 3 6 123. वक्षः प्रसारय 4 16 124. वक्ष. प्रसारय कवाट 7 7 125. वनगमन निवृत्ति. 1 14 126. वयमयशसा 3 17 127. वल्कलै हृ'तराजश्रीः 3 20 128. विचेष्टमानेव 6 2 129. विलपसि किमिदं 5 19 130. विविधैर्व्यसनै. 7 8 131. वेलामिमा मत्त० 6 16 132. वैरं मुनिजनस्यार्थे 6 11 'श' के 7 पद्य— 133. शत्रुघ्न-लक्ष्मण 1 7 134. शरीरैऽरि. 1 12 135 शुल्कं विगणितम् 1 15 136 शून्यः प्राप्तो यदि 2 11 137. शोकादवचनाद् 1 16 138. श्रद्धेय स्वजनस्य 4 27 139 श्रुत्वा ते वनगमन 1 30 'स' के 13 पद्य— 140. सकृत् स्पृशामि 2 16 141. सञ्जीते सीतान 7 3

Page 36Permalink

( 33 ) 42. सत्यसन्ध जितक्रोध २ ६ 43. सम वाष्पेण १ ६ 44. समुदित-बल-वीर्यम् ७ २ 45 सीताभव. पातु १ १ 146. सुग्रीवो भ्रशितो ६ १० 147. सुचिरेणापि कालेन ४ २६ 148 सूर्य इव गतो २ ७ 149. सौवर्णान् वा मृगा ५ १२ 150. स्वर्ग गते नरपतौ ४ १ 151. स्वर्गेऽपि तुष्टि ७ ११ 152. स्वैरं हि पश्यन्तु १ २९ 'ह' के 5 पद्य— 153. हत्वा रिपुप्रभव० ७ १० 154 हन्त भो सत्वयुक्ता ६ १४ 155. हा वत्स राम २ ४ 156. हृदय भव सकामं ३ ९ 157. हृदयस्थितशोकाग्नि ६ ५

Page 37Permalink

( 34 ) पात्र-परिचय प्रतिमा नाटक में, जो रामायण की कथावस्तु से सम्बन्ध रखता है, कुल 27 पात्र हैं। इनमे 16 पुरुष पात्र तथा 11 स्त्री पात्र है। इनके नाम इस प्रकार है— पुरुष पात्र (1) सूत्रधार—नाटक का स्थापक (2) राजा—अयोध्यानरेश महाराज दशरथ (3) राम—राजा दशरथ के बड़े पुत्र (नायक) ( ) लक्ष्मण—राम के भाई, सुमित्रा के पुत्र (5) भरत—राम के भाई, कैकेयी के पुत्र (6) शत्रुघ्न—राम के सबसे छोटे भाई (7) सुमन्त्र—राजा दशरथ के मन्त्री (8) सूत—भरत का सारथी (9) रावण—लका का राजा (नाटक का प्रतिनायक) (10) वृद्ध-तापस-द्वय—रावण व जटायु के युद्ध को देखने वाले (11) देवकुलिक—प्रतिमागृह (मन्दिर) का पुजारी (12) तापस—दण्डकारण्य के तपस्वी (13) नन्दिलक—तपस्वी के परिजन (14) भट—राजपुरुष (15) सुधाकार—प्रतिमागृह मे सफेदी करने वाला (16) काञ्चुकीय—अन्तःपुर (रनिवास) का वृद्ध सेवक स्त्री पात्र (1) नटी—सूत्रधार की स्त्री (2) कौसल्या—राम की जननी, दशरथ की पहली रानी (3) कैकेयी—भरत की जननी, दशरथ की दूसरी रानी (4) सुमित्रा—लक्ष्मण व शत्रुघ्न की जननी, दशरथ की तीसरी रानी (5) सीता—राम की पत्नी (नायिका)

Page 38Permalink

( ३५ ) (६) अवदातिका—सीता की सखी (७) चेटी—सीता की सेविका सम्बन्ध रहता (८) प्रतिहारी—द्वारपालिका ॰ है। इनके (९) विजया कैकेयी के रनिवास की द्वारपालिका (१०) नन्दिनिका—कैकेयी की सेविका (११) तापसी—दण्डकारण्य की तपस्विनी

Page 39Permalink

प्रतिमा नाटकम् प्रथम अंक (१) मूल (नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः ) सूत्रधारः—सीताभवः पातु सुमन्त्रतुष्टः सुग्रीवरामः सहलक्ष्मणश्च । यो रावणार्थप्रतिमश्च देव्या विभीषणात्मा भरतोऽनुसर्गम् ॥ (१) (नेपथ्याभिमुखम् अवलोक्य) आर्ये ! इतस्तावत् । (प्रविश्य) नटी—आर्य ! इयमस्मि । सूत्रधारः—आर्ये ! इममेवेदानीं शरत्कालमधिकृत्य गीयतां तावत् । नटी—आय ! तथा । (गायति) सूत्रधारः—अस्मिन् हि काले, चरति पुलिनेषु हंसी काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा । (नेपथ्ये) आर्य ! आर्य ! (आकर्ण्य) सूत्रधारः— भवतु, विज्ञातम् । मुदिता नरेन्द्रभवने त्वरिता प्रतिहाररक्षीव ॥ (२) (निष्क्रान्तौ) स्थापना । शब्दार्थ—नान्द्यन्ते=मंगलाचरण के अन्त मे । सीताभवः = सीता आनन्ददाता । पातु = रक्षा करें । सुमन्त्रतुष्टः = अच्छे मन्त्र के पक्षपाती

Page 40Permalink

( 37 ) सुग्रीवरामः = अच्छे कण्ठ वाले राम । सहलक्ष्मणः = लक्ष्मण के सहित । रावणारि = रावण के शत्रु । अप्रतिमः = निरुपम वीर । देव्या = सीता के साथ । विभीषणात्मा = शत्रुओं के लिए भयकर । भरतः = श्रीराम (भरः भरणम् जगद्रक्षणम् त तनोति इति भारतः अर्थात् ससार की रक्षा करने वाले) । अनुसर्गम् = जन्म-जन्म मे (सर्गे सर्गे प्रति अनुसर्गम् अर्थात् जन्मनि-जन्मनि 'प्रादुर्भावम्) । नेपथ्याभिमुखम् = पर्दे की ओर । अवलोक्य = देख कर । शरत्कालम् = शरद् ऋतु के । अधिकृत्य = सम्बन्ध मे । चरति = चल रही है । पुलिनेषु = किनारो पर । काशांशुकवासिनी = काश के फूलों के समान धवल प्रकाश वाली । सुसंहृष्टा = प्रसन्न हृदय वाली । मुदिता = प्रसन्नचित्त वाली । नरेन्द्रभवने = राजमहल में । त्वरिता = शीघ्रतापूर्वक । प्रतिहाररक्षी इव = द्वारपालिका के समान । स्थापना = प्रस्तावना । अन्वय—सीताभव. सुमन्त्रतुष्टः सहलक्ष्मणः च सुग्रीवरामः अनुसर्गम् पातु । यः च रावणार्यप्रतिम. देव्या विभीषणात्मा भरतः । (१) अन्वय---काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा हसी पुलिनेषु चरति, नरेन्द्रभवने मुदिता त्वरिता प्रतिहाररक्षी इव । (२) हिन्दी अर्थ (नान्दी पाठ के अन्त मे सूत्रधार आता है ) सूत्रधार — सीता के जीवन, सद् विचार से सन्तुष्ट, लक्ष्मण के सहचर और सुन्दर शरीर वाले राम जन्म-जन्मान्तर में आप दर्शको की रक्षा करें, जो रावण के शत्रु, अद्वितीय वीर, सीता देवी के साथ, शत्रुओं को भयभीत करने वाले तथा संसार का भरण-पोषण करने वाले हैं । (१) (नेपथ्य की ओर देख कर) आर्ये, जरा इधर तो आना । नटी — आर्य, यह आ गई हूं । सूत्रधार — अब इसी शरद् ऋतु के सम्बन्ध में कुछ गाओ । नटी — आर्य, ठीक है । (गाती है ।) सूत्रधार — अरे, इस शरद् ऋतु के समय में — काश के पुष्पो के सदृश श्वेत प्रकाश वाली हसी प्रसन्न चित्त होकर नदी के तट पर विचरण कर रही है ।

Page 41Permalink

( 38 ) (नेपथ्य मे) आर्य, आर्य, (सुनकर) सूत्रधार-- अच्छा, समझ गया । जिस तरह काश पुष्पों के समान श्वेत रेशमी वस्त्र पहने प्रसन्नहृदय द्वारपालिका शीघ्रतापूर्वक महाराज दशरथ के अन्तः-पुर में घूम रह है । (२) (दोनो निकल जाते हैं ।) इति स्थापना । (२) मूल (प्रविश्य) प्रतिहारी—आर्य ! क इह काञ्चुकीयानां सन्निहितः । (प्रविश्य) काञ्चुकीयः—भवति ! अयमस्मि । कि क्रियताम् ? प्रतिहारी—आर्य ! महाराजो देवासुरसङ्ग्रामेष्वप्रतिहतमहारथो दशरथ आज्ञापयति-शीघ्रं भर्तृ दारकस्य रामस्य राज्यप्रभावसंयोग कारका अभिषेकसम्भारा आनीयन्तामिति । काञ्चुकीयः—भवति ! यदाज्ञप्तं महाराजेन, तत् सर्वम् सक ल्पितम् । पश्य- छत्रं सव्यजनं सनन्दिपटहं भद्रासन कल्पित न्यस्ता हेममया. सदर्भकुसुमास्तीर्थाम्बुपूर्णा घटाः । युक्तः पुष्यरथश्च मन्त्रिसहिताः पौरा. समभ्यागताः सर्वस्यास्य हि मंगलं स भगवान् वेद्यां वसिष्ठः स्थितः ॥ (३) प्रतिहारी-यद्येवं, शोभनं कृतम् ! काञ्चुकीयः-हन्त भोः ! इदानीं भूमिपालेन कृतकृत्याः कृताः प्रजाः । रामाभिधानं मेदिन्यां शशाङ्कमभिषिञ्चता ॥ (४) प्रतिहारी-त्वरतां त्वरतामिदानीमार्यः । काञ्चुकीयः—भवति ! इदं त्वर्यते । (निष्क्रान्तः) प्रतिहारी-(परिक्रम्यावलोक्य) आर्य ! सम्भवक ! सम्भवक !

Page 42Permalink

( 39 ) गच्छ, त्वमपि महाराजवचनेनार्यपुरोहितं यथोपचारेण त्वरय । (अन्यतो गत्वा) सारसिके ! सारसिके ! संगीतशालां गत्वा नाट- कीयानाविज्ञापय कालसंवादिना नाटकेन सज्जा भवतेति । याव- दहमपि सर्वम् कृतमिति महाराजाय निवेदयामि । (निष्क्रान्ता) शब्दार्थ - सन्निहितः = उपस्थित । अप्रतिहतमहारथः = अबाध गति युक्त महान् रथ वाले । भर्तृदारकस्य = राजकुमार । राज्यप्रभावसयोग- वारकाः = राज्य के तेज के सम्बन्ध का सम्पादन करने वाले। अभिषेकसम्भाराः= अभिषेक का सामान । आनीयन्ताम् = तैयार किया जाए । संकलितम् = जुटाया गया है । सव्यजनम् = चँवर के सहित । सनन्दिपटहम् = आनन्दपूर्वक वाद्यविशेष । भद्रासनम् = मगलमय आसन । कल्पितम् तैयार है। न्यस्ताः = रख दिए गए है । हेममयाः = सोने के बने । सदर्भकुसुमाः = डाभ घास और फूलो के सहित । घटाः = घडे । पुष्यरथः = क्रीडा विहार के प्रयोजन का रथ । पौराः = नगर के लोग । सम्भ्यागताः = आ गए हैं । मंगलम् = कुशल करने वाले । वेद्याम् = अनुष्ठान के स्थान पर । हन्त = प्रसन्नता की बात है । कृत- कृत्याः = सफल मनोरथ वाले । रामाभिधानम् = राम नाम वाले । मेदिन्यां= पृथ्वी पर । शशाङ्कम् = चन्द्रमा को । अभिषिञ्चता = अभिषेक करने वाले । त्वरता = जल्दी करो । त्वर्यते = शीघ्रता की जा रही है । सम्भवक = सेवक का नाम । आर्य-पुरोहितम् = वामदेव आदि श्रेष्ठ पुरोहित को । यथोपचारेण= समुचित सत्कार के साथ । सारसिके = अरी सारसिका (किसी नटी का नाम) । संगीतशालाम् = नाट्यशाला मे । नाटकीयानाम् = नटो को । विज्ञापय = सूचित करो । कालसवादिना = अभिषेक के समयोचित । सज्जा = तत्पर । अन्वय - छत्रम् सव्यजनम्, सनन्दिपटहम्, भद्रासनम् कल्पितम्, सदर्भकुसुमाः हेममयाः तीर्थाम्बुपूर्णाः घटाः न्यस्ताः, च पुष्यरथ; युक्तः, मन्त्रिसहिताः पौराः सम्भ्यागताः, हि अस्य सर्वस्य मंगलम् सः भगवान् वसिष्ठः वेद्याम् स्थितः । (३) अन्वय- इदानीम् मेदिन्याम् रामाभिधानम् शशाङ्कम् अभिषिञ्चता भूमिपालेन प्रजाः कृतकृत्याः कृताः । (४) हिन्दी अर्थ (प्रवेश करके) प्रतिहारी—आर्य, यहा पर कौनसा कचुकी विद्यमान है ?

Page 43Permalink

( 40 ) (प्रवेश करके) काञ्चुकीय—देवी, यह मैं हूं । क्या किया जाए ? प्रतिहारी—आर्य, देवासुर युद्ध में अद्वितीय पराक्रम वाले महाराज दशरथ आज्ञा दे रहे हैं कि—शीघ्र राजकुमार राम के राजोचित प्रभुत्व के परिचायक राज्याभिषेक की सारी सामग्रियां प्रस्तुत की जायें । काञ्चुकीय—हे देवी, महाराज ने जो आदेश दिया है, वह सब पूरी तरह से तैयार है । देखो— ये छत्र और चंवर हैं । ये आनन्ददायक वाजे हैं । यह मांगलिक आसन भी तैयार है । यहा कुश और पुष्पों के सहित, सोने के बने हुए घड़ों मे तीर्थों का जल भी भर. कर रख दिया है ।.क्रीड़ा रथ भी जुता हुआ खड़ा है । मन्त्रियों के साथ पुरवासी लोग भी आ गए हैं और इस समूचे मंगलदायक आनन्द के करने वाले ये भगवान् वशिष्ठ भी वेदी पर विराजमान हैं । (३) प्रतिहारी—यदि ऐसा है, तो बहुत सुन्दर किया । काञ्चुकीय—अहो, बडे हर्ष की बात है । इस समय पृथ्‍वी पर राम नाम वाले चन्द्र का राज्याभिषेक करके राजा दशरथ ने अपनी प्रजा को सफल मनोरथ वाली कर दिया है । (४) प्रतिहारी—आप अब शीघ्रता कीजिए, शीघ्रता कीजिए । काञ्चुकीय—हे देवी, यह शीघ्रता कर रहा हूं । (निकल जाता है) प्रतिहारी—(घूम कर और देख कर) आर्य सम्भवक, सम्भवक, जाओ, और तुम भी महाराज के आदेशानुसार पूज्य पुरोहित को सम्मान सहित शीघ्र बुला लाओ । (दूसरी ओर जाकर) अरी शारसिके, शारसिके, नाटक गृह मे जाकर अभिनय करने वालों से कहो कि—वे आज सामयिक अभिनय दिखाने को तैयार रहे । तब तक मैं भी "सब कुछ तैयार है" ऐसी सूचना महाराज को देती हूं । (निकल जाती है ।) (३) मूल (ततः प्रविशत्यवदातिका वल्कलं गृहीत्वा) अवदातिका—अहो अत्याहितम् । परिहासेनापीमं वल्कल- मुपन- यन्त्या ममैतावद् भयमासीत्, किं पुनर्लोभेन परधनं हरतः । हसितुमिवेच्छामि । न खल्वेकाकिन्य हसितव्यम् ।

Page 44Permalink

( 41 )

(ततः प्रविशति सीता सपरिवारा) सीता—हञ्जे ! अवदातिका परिशङ्कितवर्णं दृश्यते । किन्नु खल्व- वैतत् । चेटी—भट्टिनी ! सुलभापराधः परिजनो नाम । अपराद्धा भविष्यति । सीता—नहि नहि, हसितुमिवेच्छति । अवदातिका—(उपसृत्य) जयतु भट्टिनी । भट्टिनी ! न खल्वह- मपराद्धा । सीता—का त्वां पृच्छति । अवदातिके ! किमेतद् वामहस्तपरि- गृहीतम् । अवदातिका—भट्टिनी ! इदं वल्कलम् । सीता—वल्कलं कस्मादानीतम् ? अवदातिका—शृणोतु भट्टिनी । नेपथ्यपालिन्यार्यरैवा निवृत्त- रङ्गप्रयोजनमशोकवृक्षस्यैकं किसलयमस्माभिर्याचितासीत् । न च तया दत्तम् । ततोऽहं त्यपराध इतीदं गृहीतम् । सीता—पापकं कृतम् । गच्छ, निर्यातय । अवदातिका—भट्टिनी ! परिहासनिमित्तं खलु मयैतदानीतम् । सीता—उन्मत्तिके ! एवं दोषो वर्धते । गच्छ, निर्यातय निर्यातय । अवदातिका—यद् भट्टिन्याज्ञापयति । (प्रस्थातुमिच्छति) सीता—हला ! एहि तावत् । अवदातिका—भट्टिनी ! इयमस्मि । सीता हला ! किन्नु खलु ममापि तावत् शोभते । अवदातिका—भट्टिनी ! सर्वशोभनीयं सुरूपं नाम । अलंकरोतु भट्टिनी । सीता—आनय तावत् । (गृहीत्वालंकृत्य) हला ! पश्य, किमिदानीं शोभते ? अवदातिका—तव खलु शोभते नाम । सौवर्णकमिव वल्कलं संवृत्तम् ।

Page 45Permalink

[Page 42]

सीता—हञ्जे ! त्वं किञ्चिन्न भणसि । चेटी—नास्ति वाचा प्रयोजनम् । इमानि प्रहृषितानि तनूरूहाणि मन्त्रयन्ते । (पुलकं दर्शयति) सीता—हञ्जे ! आदर्शम् तावदानय । चेटी—यद् भट्टिन्याज्ञापयति । (निष्क्रम्य प्रविश्य) भट्टिनी ! अयमादर्श । सीता—(चेटीमुखं विलोक्य) तिष्ठतु तावदादर्शः । त्वं किमपि वक्तुकामेव । चेटी—भट्टिनी ! एवं मया श्रुतम् । आर्यवालाकिः कञ्चुकी भणति-अभिषेकोऽभिषेक इति । सीता—कोऽपि भर्ता राज्ये भविष्यति । (प्रविश्यापरा) चेटी—भट्टिनी ! प्रियाख्यानिकं प्रियाख्यानिकम् । सीता—किं किं प्रतीष्य मन्त्रयसे । चेटी—भर्तृदारकः किलाभिषिच्यते । सीता—अपि तातः कुशली ? चेटी—महाराजेनैवाभिषिच्यते ! सीता—यद्येवं, द्वितीयं मे प्रियं श्रुतम् । विशालतरमुत्सङ्गं कुरु । चेटी—भट्टिनी ! तथा । (तथा करोति) सीता—(आभरणान्यवमुच्य ददाति) चेटी—भट्टिनी ! पटहशब्द इव । सीता—स एव । चेटी—एकपदे अवघट्टिततूष्णीकः पटहशब्दः संवृत्तः । सीता—को नु खलूद्घातोऽभिषेकस्य । अथवा (विहुवृत्तान्तानि राजकुलानि नाम ।) चेटी—भट्टिनी ! एवं मया श्रुतम्-भर्तृदारकमभिषिच्य महाराजो वनं गमिष्यतीति । सीता—यद्येवं, न तदभिषेकोदकं मुखोदकं नाम ।