भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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५०० रघुवंशमहाकाव्ये

मांसमदन्तीति क्रव्यादो राक्षसाः तेषां गण एव परीवारो यस्य स तथोक्तः । अत एव जङ्गमश्चरिष्णुश्चिताग्निरिव स्थितः कृशानुपक्षे धूम्रधूम्रवर्णा ज्वाला एव शिरोरुहाः । क्रव्यादा गृध्रादयः इत्यनुसंधेयम् ।

**भाषार्थ—**धूँएं के समान काला उसका रङ्ग था उसकी देह से चर्बी की गन्ध निकल रही थी अग्नि की लपटों के समान उसके बाल विखरे हुए थे और कच्चे मांस के खानेवाले राक्षस उसके चारों ओर चल रहे थे । इस प्रकार वह उस चिता की अग्नि के समान लग रहा था और जिसके आस-पास कुत्ते और गीध आदि मांस भक्षी पशु पक्षी घूम रहे हों ॥ १६ ॥

अपशूलं तमासाद्य लवणं लक्ष्मणानुजः ।
रुरोध संमुखीनो हि जयो रंध्रप्रहारिणाम् ॥ १७ ॥

**अन्वयः—**लक्ष्मणानुजः अपशूलं तं लवणम् आसाद्य रुरोध हि रन्ध्रप्रहारिणां जयः सम्मुखीनः (भवति) ।

अपशूलमिति । लक्ष्मणानुजः शत्रुघ्नोऽपशूलं शूलरहितं तं लवणमासाद्य रुरोध । तथा हि रन्ध्रप्रहारिणां रन्ध्रप्रहरणशीलानाम् । अपशूलतैवात्र रन्ध्रम् । जयः सम्मुखीनो हि सम्मुखस्य दर्शनो हि । "यथामुखसम्मुखस्य दर्शनः खः' इति खप्रत्ययः । अधिकारलक्षणार्थस्तु दुर्लभ एव ।

**भाषार्थ—**इस प्रकार लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न ने देखा कि यह अवसर अच्छा है क्योंकि इसके हाथ में भाला नहीं है बस झट उन्होंने उसे घेर लिया; क्योंकि जो शत्रु के शक्तिहीन होने पर प्रहार करता है वह अवश्य विजयी होता है ॥ १७ ॥

नातिपर्याप्तमालक्ष्य मत्कुक्षेरद्य भोजनम् ।
दिष्ट्या त्वमसि मे धात्रा भीतेनेवोपपादितः ॥ १८ ॥
इति संतर्ज्य शत्रुघ्नं राक्षसस्तज्जिघांसया ।
प्रांशुमुत्पाटयामास मुस्तास्तम्बमिव द्रुमम् ॥ १९ ॥

**अन्वयः—**अद्य मत्कुक्षेः भोजनं नाति पर्याप्तम् (इति) आलक्ष्य इव धात्रा दिष्ट्या मे त्वं उपपादितः (असि) ।

**अन्वयः—**राक्षसः इति शत्रुघ्नं सन्तर्ज्य तज्जिघांसया प्रांशु द्रुमं मुस्ता-स्तम्बम् इव उत्पाटयामास ।

नेति । इतीति । युग्मम् । राक्षसो लवणः अद्य मत्कुक्षेः भुज्यत इति भोजनम् । भोज्यं मृगादिकं नातिपर्याप्तमनतिसमग्रमालक्ष्य दृष्ट्वा भीतेनेव धात्रा दिष्ट्या भाग्येन