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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् हिन्दी अनुवाद, विस्तृत उपोद्घात और टिप्पणी सहित अनुवादक, व्याख्याकार और सम्पादक जयदेव सिंह, एम. ए. (दर्शन और संस्कृत) भूतपूर्व प्राचार्य, युवराजदत्त कॉलेज, लखीमपुर खीरी मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली • वाराणसी • पटना

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© मोतीलाल बनारसीदास प्रधान कार्यालय : बंगैला रोड, जवाहर नगर, दिल्ली-७ शाखाएँ : (१) चौक, वाराणसी (उ० प्र०) : (२) अशोक राजपथ, पटना (बिहार) प्रथम संस्करण १९७३ मूल्य १२.०० श्री सुन्दरलाल जैन, मोतीलाल बनारसीदास, चौक, वाराणसी द्वारा प्रकाशित तथा जयश्री प्रेस, सी-के. ६५/३७१ ए, पियरी कलाँ, वाराणसी-१ द्वारा मुद्रित

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प्रत्यभिज्ञाहृदयम्

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प्रत्यभिज्ञाधिकार

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प्रस्तावना जिस प्रकार वेदान्तदर्शन समझने के लिए छोटे ग्रंथों में 'वेदान्तसार' नामक ग्रन्थ बहुत उपयोगी है उसी प्रकार प्रत्यभिज्ञादर्शन समझने के लिए प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' बहुत उपयोगी है । कई वर्ष पूर्व मैंने इसका अँगरेज़ी में अनुवाद किया था । अब इसका हिन्दी में अनुवाद कर दिया है । प्रत्येक पृष्ठ पर मूल संस्कृत पाठ देकर उसके नीचे उसका हिन्दी अनुवाद दिया है । पुस्तक के अन्त में पारिभाषिक और दुरूह शब्दों पर विस्तृत टिप्पणियाँ दी गई हैं जिनके द्वारा इस दर्शन का रहस्य सरलता से समझ में आ सकता है । प्रारम्भ में एक उपोद्घात में इस दर्शन के मुख्य सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है । उपोद्घात और टिप्पणियाँ इस अनुवाद की सबसे बड़ी विशेषताएँ हैं । उपोद्घात के अनन्तर प्रत्येक सूत्र में प्रतिपादित विषय का संक्षिप्त सार दे दिया गया है । अनुवाद इस प्रकार से किया गया है कि मूल के प्रत्येक शब्द का अर्थ भली भांति समझ में आ जाय । इस ग्रंथ को मुझे कश्मीर के प्रत्यभिज्ञादर्शन के अद्वितीय मर्मज्ञ स्वामी लक्ष्मण जू ने स्नेहपूर्वक पढ़ाया । इसके लिए मैं उनका बहुत ही कृतज्ञ हूँ । कुछ कठिन सूत्रों को समझने में महामहोपाध्याय डॉक्टर गोपीनाथ कविराज की गवेषणापूर्ण व्याख्या से मुझे बहुत लाभ हुआ है । एतदर्थ मैं उनके प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ । ग्रंथ के कुछ कठिन स्थलों के मूल को समझने में मुझे आचार्य पण्डित रामेश्वर झा से बड़ी सहायता मिली है । इसके लिए मैं उनके प्रति हार्दिक धन्यवाद व्यक्त करता हूँ । इस ग्रन्थ में 'आत्म' शब्द का प्रयोग सर्वत्र पुल्लिंग में हुआ है । जयदेव सिंह

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यह ग्रन्थ गुरुवर श्रीमान् स्वामी लक्ष्मण जू को सादर समर्पित है जिन्होंने कृपाकर मुझे प्रत्यभिज्ञादर्शन का दिग्दर्शन कराया।

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ॐ तत् सत् श्री गणेशाय नमः श्रीरामाय नमः ॐ श्री हरिहर प्रणीतं विद्वत्प्रकाण्डशिरोमणि । व्याकरणतीर्थोपाधि पदविराजमानैर्विरचितम् ।

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उपोद्घात

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काश्मीरे

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उपोद्घात प्राथमिक वक्तव्य शैव धर्म कदाचित् संसार का सबसे प्राचीन धर्म है । सर जान मार्शल ने अपनी 'मोहञ्जोदड़ो ऐण्ड दि इण्डस सिविलिजेशन' नामक पुस्तक में लिखा है कि मोहञ्जोदड़ो और हरप्पा की खुदाई से यह पता चलता है कि शैवधर्म का इतिहास ताम्रपाषाणयुग का अथवा उससे भी पूर्व तक का है और इस प्रकार यह संसार का अत्यन्त प्राचीन धर्म है । भारत में इसकी तीन विधाएं दृष्टिगोचर होती हैं—कर्नाटक का वीरशैव, तमिलनाडु का शैव सिद्धान्त और कश्मीर का अद्वैत शैव धर्म । तीनों में कुछ सामान्य लक्षण हैं, किन्तु कुछ विशेष अन्तर भी है । इस ग्रन्थ का विषय केवल कश्मीर का अद्वैत शैव दर्शन हैं । भारत में दर्शन कभी भी केवल बौद्धिक विलास की वस्तु नहीं रहा । भारत के लिए दर्शन केवल चिन्तन-सरणि नहीं है, अपितु जीवन-सरणि है । न तो यह निरर्थक कौतूहल से प्रसूत हुआ है; और न यह एक बौद्धिक व्या- याम मात्र है । यहाँ प्रत्येक दर्शन धर्म है और प्रत्येक धर्म का दार्शनिक आधार है । यहां एक लम्बा उपनेत्रधारी अध्यापक जो अपने छात्रवर्ग को अपने व्याख्यान का सार लिखवा रहा हो दार्शनिक नहीं कहलाता था और न ही वह दार्शनिक समझा जाता था जो अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा बैठा वादों का तन्तुजाल बुन रहा हो । यहां तो दार्शनिक वह माना जाता था जो जीवन के रहस्य को जानने के लिए एक गम्भीर आन्तरिक प्रेरणा से प्रणोदित होता था, जो तीव्र आध्यात्मिक साधना में व्यग्र रहता था और जो अपने जीवन को रूपान्तरित कर प्रकाश का दर्शन करता था । अपने समकालीन जनों के लिए करुणा से प्रेरित होकर, जिस सत्य का वह अनुभव करता था उसे मानव की तार्किक बुद्धि को अवगत कराने का प्रयत्न करता था । इस प्रकार इस देश में दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ । कश्मीर का अद्वैत शैव दर्शन इसी प्रकार का रहा है । शताब्दियों तक वह एक गुह्य सिद्धान्त के रूप में साधक को बतलाया जाता था जिसको उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना पड़ता था और अपने आध्यात्मिक प्रयोग-

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( ४ )

शाला में उसका परीक्षण करना पड़ता था । कालान्तर में केवल उपासना और अनुष्ठान-पद्धति रह गयी । उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि को लोग भूल गये । स्यात् कुछ इने गिने ऐसे साधक अब भी थे जो मौखिक परम्परा द्वारा उसके दार्शनिक सिद्धान्त को जानते थे, किन्तु इतिहास के द्वारा उस सिद्धान्त को लिखित रूप में प्रस्तुत करनेवाले जिस चिन्तक का पता चलता है वह वसुगुप्त थे । विद्वानों का मत है कि वह ईसवी आठवीं शती के अन्त अथवा नवीं शती के प्रारम्भ में हुये थे । तब से कश्मीर में दार्शनिक ग्रन्थ सक्रिय रूप से और लगातार चार शतियों तक लिखे गये । इस दर्शन का वाङ्‌मय अब इतना इकट्ठा हो गया है कि उसका अध्ययन करने के लिए पूरा एक जीवन- काल चाहिए । इस दर्शन के कुछ ग्रन्थ अभी तक नहीं प्रकाशित हुये हैं ।

शैव दर्शन का वाङ्‌मय शैव दर्शन का वाङ्‌मय तीन शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है :- (क) आगम शास्त्र (ख) स्पन्द शास्त्र (ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (क) आगम शास्त्र :- यह दैवीज्ञान माना जाता है जो कि गुरु-शिष्य परम्परा से चला आया है । इस कोटि के निम्नलिखित ग्रंथ हैं :- मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र, विज्ञानभैरव, मृगेन्द्र, रुद्रयामल, शिवसूत्र । शिवसूत्र पर वृत्ति, भास्कर और वर्धराज के वार्तिक और क्षेमराज की विम- र्शिनी व्याख्याएं मिलती हैं । मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र और विज्ञान भैरव पर भी व्याख्याएं हैं । (ख) स्पन्द शास्त्र :- इसमें इस दर्शन के मुख्य सिद्धान्त हैं । स्पन्द संबंधी निम्नलिखित ग्रन्थ मिलते हैं : स्पन्दसूत्र जिसका दूसरा नाम है स्पन्दकारिका । इसमें शिवसूत्र में प्रतिपा- दित मुख्य सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन है । स्पन्दकारिका पर निम्नलिखित टीकाएं उपलब्ध हैं :-

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( ५ ) रामकण्ठ की विवृत्ति, उत्पल वैष्णव की प्रदीपिका, क्षेमराज का स्पन्द- सन्दोह और स्पन्द निर्णय । स्पन्द सन्दोह में केवल प्रथमकारिका पर टीका है । (ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र :- यह शैव दर्शन के मुख्य सिद्धान्तों का मानव की तार्किक बुद्धि के लिए व्याख्या करता है । इसमें आगम के दार्शनिक पक्ष का प्रतिपादन हुआ है । इसमें तर्क, वाद-प्रतिवाद का प्रयोग किया गया है । इस शास्त्र का मूल ग्रन्थ सोमानन्द की शिवदृष्टि है। सोमानन्द के शिष्य उत्पल देव ने 'ईश्वर प्रत्यभिज्ञा' लिखी । इस पर निम्नलिखित व्याख्याएं हैं :- स्वयं उत्पलदेव द्वारा लिखी वृत्ति, अभिनवगुप्त द्वारा लिखी हुई प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी और प्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी । क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञा हृदयम्' लिखा जिसमें प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सार आ गया है । अभिनवगुप्त ने १२ खण्डों में तंत्रालोक' और एक पृथक् ग्रन्थ 'तंत्रालोक सार' लिखा जिनमें शैव दर्शन के सभी सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है । ऊपर जो शैव दर्शन का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है उसके लिए मैं जे० सी० चैटर्जी के 'काश्मीर शैविज्म' का ऋणी हूँ । प्रत्यभिज्ञाहृदयम् :- जैसा कि ऊपर कहा गया है 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' में क्षेमराज ने समस्त प्रत्यभिज्ञादर्शन का सार प्रस्तुत किया है । क्षेमराज अभिनवगुप्त के प्रति- भाशाली शिष्य थे । अभिनवगुप्त की बहुमुखी प्रतिभा थी । वह तंत्र, योग, दर्शन, काव्य और नाट्यशास्त्र के अनुपम विशेषज्ञ थे । डा० कान्तिचन्द्र पाण्डेय के अनुसार अभिनवगुप्त ईसवी दशवीं शती में हुये थे । क्षेमराज उनके शिष्य थे । अतः उनका भी काल दशवीं शती है। उन्होंने निम्नलिखित ग्रन्थ लिखे । प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, स्पन्दसन्दोह, स्पन्दनिर्णय, स्वच्छन्दोद्योत, नेत्रोद्योत, विज्ञानभैरवोद्योत, शिवसूत्रविमर्शिनी, स्तवचिन्तामणिटीका, पराप्रावेशिका, तत्त्वसन्दोह । उनके वंश और जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है । यह मत बिलकुल ठीक है कि उनके 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ग्रन्थ का शैव या त्रिक वाङ्मय में वही स्थान है जो वेदान्त में वेदान्तसार का है । इस ग्रन्थ में विवादग्रस्त बातों को छोड़ दिया गया है और प्रत्यभिज्ञादर्शन के सिद्धान्तों का

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( ६ )

बहुत संक्षिप्त रूप में कुशलता से प्रतिपादन किया गया है। क्षेमराज ने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही कहा है :- 'इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्तिपातोन्मिषितपा- रमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषामीश्वरप्रत्यभिज्ञोप देशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते'। “इस जगत् में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारबुद्धि के हैं, जिन्होंने कठिन तर्कशास्त्र में परिश्रम नहीं किया है किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस समावेश की अभिलाषा करते हैं जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके लिए ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में जो उपदेश है उनके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है। वह उत्पलाचार्य की 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' को इस दर्शन का एक उत्तम ग्रन्थ मानते थे । जो प्रभु के अनुग्रह से 'प्रत्यभिज्ञा' के मुख्य सिद्धान्तों को जानना चाहते हैं परन्तु जो कठिन तर्क के अभ्यास के न होने के कारण उत्प- लाचार्य के महान् ग्रन्थ को समझने में असमर्थ हैं उनके लिए उन्होंने एक सुखसाध्य और सरल पुस्तक प्रस्तुत की है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के कठिन तार्किक विवेचन को छोड़कर मुख्य सिद्धान्तों को थोड़े से पृष्ठों में संक्षिप्त करने में उनको अपूर्व सफलता मिली है। जो लोग प्रत्यभिज्ञा के प्रारम्भिक ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक बहुत काम की है। उन्होंने स्वयं सूत्रों का भी ग्रथन किया है और व्याख्या भी लिखी है। 'प्रत्यभिज्ञा' का अर्थ है 'पहचान'। जीव वस्तुतः शिव है, किन्तु वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है और अपने देह और मन से अपना तादात्म्य माने बैठा है। 'प्रत्यभिज्ञा' का उपदेश उसको अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में सक्षम बनाने के लिए है, उसको यह सत्य हृदयंगम कराने के लिए है कि उसका वास्तविक स्वरूप शिव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और उसको वह साधना सुझाने के लिए है जिससे उसको शिव में समावेश की प्राप्ति हो जाय। उस उपदेश का विस्तृत वर्णन पुस्तक के भीतर मिलेगा। यहाँ पर हम इस दर्शन के मुख्य मन्तव्यों का निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत सिंहावलोकन करेंगे :- १-परमार्थ या चरम तत्त्व, २-जगत्, ३-स्वातन्त्र्यवाद और आभास- वाद, ४-षडध्वा, ५-शांकर अद्वैतवाद के साथ तुलना, ६-जीव, ७-बन्ध, ८-मोक्ष ।

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( ७ ) १-परमार्थ :- परमार्थ अपने चरम रूप में चित् या परासंवित् है । चित् सब परिवर्तन शील पदार्थों का निर्विकार तत्त्व है । इस चित् या परासंवित् में वेदना के समान अव्यवहितत्व होता है जिसमें अहं ( मैं ) और इदं ( यह ) का, ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रहता । इसमें अहं और इदं की अविभाजित एकता रहती है । यह वह चेतना है जिसको सदा अपनी चेतना बनी रहती है। प्रत्य- भिज्ञाशास्त्र के शब्दों में यह 'प्रकाशविमर्शमय' है । परमार्थ या चरमतत्त्व को इस शास्त्र में परमशिव या महेश्वर या परमेश्वर कहते हैं । यह 'प्रकाश' मात्र नहीं है । 'प्रकाश' वह है जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है । कठोपनिषद् के शब्दों में 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' । 'उसी के प्रकाशमान होने के कारण ही सब कुछ प्रकाशित होता है, उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशमान है ।" शांकरवेदान्त भी उसको 'प्रकाश' कहता है । किन्तु सूर्य भी तो प्रकाश है, हीरा भी तो प्रकाश है, तो फिर चरमतत्त्व और इसमें (सूर्य या हीरा में) क्या भेद है ? शैवदर्शन कहता है कि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र नहीं है, वह जड़ हीरे के समान प्रकाश नहीं है, वह विमर्श भी है अर्थात् वह अपना ईक्षण भी करता है । जैसा कि क्षेमराज ने पराप्रावेशिका (पृ०२) में कहा है, यह विमर्श, 'अकृत्रिमाहं विस्फुरणम्' है, यह अकृत्रिम, शुद्ध स्वाभाविक अहं ( मैं ) का स्फुरण है, अर्थात् यह अहं और इदं के व्यवधान से शून्य, अव्यवहित 'स्व' का बोध है । इस अकृत्रिम अहं पर टिप्पणी में प्रकाश डाला गया है । यदि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र होता और विमर्श न होता, तो वह निरीश्वर और जड हो जाता । 'यदि निर्विमर्शः स्यात् अनीश्वरो जडश्च प्रसज्येत' । ( प०प्रा० पृ०२ ) इसी विमर्श ही द्वारा जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार होता है । चित् अपने को चित्-रूपिणी शक्ति के रूप में जानता है । यही विमर्श है । विमर्श के कई नाम हैं यथा पराशक्ति. परावाक्, स्वातंग्य, ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द ( दे० पराप्रावेशिका पृ० २) । इससे स्पष्ट है कि चरमतत्व चिन्मात्र नहीं है, चित्शक्ति भी है । यह सर्वसंग्राही चित् अनुत्तर भी कहलाता है, क्योंकि उससे बढ़कर और कुछ है नहीं । यह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी ।

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( ८ ) २-जगत् :- परमार्थ रिक्त या अभिव्यक्तिरहित नहीं है । उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उसमें भूत, भवत्, भविष्यत् सब कुछ बीज रूपेण विद्यमान है। यदि परमार्थ, चित् संवित् या महेश्वर में प्रव्यक्त या प्रकट होने की क्षमता न होती, तब तो वह चित् या संवित् ही नहीं कहा जा सकता था, तब तो वह जड़ पदार्थ के समान हो जाता "अस्थास्यदेकरूपेण वपुषा चेन्महेश्वरः महेश्वरत्वं संवित्वं तदत्यक्ष्यद् घटादिवत्” ( तंत्र० ३, १०० श्लो० ) “यदि महेश्वर एक रूप में पड़ा रह जाता, यदि वह अनन्त रूपों में प्रकट न होता, तब तो उसका महेश्वरत्व और संवित्व ही समाप्त हो जाता और वह एक जड़ घट के समान हो जाता”। यह ऊपर कहा जा चुका है कि परमशिव "प्रकाश विमर्शमय" है। उस अवस्था में अहं ( मैं ) और इदं ( यह ), शिव और विश्व एक अभिन्न ऐक्य में होते हैं । अहं प्रकाश रूप है और अहं का अहंरूपेण प्रत्यवमर्श ( अनु- चिन्तन ) विमर्श रूप है । यही विमर्श स्वातंत्र्य या अबाधित शक्ति है । पराप्रावेशिका में क्षेमराज ने इसी को परम शिव का हृदय कहा है ( हृदयं परमेशितुः ) । शक्ति शक्तिमान् से भिन्न नहीं है, उसी का प्ररूप है । परम अनुभूति में जो इदं कहा जाता है वह अहं ही है । यह विमर्श या शक्ति शून्य नहीं है । इसमें सब कुछ है । यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं विश्वमेतच्चराचरम् ।। ( पराप्रावेशिका में क्षेम राज द्वारा उद्धृत ) जैसे बरगद का बड़ा वृक्ष अपने बीज में शक्तिरूप में विद्यमान रहता है, उसी प्रकार यह चराचर विश्व शक्तिरूप में महेश्वर के हृदय ( विमर्श ) में विद्यमान रहता है । दूसरा उदाहरण जो प्रायः दिया जाता है वह मयूर (मोर) का है । मयूर जैसे अपने सारे चित्रित पिच्छकलाप सहित मयूराण्डरस में सम्भाव्यता के रूप में विद्यमान है, वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर की शक्ति में विद्यमान है । महेश्वर की शक्ति को ही चिति, पराशक्ति या परावाक् कहते हैं ।

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( ६ ) परमशिव की शक्ति तो अनन्त है, किन्तु निम्नलिखित पाँच शक्तियां मुख्य हैं :- १. चित्-आत्मप्रकाशन की शक्ति । इस प्ररूप में वह शिव कहलाता है । २. आनन्द-इसको स्वातंत्र्य भी कहते हैं । ( स्वातंत्र्यमानन्द-शक्तिः तंत्रालोकसार भा० १) । इस प्ररूप में महेश्वर शक्ति कहलाता है । एक प्रकार से चित् और आनन्द महेश्वर का स्वरूप ही है । शेष सब उसकी शक्तियां हैं । ३. इच्छा-सर्जन की प्रवृत्ति । इस प्ररूप में वह सदाशिव और सादाख्य कहलाता है । ४. ज्ञान-इस प्ररूप में वह ईश्वर कहलाता है । ५. क्रिया-कोई भी आकार ग्रहण करने की शक्ति ( सर्वाकारयोगित्वं क्रिया शक्तिः तंत्रालोकसार भा० ) इस प्ररूप में वह सद्विद्या या शुद्ध विद्या कहलाता है । विश्व महेश्वर की शक्ति का उन्मेष या प्रसर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । (i) अपरिमित अनुभव के तत्त्व : १-५: हम यह देख चुके हैं कि परमशिव के दो प्ररूप. हैं विश्वोत्तीर्ण और विश्व- मय । उसका विश्वमय सर्जनात्मक रूप है। यह विश्वमय सर्जनात्मक रूप शिवतत्त्व' कहलाता है । १. शिवतत्त्व-परमशिव का स्पन्द है । जैसा कि षट्त्रिंशत्-तत्व-सन्दोह में कहा गया है । यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् । पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः । ( पृ० १, श्लोक० १ ) जब अनुत्तर (परमशिव) अपनी इच्छा से जगत् के सर्जन के लिए स्पन्द- मान होता है तो उसका आद्य स्पन्द उसके जानकारों द्वारा 'शिव तत्त्व' कह- लाता है । २-शक्तितत्व -यह शिव की ही शक्ति है । शक्ति 'निषेधव्यापाररूपा' कही गई है। शक्ति पहले इदं ( यह ) या वेद्य का निषेध कर देती है । इस स्थिति को शून्यातिशून्य कहते हैं। चित् या परासंवित् में अहं और इदं

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( १० ) अभिन्न हैं। शिवतत्त्व में से शक्ति के व्यापार से इदं प्रत्याहृत हो जाता है, केवल अहं रह जाता है। क्षेमराज ने इस स्थिति को अनाश्रित शिव कहा है। उनके शब्द हैं : श्री परमशिवः ---- पूर्वं चिदैक्याख्यातिमयानाश्रितशिवपर्याय शून्यातिशून्यात्मतया प्रकाशाभेदेन प्रकाशमानतया स्फुरति । इस अवस्था में शिव इदं से रहित केवल अहं के रूप में रहता है। शिव विश्वरूप में भासित हो, इसके लिए 'अहमिदम्' के एकात्म अनुभव में एक व्यवधान आवश्यक हो जाता है। परन्तु यह एक अस्थायी अवस्था है। वेदक से वेद्य पृथक् होकरपुनः अहमिदम्-एकात्मरूप में नहीं, किन्तु अहं इदं इस रूप में प्रकट होता है जिसमें अहं और इदं विविक्त तो हैं, किन्तु विच्छेद्य नहीं हैं क्योंकि वे एक ही आत्मा या चित् के अंग है। शक्ति चित् को अहं और इदं में, वेदक और वेद्य में अभिस्पन्दित कर देती है। शक्ति शिव से भिन्न नहीं है, वह शिव की सर्जनोन्मुखता मात्र है। वह शिव का अहंविमर्श है। जैसा कि महेश्वरानन्द ने अपने महार्थमञ्जरी में कहा है । 'स एक विश्वमेषितुं ज्ञातुं कर्तुं चोन्मुखो भवन् । शक्तिस्वभावः कथितो हृदयत्रिकोणमधुमांसलोल्लासः ( पृ० ४० ) । वही (शिवही) अपने हृदय के इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूपी त्रिकोण के माधुर्य से परिवर्धित उल्लास द्वारा अपने में ही स्थित विश्व को ईक्षण करने के लिये उन्मुख होने पर शक्ति स्वभाव वाला कहलाता है । महेश्वरानन्द इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं : यदास्वहृदयवर्तिनमुक्त रूपमर्थतत्त्वं बहिः कर्तुमुन्मुखो भवति तदा शक्तिरिति व्यवह्रियते । ( पृ० ४० )। जब शिव अपने हृदय में (बीजरूपेण) विद्यमान अर्थतत्त्वको बाहर करने के लिए उन्मुख होता है तब वह शक्ति कहलाता है । शक्ति चित् की क्रियाशीलता या गतिशीलता है। विमर्श या उन्मुखता के सदृश विचार छान्दोग्योपनिषत् के निम्नलिखित वाक्य में मिलता है :-

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( ११ ) "सदेव सौम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्— तदैक्षत, बहु स्याम्, प्रजायेय इति । (६, २, १-३) पहले एक, द्वितीय के बिना सत् ही था। उसने ईक्षण किया' बहु हो जाऊँ, प्रजनन करूं। यह ईक्षितृत्व विमर्श या उन्मुखता के सदृश है, किन्तु शांकरवेदान्त ने इसके निहितार्थ को प्रस्फुटित नहीं किया। शैवदर्शन परम शिव को एक शुष्कतार्किक के रूप में नहीं मानता, वह उसे एक कलाकार के रूप में देखता है। जैसे एक कलाकार अपने आनन्द को अपने भीतर ही नहीं रख सकता, किन्तु उसे गान, चित्र या कविता में उड़ेल देता है, इसी प्रकार सर्वोच्चकलाकार परमशिव अपने वैभव के आनन्द- पूर्ण चमत्कार को प्रव्यक्ति या सृष्टि में उड़ेल देता है। क्षेमराज ने उत्पलदेव की स्तोत्रावली की व्याख्या में इसी विचार को निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया है। 'आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यामानमात्मना' अर्थात् शक्ति आनन्द से उच्छलित होकर अपने को अपने ही द्वारा सृष्टि के रूप में प्रकट करती है। समस्त सृष्टि शिव की सृष्टिकल्पना की बाह्या- भिव्यक्ति है। शक्ति तत्त्व में महेश्वर के आनन्द का प्राधान्य है। शिव और शक्ति तत्त्व कभी पृथक् नहीं रह सकते। वे सृष्टि और संसार दोनों में संयुक्त रहते हैं— शिव ईक्षिता के रूप में और शक्ति आनन्द के रूप में। वस्तुतः शिव-शक्ति तत्त्व आभास नहीं है, सभी आभासों का बीज है। ३-सदाशिव अथवा सादाख्य तत्त्व :— इदं के प्रतिज्ञापन की इच्छा सदाशिव तत्त्व अथवा सादाख्य तत्त्व है। सदाशिव में इच्छा का प्रधान्य है। इस अवस्था का अनुभव है 'मैं हूँ' यतः इस अवस्था में होने का प्रतिज्ञापन होता है अतः यह सादाख्यतत्त्व कहलाता है। सत् का अर्थ है होना, और होने में इदं (यह) ध्वनित है। मैं हूं -क्या हूं-यह (इदं) हूं। इस अवस्था का अनुभव है 'अहं इदं' (मैं यह हूं) किन्तु इदं (यह) अभी अस्फुट है। अहं (मैं) ही अभी प्रधान है। इस अवस्थामें विश्व अभी अस्फुट इदं मात्र है। इसीलिए इस अवस्था को प्रायः निमेष कहा गया है (निमेषोऽन्तः सदाशिवः ) । इस अवस्था में अहं जो

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( १२ ) अस्फुट रूप में 'इदं' है उसको अपनाही अंश समझता है। अभी प्रमुखता अहं की ही है। जैसे चित्रकार के मन में चित्र प्राथमिक अवस्था में एक अस्फुट, धुंधले रूप में रहता है वैसे ही सदाशिव में इदं अर्थात् विश्व अभी अस्फुट रूप में रहता है। राजानक आनन्द ने षट्त्रिंशत्तत्व सन्दोह पर लिखे हुए अपने विवरण में ठीक ही कहा है :— “तत्र प्रोन्मीलितमात्रचित्रकल्पतया इदमंशस्य अस्फुटत्वात् इच्छाप्राधान्यम्” (पृ० ३') अर्थात् इस अवस्था में इदं अंश (विश्व) वैसे ही अस्फुट रहता है जैसे एक चित्रकार का चित्र जो कि बनाया जाने वाला है पहले मन में धुँधले रूप में रहता है। अतः इस अवस्था में इच्छा का ही प्राधान्य है। क्षेमराज प्रत्यभिज्ञाहृदय में कहते हैं : “सदाशिवतत्त्वेऽहन्ताच्छादितास्फुटेदन्तामयं विश्वम्” अर्थात् सदाशिवतत्त्व में इदन्तामय विश्व अभी अस्फुट (अस्पष्ट) रहता, है, अभी वह अहन्ता से आच्छादित रहता है अर्थात् अभी अहंभाव का ही प्राधान्य रहता है। सदाशिव प्रथम आभास है। आभास के लिए एक द्रष्टा या प्रमाता होना चाहिए और एक दृश्य या प्रमेय होना चाहिए। इस सर्वव्यापी दशा में प्रमाता और प्रमेय दोनों चेतना ही है, क्योंकि इस दशा में चेतना के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। चेतना इस दशा में स्वयं अपना प्रमेय है; प्रमाता भी वही है, प्रमेय भी वही है। ४ ईश्वरतत्त्वः— पारमेश्वरीय अनुभव की परवर्ती अवस्था वह है जिसमें समग्र अनुभव का इदमंश और अधिक स्फुट हो जाता है। इसको ईश्वरतत्त्व कहते हैं। यह उन्मेष है अर्थात् यह विश्व का स्फुट रूप से खिल उठना है। इस अवस्था में ज्ञान का प्राधान्य रहता है। राजानक आनन्द अपने विवरण में कहते हैं :— “अत्र वेद्यजातस्य स्फुटावभासनात् ज्ञानशक्त्युद्रेकः' अर्थात् इस अवस्था में वेद्य या प्रमेय अधिक स्फुट होता है, इसलिए ज्ञानशक्ति का प्राधान्य है। जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्श्य चित्र की पहले एक धुँधली सी रूपरेखा होती है, फिर उसका अधिक स्पष्ट रूप उमगने लगता है, वैसे ही सदाशिव की अवस्था में विश्व अस्फुट रहता है और ईश्वर