भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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५१२ रघुवंशमहाकाव्ये

भाषार्थ— राम ने उससे पूछा—आप किस वंश में उत्पन्न हुए हैं और आपका क्या नाम है ? तब वह तपस्वी बोला—मैं स्वर्ग पाने के लिए तप कर रहा हूँ मेरा नाम शम्बूक है और मैं शूद्र हूँ ॥ ५० ॥

तपस्यनधिकारित्वात्प्रजानां तमघावहम् । शीर्षच्छेद्यं परिच्छिद्य नियन्ता शस्त्रमाददे ॥ ५१ ॥

अन्वयः— तपसि अनधिकारित्वात् प्रजानां अघावहं तं शूद्रं शीर्षच्छेद्यं परिच्छिद्य नियन्ता शस्त्रं आददे ।

तपसीति । तपस्यनधिकारित्वात्प्रजानामघावहं दुःखावहं तं शूद्रं शीर्षच्छेद्यम् । "शीर्षच्छेदाद्यच्च" इति यत्प्रत्ययः । परिच्छिद्य निश्चित्य नियन्ता रक्षको रामः शस्त्रमाददे जग्राह ।

भाषार्थ— शूद्रों को तपस्या करने का अधिकार नहीं है। इसी अनधिकृत कार्य से प्रजा में पाप फैलता है। इसलिए राम ने निश्चय कर लिया कि इसका वध करना ही होगा उन्होंने हाथ में अस्त्र उठा लिया ॥ ५१ ॥

स तद्वक्त्रं हिमक्लिष्टकिञ्जल्कमिव पङ्कजम् । ज्योतिष्कणाहतश्मश्रु कण्ठनालादपातयत् ॥ ५२ ॥

अन्वयः— स ज्योतिष्कणाहतश्मश्रु तद्वक्त्रं हिमक्लिष्टकिञ्जल्कं पङ्कजम् इव कण्ठनालात् अपातयत् ।

स इति । स रामो ज्योतिष्कणैः स्फुलिङ्गैः रहितानि दग्धानि श्मश्रूणि यस्य तत्तस्य वक्त्रं हिमक्लिष्टकिञ्जल्कं पङ्कजमिव कण्ठ एव नालं तस्मादपातयत् ।

भाषार्थ— और रामने शम्बूक का शिर उसी प्रकार काट कर गले से अलग कर दिया, जिस प्रकार कमल डण्ठल से उतार कर पृथक् कर दिया गया हो, आग की चिनगारियों से झुलसी हुई दाढ़ी वाला उसका शिर ऐसा लगा था जैसे पाला से जला केशर वाला कमलनाल हो ॥ ५२ ॥

कृतदण्डः स्वयं राज्ञा लेभे शूद्रः सतां गतिम् । तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविलङ्घिना ॥ ५३ ॥

अन्वयः— शूद्रः राज्ञा स्वयं कृतदण्डः ( सन् ) सतां गतिं लेभे । दुश्चरेण अपि स्वमार्गविलङ्घिना तपसा न ( लेभे ) ।

कृतेति । शूद्रः शम्बुको राज्ञा स्वयं कृतदण्डः कृतशिक्षः सन् सतां गतिं लेभे । दुश्चरेणापि स्वमार्गविलङ्घिना अनधिकारदुष्टेनेत्यर्थः । तपसा न लेभे । अत्र मनुः