रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशः सर्गः ५०१
मे त्वमुपपादितः कल्पितोऽसि । इति शत्रुघ्नं संतर्ज्य तस्य शत्रुघ्नस्य जिघांसया हन्तुमिच्छया प्रांशुमुन्नतं द्रुमं मुस्तास्तम्बमिव अक्लेशेनोत्पाटयामास ।
भाषार्थ—शत्रुघ्न को देखकर लवणासुर गरज उठा और बोला—आज मेरे भोजन की सामग्री कम थी यह देख ब्रह्मा ने डर कर मेरा भोजन पूरा करने के लिए तुम्हें यहाँ भेज दिया है ॥ १८ ॥
भाषार्थ—यह कह कर उस लवणासुर ने शत्रुघ्न को मारने के लिए एक बड़ा भारी वृक्ष ऐसे धीरे से उखाड़ लिया जैसे मोथा नामक घास के डण्टल को उखाड़ लिया जाता है ॥ १९ ॥
सौमित्रेर्निशितैर्बाणैरन्तरा शकलीकृतः ।
गात्रं पुष्परजः प्राप न शाखी नैर्ऋतेरितः ॥ २० ॥
अन्वयः—नैर्ऋतेरितः शाखी अन्तरा निशितैः वाणैः शकलीकृतः सौमित्रेः गात्रं न प्राप ( किन्तु ) पुष्परजः ( प्राप ) ।
सौमित्रेरिति । नैर्ऋतेरितो रक्षाप्रेरितः शाख्यन्तरा मध्ये निशितैर्बाणैः शकलीकृतः सन्सौमित्रेः शत्रुघ्नस्य गात्रं न प्राप । किंतु पुष्परजः प्राप ।
भाषार्थ—लवणासुर ने ज्योंही शत्रुघ्न पर उस वृक्ष को फेंका त्योंहीं उन्होंने बीच में ही उसे अपने तीक्ष्ण बाणों से टुकड़े कर दिया । इस प्रकार वह वृक्ष तो उनके शरीर तक नहीं पहुँच सका किन्तु केवल उसके पुष्पों का पराग भर पहुँचा ॥ २० ॥
विनाशात्तस्य वृक्षस्य रक्षस्तस्मै महोपलम् ।
प्रजिघाय कृतान्तस्य मुष्टिं पृथगिव स्थितम् ॥ २१ ॥
अन्वयः—रक्षः तस्य विनाशात् महोपलं पृथक्स्थितं कृतान्तस्य मुष्टिम् इव प्रजिघाय ।
विनाशादिति । रक्षो लवणस्तस्य वृक्षस्य विनाशाद्धेतोः महोपलं महान्तं पाषाणं पृथक्स्थितं कृतान्तस्य यमस्य मुष्टिमिव । मुष्टिशब्दो द्विलिङ्गः । तस्मै शत्रुघ्नाय प्रजिघाय प्रहितवान् ।
भाषार्थ—उस वृक्ष के टुकड़े टुकड़े हो जाने पर उस राक्षस लवाणसुर ने एक बहुत बड़ा पत्थर उठाकर शत्रुघ्न पर फेंका मानो वह यमराज का घूंसा हो ॥ २१ ॥
ऐन्द्रमस्त्रमुपादाय शत्रुघ्नेन स ताडितः ।
सिकतात्वादपि परां प्रपेदे परमाणुताम् ॥ २२ ॥